पछतावा

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
Jemsbond
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Re: पछतावा

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 03:27

आषाढ़ माह में किसान फसल को देखते हैं। किसी-किसी दिन बादल थोड़ा बहुत पानी बरस जाता था। परन्तु एकदम झकझोर कर पानी नही गिर रहा था। आषाढ़ महिना ऍसे सुखा बित गया, जो किसाने खेतों में बीज बो दिए थे बीज अंकुरित होकर चल गए। मणिदास झालर द्वारा बड़े चिंतित हैं कि इस वर्ष कैसे खेती किसानी करें। खेती किसानी पिछड़ती जा रही थी। सावन मास में कुछ पानी बरसा जिससे कुछ किसानों ने धान बो दिया। झालर ने भी खेतों में धान बो दिए। बीज उगने के बाद सिर्फ एक-दो दिन ही पानी बरसा। खेत नही भर पाये। सिंचाई विभाग ने चाहा कि नहर में पानी छोड़ें। ताकि खेतों में पानी भर जाए। धान की वियाई-विदाई हो जाए।

मणिदास ने रामदास को बिलासपुर के मिशन स्कूल में कक्षा 9वीं में भर्ती करा दिया। रामदास को मिशन होस्टल में रहने के लिए जगह भी मिल गई। रामदास मन लगाकर पढ़ने लगा। रामदास ने कक्षा 9वीं पास कर लिया। इस वर्ष पानी कम गिरने से धाने की फसल ज्यादा बर्बाद हुई उपज कम हुई। बड़ी मुश्किल से झालर को बाज के लिए धान मिला। छत्तीसगढ़ में किसानों के लिए महाअकाल पड़ गया। इस अकाल से किसानों के चुल हिल गये। छत्तीसगढ़ के सारे किसाने बड़े-बड़े शहरों में खाने-कमाने दिल्ली, कलकत्ता, इलाहाबाद, लखनऊ, आसाम, ढ़ाका चले गए। गाँव में मात्र झालर दास का परिवार रह गया। घर देखने के लिए बड़े-बूढ़े लोग बचे। उन्हें दिन में एक जून की रोटी भी नही मिल पाती थी। गाँव वाले मणिदास के पास जा पुराना धान था उसी से गुजर-बसर कर रहे थे।

रामदास कक्षा 9वीं पास कर कक्षा 10वीं में पढ़ने लगता है। रामदास किशोर से जवानी में प्रवेश कर रहा था। वह कक्षा 10वीं में द्वितीय श्रेणी मे उत्तीर्ण हो जाता है। रामदास पढ़ने-लिखने में बचपन से होशियार था। उसके संग पढ़ने वाले उत्तमदास, मनहरण, रामसहाय, पूरन लाल, मनोहर, तृतीय श्रेणी में पास हुए। गर्मी की छुट्टी में सभी साथी गाँव आ गए। वेदवती मणिदास से कहती हैं कि – रामवती जवान हो गई है गौना कराकर ले आओ। मणिदास झालर से कहता है कि –बेटा रामदास भी जवान हो गया है। बहू का गौना कराकर ले आओ। तुम कल सेंदरी गाँव जाकर आसकरण दास से कहो ...। झालर सेंदरी जाकर मंगलीबाई आसकरण दास से कहता है- कि बहू का गौना कराकर ले जाना चाहते हैं। तब तक रामवती आठवीं पास हो गई थी। रामवती मस्त गोल-गोल मांसल तन वाली जवान हो रही थी। देखने में बहुत खूबसूरत, छरहरी बदन की किशोरी लगती थी। मंगली आसकरण दास से बोली समधी जी आए हैं। रामवती के गौना कराने के कह रहें हैं। मंगली कहती है- आजकल के बच्चों का क्या भरोसा । कुछ ऊंच-नीच हो जाए तो बदनामी होगी। इसलिए तुम कह दो। अक्ती के दिने गौना कराकर ले जांए। अपनी बहू को।

झालर ने अपने घर आकर मणिदास को बतलाता है कि अक्ती का दिने तय हुआ है। चलो एक माह अभी समय है सभी तैयारियां कर लो। मणिदास अपने नाते रिश्तेदारों को एवं आसपास गाँव के मुखिया, पटेलों को गौना के बरात में चलने के लिए निमंत्रण देते हैं। बस में बैठकर मणिदास गौना की बारात सेंदरी गांव जाता है। अक्ती (अक्षय तृतीया) के सुबह बारात सेंदरी पहुँच जाती है। साथ में गड़वा बाजा भी ले जाते हैं। बाजा वाला बढ़िया फिल्मी धुनों में परी नाचती हैं। गाँव में हजारों आदमियों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है। आसकरण दास बरातियों को चाय, नास्ता कराते हैं। सुबह दस बजे आंगन में धान का चौक पूरकर कलश जला कर रामदास रामवती को नए वस्त्र पहनाकर घर से विदा करते हैं। आंगन में सभी महिला पुरूष, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी पिताजी सभी चूमा लेते हैं। विदाई के समय सभी लोगों की आंखों में आंसू छलक जाते हैं। माँ, भाभी, पिताजी सभी रामदास व परिवार के सदस्यों को अपनी माँ, बाप समझने एवं सेवा करने के लिए समझाते हैं। माँ मंगलीबाई से रामवती गले मिलकर खूब रोती है। मंगलीबाई कहती है बेटी आज तुम पराई बन गई हो। ससुराल ही तुम्हारा असली घर है। माँ-बाप पाल-पोसकर बड़ा कर देते हैं, परन्तु जीवन भर के लिए सास-ससुर ही माँ-बाप होते हैं। रामवती, नानी, दादी, मामी सखियों से मिलकर खूब रोती हैं। पास में खड़े रामदास के आंसू टपक जाते हैं। मन में ग्लानि होने लगती है कि लड़की ससुराल जाते ही पराई हो जाती है। यह कैसा रिवाज है। माँ-बाप, भाई-बहन, सभी पराये हो जाते हैं। घर से कुछ दूर सड़क कर जाकर वर-वधू की विदाई करते हैं। आसकरण दोनों हाथ जोड़कर मणिदास, झालरदास, जगतारणदास से विनती करता है कि मेरी बच्ची से कोई गलती हो तो माफ कर देना। अभी बहुत छोटी है। गौना में मिले चांवल, रूपए, पैसे को बस के ऊपर लादकर गाँव ले आते हैं।

वेदवती, शांतिबाई, केजा, मनोरमा सभी घर की महिलाएं द्वार पर आरती उतारकर वधू को घर में लाते हैं। आंगने में सभी बड़ों को प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। सभी बरातियों को शाम का भोजन कराते हैं। सभी मेहमान अपने-अपने घर चले जाते हैं। मनोरमा उस रात एक कमरे की साफ-सफाई पलंग बिछा देती है। खाना खाने के बाद मनोरमा रामवती को (सुहागरात) घर देने की बात बताती है और वहां ले जाती है। उधर दोनो गप मारते रहते हैं। वह रामदास को लेकर आती हैं। सुहागरात सफल हो.... कहकर मनोरमा वापस अपने कमरे में आ जाती है। रामवती पलंग से उठकर रामदास के पहले चरण स्पर्श करती है। रामदास रामवती के मना करने के बाद भी पोटार के कस के दबा लेता है। रामवती ए..माँ.. कहकर बोलती है, तुम तो ऍसा दबाए कि मेरी हड्डी टूट जाए। दोनों एक दूसरे को चुमते हैं। कुछ समय तक गप बाजी होती है। फिर लालटेन बुझाकर एक दूसरे में खो जाते हैं। रामदास रामवती दो शरीर-एक प्राण बन जाते हैं। सुहागरात की यादें दोनो के स्मृति में अंकित हो जाती है। सभी मेहमान घर चले जाते हैं। मणिदास और वेदवती बहू के हाथों से भोजन करके तृप्त हो जाते हैं। वेदवती कहती है कि अब यदि हम मर जाएंगे तो भी कुछ नही होगा। ऋण से छुटकारा हो गया है। झालर और शांतिबाई रामवती को पुत्री के समान रखती हैं। रामदास रामवती की जोड़ी खूब फबती है। रामदास झालर के संग खेती किसानी में साथ देता है। सावन के महिने में रामवती गर्भवती हो जाती है। जब दादा मणिदास और दादी वेदवती को यह पता चलता है तो वें खुशी से झूम जाते हैं। मणिदास कहता है कि, अब तो नाती के बेटा-बेटी को देख कर ही मरूंगा। चौथी पीढ़ी का सदस्य आने वाला है।

रामवती को खाने-पाने की चीजें पसंद नही आती है रामदास शहर से फल ला-लाकर खिलाता है। परन्तु रामवती नही खा पाती। रामदास आसकरण दास को बताता है कि रामवती गर्भवती है। खाना अच्छा नही लग रहा है। मंगलीबाई सात प्रकार (संधोरी) रोटियां बनाकर ले जाती हैं। साथ में इमली, नींबू का अचार, आम का अचार, खट्टे-मिठे सूखे बेर भी ले जाती है। रामवती मां को देखकर खुश हो जाती है। रामवती पहले से कमजोर हो गई थी। मंगली ने समझाया कि बेटी इस समय कुछ अच्छा नही लगता। पेट में जो आ रहा है, उसके कारण अच्छा नही लग रहा। रामवती को इमली, आम-नींबू का अचार अच्छा लगता है। रामवती शांतिबाई कुछ काम नही करने देते । मंगली घर के कामों में हाथ बंटाती थी। दोनो समधिन मिलकर घर के कामों को कर लेते थे। कुछ दिन बाद रामवती खाना-खाने लगती हैं। शरीर भरता जाता है, पेट बाहर निकलता जाता है। मंगली कुछ दिन रहकर अपने घर लौट जाती है। रामवती नौ माह बाद एक स्वस्थ बच्ची को जन्म देती हैं। रामदास, मणिदास, झालरदास सभी खुश हो जाते हैं। घर में एक खिलौना आ गया था। मणिदास ने पूरे गांव भर को कंकेपानी एवं भोजन कराया। मस्तूरी से लाउडस्पीकर लाए। फिल्मी गाने , छत्तीसगढ़ी गीत बजवाए। मणिदास और वेदवती की खुशियों का ठिकाना न था। इस वर्ष फसल भी अच्छी हुई। बच्ची के जन्म होने से घर धन-धान्य से भर गया। रामदास बच्ची का नाम माधूरी रखता है। वह अति सुंदर रहती है।

मणिदास का भरा-पूरा परिवार सुखी और सम्पन्न कृषक था। मणिदास की ख्याति भले और ईमानदार व्यक्तियों में गिनी जाती थी। झालरदास ने रामदास से कहा- बेटा, अब आगे पढ़ाई मत करो। घर की खेती किसानी को देखो। गाँव में कहावत है कि- लड़का बी. ए. पास होना मानो परदेशी बाबू बन जाना कहते हैं। देश-दुनियां, खेती-किसानी, गांव से संबंध उसका टूट जाता है। न वह शहर का हो पाता है, न गांव का किसान बन पाता । इसलिए बेटा, बढ़िया खेती-किसानी करो। तु्म्हारे लिए पूर्वजों ने बहुत धन संपत्ति रखा है। उधर रामवती भी रामदास को समझाता है, बाबूजी ठीक कह रहे हैं। फिर बच्ची भी अभी छोटी है। माधूरी बहुत रोती है। तुम्हारी गोद के लिए रोती है। पिता का प्यार-दुलार बच्ची पहचान गई है। मां शांति बाई, वेदवती सभी समझाते हैं। रामदास के साथ पढ़ने वाले सभी साथी कालेज नही पढ़ पाते। रामदास परिवर्तन को भांपते हुए कालेज नही जा पाता।

मणिदास सावन मास के बीतते भादो मास के शुरूवात में खेत देखने गया। खेत में मेड़ पर चल रहा था कि.. पैर में एक केकड़े आकार के बिच्छु ने आकर काट लिया। मणिदास बिच्छु के काटने से बुरी तरह से कराह उठा। बहुत पुरानी बिच्छु रहा। एक बार के काटने से ही आदमी मर जाए। मणिदास ने तब गमछे से नाड़ी को पकड़के कस कर बांध दिए। जल्दी-जल्दी घर आया। जैसे ही बरामदे में पहुंचा, मणिदास चिल्लाये... वेदवती, शांति, रामदास यहां आओ। लोटे में पानी लाओ। रामवती दौड़े-दौड़े एक लोटे पानी लाई। अपने हाथो से पानी पिलाई। मणिदास पसिने से लथपथ हो गया। शरीर में विष फैलने लगा। मुंह से झाग निकलने लगा। वह धीरे-धीरे बेहोश होने लगा मणिदास जमीन पर लेट गया। घर में रोना शुरू हो गया। मणिदास विष से तड़पने लगा। रामदास आसपास के बैगा, गुनिया से झाड़, फूंक कराया। परन्तु बिच्छु का जहर नही उतर पाया। झालर ने कहा रामदास नौकर से कहकर बैलगाड़ी फंदवाओ। इसे धर्म अस्पताल मस्तुरी ले जाते हैं। मणिदास का शरीर विष से नीला पड़ गया। मुंह से झाग बराबर निकल रहा था। मणिदास को बेहोश हुए दो घंटे हो गए। वेदवती शांतिबाई के आंसू नही थम रहे थे। बैलगाड़ी से शासकीय अस्पताल मस्तुरी ले गए। डा. गुप्ता ने देखकर कहा कि जल्दी क्यों नही लाए। शरीर में पूरा विष फैल गया है। मैं प्रयास करता हूँ। डा. गुप्ता ने सिस्टर मार्टिन को बुलाया। तत्काल ग्लूकोज से स्लाइन लगाओ। मणिदास को स्लाइन चढ़ाया गया। दो बोतल चढ़ाये। परन्तु मणिदास की बेहोशी नही कटी। सात घंटे तक लगातार बोतल विषमारक इंजेक्सन लगाते रहे परन्तु विष खत्म नही हुआ मणिदास के मस्तिस्क में जहर पहुंच चुका था। डा. गुप्ता ने जहर उतारने के लिए अथक प्रयास किए परन्तु, जहर नही उतरा। रात आठ बजे मणिदास प्राण पखेरू उड़ने से पहले जोर से चिल्लाए। हाथ पैर को पीटने लगे। सिस्टर मार्टिन, झालर, रामदास जोर से दबाकर हाथ पैर को पकड़े । मणिदास ने अंतिम बार आंखें खोली। रामदास को पास बुलाया। सिर पर हाथ रखा। वेदवती, झालर, को सबको एक नजर घुमाकर देखा। सब परिवार के सदस्यों को देखने के बाद अंतिम सांसे ली। सिर एक तरफ लु़ड़क गया। रामदास के सिर से उनका हाथ गिर गया। रामदास, वेदवती, झालर ने रोना शुरू कर दिया। सभी की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। मणिदास एक नेक इंसाने थे। संसार में एक महामानव बनकर आए थे। मणिदास की आत्मा ब्रम्ह में समा गई। डा. गुप्ता ने पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बनाकर लास रामदास को सौंप दिए। डा. गुप्ता ने पुलिस थाना मस्तुरी में सर्प बिच्छु काटने का मामला दर्ज करा दिया। मर्ग कायम करके प्रकरण पंजीबध्द कर दिया।

प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र मस्तुरी से लाश को बैलगाड़ी, में भरकर गांव टिकारी ले गए। जैसे ही गांव वालों को पता चला। महंत जी नही रहें, देखने वालों का तांता लग गया। रामदास वेदवती चुप कराते थे, परन्तु वेदवती रोती जाती थी। कहती- बेटा अब इस शरीर में क्या रखा है। मेरे प्राण तो चले गए। मैं जी के क्या करूंगी। शांति, झालर, रामवती सभी समझाते परन्तु वेदवती रात भर विलाप करती रही। लाश से लिपट-लिपटकर रोती रही। रामदास ने सभी रिश्तेदारों को आजमी भेजकर जानकारी दी। आस-पास के सभी रिश्तेदार दस बजे के आसपास जमा हो गए। सेंदरी में रामसनेही महंत, आसकरण, मंगलीबाई बारह बजे दिन को पहूँच पाए। मणिदास के लाश को बढ़िया नहलाए, तेल हरदी, नए वस्त्र पहनाए। उसी समय वेदवती मूर्छित होकर गिर पड़ती है। वेदवती को रामदास पानी छिड़कता है। मुंह में पानी डालता है, पानी मुंह में नही जाता। बाहर निकल जाता है। रामदास के गोदी में ही सती वेदवती प्राण त्याग देती है। घर में हा-हाकार मच जाता है। एक साथ दो लोगों की मृत्यु। झालर दादा शांति खूब रोते हैं। रामवती बहुत रोती है। जगतारण दास केजा बाई मनमोहन सभी परिवार के दुखी सदस्यों को चुप कराते हैं। कहते हैं दोनों जीवन साथी साथ जीने, साथ मरने की कसमें खाए थे। भगवान दोनों को शांति प्रदान करे।

वेदवती के लाश को शांति, केजा, रामवती, स्नान कराकर नए साड़ी तेल हल्दी लगाकर माथे में सिंदूर, पैर में महावर, टिकली, फुंद्दी, एक सुहागन नारी के सुहाग पनाकर पत्नी-पति को एक साथ मुक्तिधाम ले जाने के लिए शव यात्रा निकलती है। गाँव-गाँव में शोर मच जाता है, कि पति-पत्नी एक साथ मर गए। साथ में दाह संस्कार किया। गाँव-गाँव से आदमी माटी देने के लिए आने लगे थे। शवयात्रा में रामदास झालर दोनों सामने जगतारण मनमोहन पीछे मयाने के पकड़े हुए थे। मयाना को एक-एक करके सब कंधा दे रहे थे। हजारों आदमियों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। रामदास ने गाँव के तिहार, समक्ष, नौकर वेदराम को गड्ढा घोतने के लिए भेज दिए थे। बोधराम ने दोनों के लिए बड़े गड्ढे तैयार करा लिए थे। लाशों को पीपल पेड़ के नीचे उतारा गया। लाश के पास में जगतारण, झालरदास, रामदास बैठे थे। अगरब7त्ती जलाई। फूल मालाओं से लाशें ढंकी थी। अंतिम दर्शन के लिए मणिदास, वेदवती के मुँह को खोले। रामदास ने गंगा जल मुँह में डाल दिया। परिवार के सदस्यों ने अंतिम दर्शन कर गंगा जल पिलाया। दोनों की लाशें एक साथ गड्ढे में दफनाई गई। सभी लोगों ने पाँच-पाँच मुट्ठी मिट्टी डाली। बोधराम ने पत्थर से ऊपर उठी मिट्टी को पीटकर बराबर किया। सभी स्नान के लिए तालाब की ओर प्रस्थान किए। लाश के लिए नए वस्त्रों के ढेर लग गए थे। लगभग 100 साड़ियां और धोतियाँ चढ़ी थीं। सभी कपड़ों को सड़क के किनारे बबूल के पेड़ में लटका दिए। जिसे दीन-हीन लोग उपयोग में ला सकें।

तालाब के घाट में सभी स्नान किए। बोधराम ने उरई के पौधे को किनारे लगा दिए। जिसे झालर, जगतारण ने पाँच बार पानी दिया। बाद में सभी लोगों ने वैसा ही किया। स्नान के बाद सभी रामदास के घर आए। द्वार पर खड़े होकर सभी लोगों को प्रणाम किए एवं धन्यवाद दिया। महिलाएं सभी स्नान करके पहले आ गई थी। गाँव में अजीब सा सन्नाटा था। घर में तो और अधिक। क्योंकि दोनों सदस्यों की गमी हो गई थी। जगतारण की बहू लताबाई ने सब लोगों के लिए भोजन बनाया था। रामदास रामवती फूट-फूट के रो रहे थे। आँखों से आसूं थम नहीं रहे थे। झालर, शांति, मंगलीबाई बहुत समझा रहे थे। रामदास के सिर से दादा-दादी की छांव हट गई थी। जिसने पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया था। बड़े प्यार-दुलार से बड़ा किया था। उसी के सहारे जीते थे। रामवती रामदास को समझाता है कि अभी बाबूजी और माँ जीवित हैं, क्यों घबराते हो। सभी लोगों ने रामदास को ढाढस बंधाए। सभी मनुष्यों को एक दिन तो मरना है। किसी तरह रामदास को भोजन कराते हैं। सभी मेहमान शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं। बच जाते हैं मनोरमा और मंगलीबाई।

झालरदास दशकर्म के लिए रिश्तेदारों को काँव वालों को निमंत्रण देता है। दशकर्म शनिवार के दिन होगा। रामदास झालरदास दशकर्म के लिए चावल, दाल, तेल हल्दी, मिर्च मसाले बाजार से ले आता है। दूबराज धान के दस बोरा चावल मस्तूरी से कुटा कर ले आते हैं। दाल के लिए दो बोरे अरहर, उड़द, तीवरा, दराकर ले आते हैं। मालपुआ बनाने के लिए पाँच टिन घी, पाँच चक्की गुड़, नारियल, लौंग, इलायची बिलासपुर से खरीदकर बैलगाड़ी से भरकर ले आते हैं। तीन दिन में तीज नहावन करते हैं एवं दस दिन में दशकर्म। सभी मेहमान एक दिन जहलने के लिए आ जाते हैं। घर मेहमानों से भरा रहता है। पूरे घर की साफ-सफाई कराते हैं। घर के कपड़े बिस्तर धुलवाते हैं। दशकर्म के दिन रामदस शहर से लाए नाई से बाल उतरवाता है। झालरदास, जगतारा, मनमोहन मुक्तावन दास परिवार, गाँव के अन्य सदस्य सिर के बाल उतरवाते हैं। दोपहर दो बजे तक नाई दाढ़ी बाल काटते रहते हैं।

घर की एवं गाँव की सभी महिलाएं नहावन में तालाब जाती हैं। सभी महिलाएं पाँच बार पानी देते हैं। स्नान करके लाईन से घर आ जाती हैं। द्वार में रखेपानी से पैर धोती हैं। आंगन में खड़े होकर गाँव के सारे लोग अपने घर चले जाते हैं। शेष मेहमान रह जाते हैं। महिलाएं कपड़े पहनकर तैयार हो जाती हैं। पुरुष लोग महिलाओं के आने के बाद स्नान करने जाते हैं। लगभग हजार आदमियों से अधिक लोग स्नान करते हैं और पाँच-पाँच बार पानी अंतिम रूप से देते हैं। लाईन से सभी घर आ जाते हैं। द्वरा में पानी रखे रहते हैं। पैर-हाथ धोकर आंगन में जाते हैं। रामदास, झालरदास, हावन द्वार में खड़े होकर सभी लोगों को प्रणाम करते हैं। एवं भोजन ग्रहण करने के लिए निवेदन करते हैं। सभी पुरुष कपड़े पहनकर तैयार होते हैं।

खलिहान में दस गुण्डे के चूल (चूल्हा) जलते रहते हैं, जिसमें चावल दाल सब्जी पकाते हैं। सभी मेहमानों को भोजन पंक्ति में कराते हैं। रामदास झालरदास दोना पत्तल में भोजन लेकर द्वार में रख आते हैं। पानी पत्तल में रख देता है। ऐसा कहा जाता है कि मरे हुए व्यक्ति आकर भोजन पाते हैं। इसके बाद ही सभी लोग भोजन करते हैं।

शाम के पाँच बजे कगे बाद ही घर के आंगन के साफ-सफाई करके चौके पूरते हैं। चावल के आटे से फेंक फुरते हैं। फेंक चारों ओर चादर बिछाकर फैलाकर लोग बैठते हैं। आंगन में दरी बिछा देते हैं। अजीत महंत मंत्र पढ़कर कलश की स्थापना करते हैं। सभी गुरू गद्दी की स्थापना के बाद बैठ जाते हैं। फेकर आरती का कार्यक्रम शुरू होता है। तबला, हारमोनियम, झांझर, मंजीरा से मंगल गीत प्रारंभ करते हैं। सबसे पहले गुरूजी को प्रणाम करते हैं।

दोहा –

गुरुजी को पहुंचे कोट कोट प्रणाम
कष्ट भींग जीव तारिहो, गुरुकरि हो संत समाज।
शब्द नाम – हरिहर गोबर निरमल पानी।
चौका पोतो सत सुकूत ज्ञानी।।
सतनाम को करे जोहारा।
एक लाख के पास करे भाई।
नरतन छोड़ स्वर्ग में स्थान पाई।।

मंगलगीत –

अहो बाबा अंगना ल झार बहार डरा हो।
तन उरमीत देहो हो निकाल
कर्र लेहा पुरन कमाई संत घर ला पाईहा हो।

महंत अजीतदास एवं साथियों द्वारा दो घण्टे तक चौका आरती के कार्यक्रम करते हैं। मंगलगी. शब्द सारवी, दोहा आदि सुनकर कई महिलाओं को संत गुरू घासीदास चढ़ जाते हैं। झूमने नाचने लगते हैं। मंगलगीत के धुन से मन प्रसन्न हो जाता है। मन के क्लेश, काम, क्रोध, मद लोभ समाप्त हो जाता है। गुरूजी के ध्यान में ही मन लगा रहता है। हजारों आदमी इसे देखते हैं। अजीत महंत द्वारा आरती उतारकर पानी छिड़ककर संत गुरू घासीदास का नाम लेकर शांत कर देते हैं।

शब्द –

सार नाम सत गुरू, वानी,
सार नाम बिरले कोई जानी
सार नाम अधि अंश समाना।
सत है गरजीन गंयी तास।
सतनाम के मेहीन माला
सतनाम के जपे जू पाए
कोटिन काल मए जर धारा,
हीरा हंस लिए उबारा।
साहेब गुरु सतनाम।।

अजीत दास महंत द्वारा पान प्रसाद सुपारी कलश के चारों ओर चारों गुरू को चढ़ाते हैं। घर से आरती लेकर महिलाएं आती हैं। पान, प्रसाद, रोटी, लड्डू, नारियल, मालपुआ, शक्कर, फल मेवा, मिष्ठान, बूंदी रखती है। अजीत दास मंगल आरती गाता है।

आरती मंगल

पहली आरती जगमग ज्योती
हीरा पदारथ बारे ला मोती
होत आरती सतनाम साहेब की
कंचन धार कपूर लगे बाती
भव भव आरती उतारे बहु माती
आरती हो सतनाम साहेब के।
तीजे आरती त्रिभुवन जग मोहे
रतन सिंहासन गुरूजी सा सोहे।
चौथे आरती निर्मल शरीरा,
आरती गावै गुहू घासीदासा हो।
जप आरती जो नर गावे,
चढ़ के निमग सुरलोक सिंघावे
छठे आरती दया दर्शन होए
लख चौरासी के बद छुड़ाए
हो आरती सतना साहेब के।
सतई आरती सतनामी घर होवे
हंसा ला उवार के सत लोक पठाए
होत आरती सतनाम साहेब के।

रामवती, मनोरमा, शांति ले जा आरती को महंत को देते हैं। आरती को प्रणाम कर बीच में रख देते हैं। सभी महिलाएं कलश को प्रणाम करके चली जाती हैं। अशोक नाम पढ़ता है।

नाम

बिना बीज के वृक्ष है,
बिना शब्द के नाम
बिना शब्द के रहन सहन
है उन्हीं तोल समान
राई जैसे पत्र अघराई ऐसे फूल,
शारदा पत्र उनके नहीं
अ,ठ कंवल निज मूल।
सुनो पुत्र गिरधारी सुनो पुत्र बिहारी
जब रहित साहेब आपी आपा
तज साहेब घर छूटे पसेऊ
भर भादो जस बरसाय भेई
बईठत धरती उठत आकाश
सतनाम के सुमखन मोरी
अष्ट कलश हो आशा
गगन मंदिर पर जोत पुरुष हैं
जहां तुम्हारो वासा
सात दीप नव खण्ड धरती
सोलह खण्ड आकाशा, चौदह भुवन
दस सौ दिग पाला
जहाँ ठाढ़े रहिन, अथरे रहवासा,
कंचन काया पुरुष रहवासा,
अहो नाम तुम कहां से आए,
कौन नाम से जीव निरमाए,
अनह ऊपर अनहत बसाए,
सिक्का नाम से जीव जीव निरमाए,
चारों गुरू पांचों नाम साहेब गुरू सतनाम

पदमन द्वारा साखी कहा जाता है।
“साखी – गुरू हमारे बानिया नाम लाद करिन व्यापार, नहीं ताजी न ही तासूरी, गुरू तोल तिन्ह संसार।’ अंतिम मंगल अजीत साथी द्वारा गाते हैं।

मंगलगीत

गुरू कहवा मैं पावो आरुग फुलवा
गुरू तोला में चढावे कवन फुलवा हो।
सभी तो फूल ता साहेब मोरा जूठारे है
तेला कइसे तोला मैं चढ़ावों।।
हाँ चाल चलन के चम्पा मन कर मोंगरा
प्रेम के हरवा बनबो हो
नदिया के पानी, मीन जूठारे हे,
कौ जल मा नहवात हो
गंगा जमुना दोनों नैना केहे नदिया
आंसुअन के धार में नहावावो हो
गईया के दूध ला बछरा जुठारे हे,
कामा तोरे चरण पखारों हो।
शुद्ध मन सत्यवप्रत गोरस
एईमा तोर चरण पखार न हो।
भाव भगती कर भोग लगाऊं
सत गुरू के सेवा ल बजाऊ हो

अजीत महंत द्वारा नारियल भेंट, झालर, रामदास, जगतारण को करातेहैं। सभी चौक मंत्र पढ़कर नारियल भेंट करतेहैं। नारियल सेपानी, गुड़, मिठाई, रोटी मांग कराकर अजीत दास नारियल तोड़ते हैं। सभी नारियल बीच से टुकड़े हो जाते हैं। सभी महंत मिलकर नारियल, कुड़, शक्कर, रोटियां, लड्डू, फल दूध के प्रसाद बनाते हैं। रामदास को दो दोने के मणिदास वेदवती के लिए प्रथम भोग देते हैं। बाद में सभी महिलाएं एवं पुरुषों को प्रसाद वितरण करते हैं। आंगन में बैठ जाते हैं. खलिहान, बरामदे, गली, किली, घर, आंगन लगभ तीन हजार पुरुष महिलाओं को बूंदी, सेवब, खीर, शक्कर, घी, पूड़ी मालपुआ परोसी जाती है। लगभग पचास लोग परोसने वाले। दालभात, सब्जी, घी, अचार, सभी को किलाते हैं। सभी भर पेट खाकर मणिदास वेदवती के आत्मा को शांति पहुंचाते हैं। भोजन एक पूरी रात्रि तक चलता है। गाँव वाले अपने घर चले जाते हैं। मेहमान लोग रात में आंगन खलिहान बरामदे में सोकर बिताते हैं। ऐसा भोजन आसपास के गाँव में किसी ने नहीं खिलाया था। झालरदास की वाहवाही हो जाती है।

दूसरे दिन गुरू एवं भांजे भांजी की दक्षिणा लेकर पूजा अर्चना कर नए वस्त्र कमीज धोती, साड़ी, छाता, धान, चावल, रुपए पैसे देकर विदाई करते हैं, जिस घर में मृतक सोते थे उस घर में कटोरी में आटा रख दिया जाता है। दो कटोरियों में आटा रखा गया था। घर के सभी मेहमान, महिला पुरुष घर को खाली छोड़कर बिदाई करने चले जाते हैं। एक बुजुर्ग महिला द्वार से घर की रखवाली करते हैं। कटोरी के आटे मं अंगुलियों के निशान स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। शांति, झालर, रामदास, रामवती, मनोरमा, मंगली बाई, श्यामबाई बिदा करके रोते हुए आतेहैं। अंतिम बिदाई के समय घर से अंतिम बिदाई होती है। सभी मेहमान एक-क करके घर चले जाते हैं। रामदास, झालर, शांति, रामवती और माधुरी घर में बच जाते हैं। एक सुखी परिवार में दुख के बादल छा जाते हैं।

झालर, रामदास मिलकर खेती किसानी करने लगते हैं। इस वर्ष वहां फसल अच्छी नहीं होती। अकाल पड़ जाता है। धान की फसलों को डंकी, माहो, कटुवा, फाफूत, टिड्डी नुकसान पहुंचाते हैं। यहां तक बीज के लिए भी धान नहीं मिलता। सभी नौकर खाने कमाने इलाहाबाद चले जाते हैं। पूरा छत्तीसगढ़ अकाल की चपेट में आ जाता है। गाँव के गाँव किसान रोजी-रोटी के लिए पलायन कर जाते है। जिस किसान के पचास एकड़ जमीन होती है, वह भी एक बीजा धान नहीं पाता है। रामदास, झालरदास पुराने बचे कोठी को खोलते हैं और अपने सीमित परिवार का पेट भरते हैं। गाय भैंस के लिए चारे की कमी हो जाती है। सभी तालाब, नदी सूखने लगे थे। पशुओं में महामारी फैल जाती है। वैसे हीखारे पानी से कभी बीमारी से घर की गायें, बैल, भैंस एक-एक कर एक ही माह के भीतर सभी जानवर मर जाते हैं। घरम एक भी पशु नहीं बचता। बच्चों के लिए दूध की कमी होने लगती है। चरवाहे राउत से बच्ची के लिए दूध लेने लगे। मणिदास की मृत्यु धन सम्पत्ति कम होने लगी थी। झालर महंत चिंतित होने लगे कि अगले वर्ष खेती किसानी कैसे होगी। इधर घर में खाने के लिए अन्न नहीं बचता। उधर बीज बोने के लिए धान नहीं है। जोतने के लिए बैल नहीं है। क्या करें किसान। अकाल से किसानों की कमर टूट गई थी। किसी प्रकार रामदास अपने परिवार के पालन पोषण करता है।

झालरदास रामदास से कहता है कि – बेटा इतनी जमीन का क्या करोगे। फिर खेती-किसानी के लिए कम से कम तीन जोड़ी बैल या भैंस लेना पड़ेगा। बीच के लिए धान। खेती निंदाई गुड़ाई के लिए धान सजिया पैसा लगभग पच्चीस हजार रुपए से अधिक चाहे। यदि तुम्हारा मन आ जाए, तो पाँच एकड़ जमीन को परसदा खार की बेच देते हैं। वहाँ अघरिया किसान नए आए हैं। दो पाँच हजार रुपए एकड़ में सौदा तय कर आया। चौथे दिन बिलासपुर जाकर जमीन की रजिस्ट्री अघरिया किसान नन्दू पटेल के नाम से कर दी। नन्दू पटेल गाँव जाकर पच्चीस हजार रुपए पहले दे आया था। झालरदास रामदास बैल खरीदने के लिए काम कनेरी बाजार पशु हाट जाते हैं। दो जोड़ी बैल पाँच हजार रुपए एवं एक जोड़ी भैंसा तीन हजार में खरीद लाते हैं। रामदास झालरदास से कहता है – बाबूजी कोठा अभ सूना है। देहाती गाय ही खरीद लेते हैं। झालरदास बाजार में घूम-घूम कर देखते हैं। एक काली गाय को बछिया समेत एक सौ पचास रुपए में खरीद लेते हैं। कनेरी बाजार से सभीपशुओं को घर लाते हैं। द्वार के सामने रामवती शांतिबाई लोटे में पानी लेकर गाय की पूजा और आरती करती हैं। भगवान पहले जैसे कोठा को भर देना। खलिहान के कोठा में बैल, भैंसा और गाय को पानी चारा खिलाकर बांध देतेहैं। शांति माधुरी को गाय की बछिया दिखाती है। माधुरी हंस-हंस कर खेलने लगती है। सुबह खेलावत राउत को पता चलता है कि किसान के यहां गाय, बैल खरीद लाए हैं। गाय के आधा किलो दूध रखकर दे देते हैं। शांतिबाई दूध को गोरसी के आग में गरम करने लगती है। गाय बैल भैंसा को चराने के लिए राउत जंगल खार ले जाता है। दोपहर में ले आता है।

रामदास झालरदास दोनों सहकारी समिती से खाद बीच लेते हैं। लगभग दस हजार रुपए के ऋण लेते हैं। सनेही किसानी के लिए एक नौकर सहेत्तर से रख लेते हैं। तीन नागर जोतना रहता है। एक नागर रामदास, दूसरे को झालरदास, तीसरे को नौकर सहेत्तर जोतता है। लगभग एक महीने में सभी खेतों में धान बो देते हैं। पानी समय पर बरस रहा था। बादल रुक-रुक के झड़ी कर हरहरा कर गिर रहा था। सभी खेत खार नदी नाले तालाब भर गए थे। इस वर्ष कुछ अच्छी फसल होने की उम्मीद थी। भादो मास में तीजा त्यौहार मनाने के लिए आसकरणदास रामवती को लेने आए। शांति ने कहा बहू पिताजी आए हैं, कुछ दिन के लिए मायके चली जा। मन बहल जाएगा। जब से आई हो मायके नहीं गई हो। झालरदास रामदास को कहता है कि बहू को कुछ दिन के लिए मायके भेज दो। रामवती अपने माँ भाई से मिलकर आ जाएगी। रामदास बैलगाड़ी से मस्तूरी तक रामवती, माधुरी, आसकरणदास को छोड़ देता है। मस्तूरी से बस में बैठकर बिलासपुर, बिलासपुर से सेंथरी गांव टांगे में बैठकर चले जाते हैं। घर पहुंचते ही मंगलीबाई माधुरी को पाकर खुश होजाती है। माधुरी अब आदमी पहचानने लगी थी।

माधुरी नाना, नानी की गोद में खेलने लगती है। रामवती हाथ पैर धोकर हालचाल पूछती है। कन कौन सहेली तीजा मनाने आई हैं। मंगली कहती है कि बेटी इस साल के दुकाल (अकाल) से सभी अनाथ हो गए हैं। किसी के पास खाने के लिए दाने नहीं है। रामसनेही महंत तुम्हारे बड़े पिताजी चम्पाबाई को लेने मुंगेली गए हैं।

शायद शाम तक आ जाएंगे घर की हालत भी कोई अच्छी नहीं थी। अरपा नदी में साग सब्जी कोचई लगाए थे। कुछ फायदा हो गया है। इसी से गुजर-बसर कर रहे हैं। नहीं तो हम लोग भी भूखे मर गए होते। खेतों में धान नहीं उगाई। रामवती मंगली माँ को बताती है कि हमारे घर का तो कुछ हाल है। पाँच एकड़ खेत बेचकर, बैल जोड़ी, एक भैंस जोड़ी, एक गाय खरीदे हैं। सहकारी सोसायटी से बीज,खाद उधार में लिए हैं। किसी प्रकार इस वर्ष खेत-किसानी हुआ है।

तीजा के दिन नदी किनारे पीपल के पेड़ में झालर रामवती के छोटे भाई दिलहरण बांध देते हैं। सभी सहेली रामवती के पास आते हैं। माधुरी को गोदी में लेकर खिलाने लगतेहैं। बहुत सुन्दर बेबी थी। जिसने देख लिए उसी के गोद में चली जाती थी। रामवती की छोटी बहन कलावती माधुरी को पकड़कर ले जाती है। आठ दस सहेलियां झूला झूलने बाग में चली जाती हैं। सभी सहेलियां हंसी मजाक गीत गाते मजे करते हुए कुछ सहेलियां माधुरी को झूलाती हैं। जोर जोर से झूला झूलने लगता है। रामवती अधिक झूलाने को मना कर देती है।

गीत –

सावन महीना रे मन भावन रे,
तीजा बड़े तिहार।
आओ सखी मेहंदी लगाएं,
रंग में रंग जाए तन मन हमार।

रामवती शाम चार बजे बेबी को लेकर अपने घर पहुंचती है। मंगलीबाई इंतजार करती रहती है। साथ में बैठकर भोजन करती हैं। माधुरी को दूध-पिलाकर सुला देती है। आसकरणदास शहर से रामवती के लिए साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज खरीदकर लाया रहता है। रामवती की पहली तीजा था। रामवती बाबूजी को कहती है बाबूजी अकाल पड़ा है। काहे के लिए खर्च कर रहे हो। बाबूजी कहते हैं बेटी पहली बार मायके आई हो। माता-पिता का फर्ज है बेटी की खुशी के लिए कुछ तो दें। भले ही तुम्हारे घर में कोई कमी नहीं है। परन्तु नेग है, इसे करना पड़ेगा। रामवती के आंसू बह जाते हैं। मा-बापू के प्यार में रामवती निहाल हो जात है। माधुरी नाना, नानी, मौसी से हिल-मिल जाती है। दो-तीन दिन रहकर रामवती रामदस के संग गाँव चली जाती है।

Jemsbond
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Re: पछतावा

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 03:28

रामदास बड़े मनोयोग से खेती-किसानी करने लगता है। झालरदास शांतिबाई माधुरी को दिन बर गोदी में उठाए घूमते फिरते हैं। घर के बरामदे में दिन भर आदमियों की भीड़ लगी रहती है। बोरी-बारी से सभी लड़के उसे गोदी में लेते हैं। गाँ की वह दुलारी प्यारी बेबी थी। रामवती रात में सोते वक्त रामदास को कहती है कि कोई सरकारी छोटी-मोटी नौकरी क्यों नहीं कर लेते। छोटे परिवार का गुजर-बसर चल जाएगा। रामदास कहता है कि – गाँव में एम.ए. पास लड़के घूम रहे हैं। नौकरी कहां मिल रही है। चलो तुम कह रही हो तो कल से नौकरी की तलाश शूरू कर देता हूँ। रात को किसी प्रकार सोकर बिताते हैं। रामदास को नींद नहीं आती है। रामवती कहती है कि – ज्यादा सोचो मत। आओ मैं तुम्हें सुला देती हूँ। रामवती रामदास के सिर के बालों पर हाथ फेरती है और धीरे-धीरे सिर को दबाती है। रामवती के प्रेम से रामदास को नींद आ जाती है। बड़े सवेरे चार बजे केवट पारा का मुर्गा बांग देता है। रामदास की नींद खुल जाती है। रामवती कहती है अभी सोए रहो, मत उठो पर रामदास नहीं मानता पेशाब करने खलिहान की ओर जाता है। गाय, बैल, भैंसा, बछिया को देखता है, सब कुछ ठीक तो है।

रामदास सुबह हाथ मुँह धोकर नहर के किनारे शौच के लिए जाता है। नहर के पुल के पास पूरनलाल मिल जाता है। रामदास शौच के लिए चला जाता है। पूरनलाल पुलिया पर बैठकर इंतजार करने लगता है। पूरनलाल रामदास के आपर कहता है – संगवारी कल मैं बिलासपुर नौकरी की तलाश में गया था। रोजगार दफ्तर में पता चला कि पुलिस लाइन में सिपाही की भर्ती परसों होने वाली है। रामदास कहता है कि – चलो हम लोग किस्मत आजमाते हैं। गाँव के अन्य साथी मेहत्तर, रामसहाय, उत्तमदास, भागवत को लेकर चलते हैं। सबका ऊँचाई छह फीट से अधिक है। रामदास सभी साथियों को बुलवा भेजता है। धीरे-धीरे सभी साथी आ जाते हैं। पूरन सभी को बताता है कि परसों पुलिस लाइन, बिलासपुर में सिपाही की भर्ती होने वाली है। मार्कशीट, निवास प्रमाणपत्र आदि लेकर जाना है। सभी साधी सिपाही में भर्ती होने के लिए तैयारी करते हैं।

तीसरे दिन पुलिस लाइन बिलासपुर रामदास व साथी पहुंच जाते हैं। वहां हजारों किसान-पुत्र पहले से लाइन में खड़े रहते हैं। मार्कशीट आदि कागजात देखेने एवं ऊँचाई की नाप, सीने की चौड़ाई, फुलाने पर सीने की चौड़ाई नाप ले रहे थे। रामदास की बारी आई ऊँचाई 6 फीट, सीने की चौड़ाई 75 इंच, फुलाने पर 89 इंच। रामदास पहले टेस्ट में पास हो जाता है। पूरन फेल हो जाता है। उत्तमदास, रामदास, महेत्तर, बाबूलाल सभी टेस्टों में पास हो जाते हैं। रामदास के नाम सभी टेस्टों में खेलकूद, दौड़ में पहला स्थान पाताहै। सिपाही के चयन सूची में पहला रामदास जोगी का नाम रहता है। पचहत्तर लोगों की सूची में रामसहाय, उत्तमदास, महेत्तर के नाम आ जाते हैं। सभी साथी खुशी से झूम उठते हैं। सिपाही भर्ती के नियुक्ति पत्र उसी दिन शाम पाँच बजे दे दिए जाते हैं। जिसमें मेडिकल प्रमाण पत्र एवं सात दिन में ड्यूटी पुलिस लाइन बिलासपुर ज्वाइन करने के निर्देश भी थे।

रामदास व साथी रात में अपने-अपने घर पहुंचते हैं। रामदास झालर व माँ के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। सिपाही में भर्ती होने का नियुक्ति पत्र दिखाते हैं। रामवती किचन से भागकर आती है। क्या हुआ। रामदास कहता है मैं सिपाही बन गया हूँ। देश सेवा करूँगा। रामदास बिलासपुर से मिठाई लाया रहता है। रामवती के मुँह में अपने हाथ से खिलाता है। रामवती बहुत खुश होजाती है। माँ शांतिबाई भी बहुत खुश होती है। रात में खाना खाकर रामदास सोने लगता है। बर्तन भांडे व घर की साफ-सफाई कर रामवती बिस्तर पर आती है। माधुरी सो गई थी। रामवती रामदास के ऊपर लेटकर उसे कसकर दबा देती है। मुँह से चूमने लगती है। कहती है – मेरे वीर सिपाही ने तो कमाल कर दिया। रामदास भी रामवती को प्यार करने लगता है। रामदास कहता है यदि तुम मुझे नौकरी करने के लिए नहीं कहती तो मैं शायद नहीं जाता। तुम्हारे ही कारण मैं सिपाही बन पाया हूँ। बहुत रात तक दोनों सुहाने सपने बुनते हैं। कब नींद पड़ जाती है पता नहीं चलता। सुबह गाँ में हल्ला हो जाता है कि रामदास, उत्तमदास, रामसहाय, महेत्तर सिपाही में भर्ती हो गए हैं। नियुक्ति पत्र मिल गया है। बरामदे में बड़े-बूढ़े बेरोजगार जवान पचास साठ लोग आ जाते हैं। रामदास सभी लोगों को शहर से लाई हुई मिठाई खिलाता है। रामदास नौकरी मिलने की खुशी में फूला नहीं समाता है। झालरदास शांतिबाई भी बेहद खुश होते हैं। चलो बेटे को पुलिस की नौकरी तो मिली। रामदास अपने साथियों के साथ तालाब में स्नान करने जाता है। तालाब में कमल खिले रहते हैं। तालाब का पानी कंचन जैसा चमकता है। घाट के पत्थर से चेहरा देखकर कंघी करते हैं। तालाब के चारों ओर सघन अमराई है। नए पुराने आम, पीपल, नीम के अमराई के बहुत मीठे आम थे। रामदास गाँव के गाँव के अमराई, भोजवा तालाब से कमल फूल, साफ पानी देखकर प्रणाम करता है। जन्म से अभी तक के साथी थे। अब नौकरी में कहां-कहां जाना पड़ेगा। पूरन, उत्तम महेत्तर कहते हैं कि क्या सोच रहे हो रामदास। रामदास की स्मृति वापस आ जाती है। हड़बड़ा कर कहता है – नहीं यार कुच नहीं। मैं सोच रहा था कि इस तरह तालाब में स्नान करने व घनी अमराई की छांव और कहां मिलेगी। पूरन कहता है चल स्नान कर। रामदास घाट से धड़ाम से कूदता है। पानी में डुबकी लगाकर 20 फीट दूर निकल जाता है। सभी साथी पानी में तैरते हुए तालाब के बीच पहुंच जाते हैं। पास के कमल फूल को तोड़कर लाते हैं। तालाब में खूब तैरते हैं। बहुत बड़ा तालाब है। लगभग बीस एकड़ का क्षेत्रफल है। अपार पानी का भण्डार है। विगत साल सौ सालों में नहीं सूखा है। रामदास को एक बड़ी मछली तैरती हुई मिल जाती है। एकदम किनारे सभी साथियों के बीच से पूँछ हिलाती नकल जाती है। लगभग पचास किलो वजन की रही होगी। पानी में सफेद चमक के साथ चमक रही थी। बीच तालाब से घाट में आ जाते हैं। रामदास लोटे में जल लेकर भगवान शिव के जलहरी में चढ़ाता है। कमल के पुष्प को अर्पित करता है। जय भोलेनाथ सदा सहाय करना। सभी साथियों ने पीपल के पेड़ में पानी डाले एवं प्रणाम किए। स्नान करके घर आ गए। सुबह बासी रोटी खाकर बिलासपुर मेडिकल चेकप कराने चले जाते हैं। पुलिस लाइन के डॉक्टर सक्सेना रामदास को बुलाता है। सभी जगह छूकर अंदर भाग को देखकर कोई बीमारी गुप्त तो नहीं है। आंख की जांच करना है। सभी फिट रहता है। रामदास को ओके का प्रमाण पत्र मिल जाता है। उत्तम की आंख थोड़ी कमजोर रहती है। डॉक्टर को रुपए देकर पास करा लेते हैं। महेत्तर, रामसाय को कम सुनाई देने के कारण प्रमाणपत्र देने में आनाकानी करता है। रामदास अनुनय विनय करके सभी साथियों को प्रमाण पत्र दिला देता है। फिर वे बिलासपुर से गाँव लौट आते हैं।
दूसरे दिन सभी अपने कपड़े, सामान, पेटी लेकर पुलिस लाइन बिलासपुर में ज्वाइन करने आ जाते हैं। रक्षित निरीक्षक रामदास दीक्षित योग्यता प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, मेडिकल फिटनेस, ज्वाइनिंग रिपोर्ट को लेता है। सभी लोगों को दो जोड़ी कुरता, हाफपैंट, बैल्ट, जूता, टोपी, बैच, एक पेटी मोजा देते हैं। पहचान के लिए सिपाही क्रमांक देते हैं। रादास को पाँच सौ एक, उत्तमदास को पाँच सौ नब्बे, रामसाय को पाँच सौ पन्द्रह, महेत्तर को पाँच सौ बीस मिलता है। पुलिस लाइन में हाजिरी में सिपाही क्रमांक पुकारा जाता है. बंदूक चलाना सिखाते हैं। सभी रंगरूट पुलिस विभाग की कानून की धाराएं पूछते हैं। लगभग साठ लड़कों को सिपाही प्रशिक्षण के लिए बीस-बीस के समूह में पुलिस प्रशिक्षण स्कूल राजनांदगांव, ग्वालियर, उमरिया भेजते हैं। रामदास को राजनांदगांव, महेत्तर को उमरिया प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है।

एक पुलिस गाड़ी में रामदास एवं अन्य उन्नीस सिपाहियों को राजनांदगांव प्रशिक्षण स्कूल में पहुंचाया जाता है। हवलदार पुर पाटिल पुलिस अधीक्षक का पत्र प्रचार्य को देता है। सभी सिपाहियों को हॉस्टल में बैरक में रुकने के लिए स्तान दे दिया जाताहै। रामदास का प्रशिक्षण शुरू होता है। सुबह पाँच बजे से बहुत कठिन परिश्रम कराते हैं। जमीन खोदना, घास काटना, ईंट गारे ढोना, मिस्त्री के काम, खाना बनाने, कपड़ा धोने, साहब के बच्चों को घुमाना, स्कूल छोड़ना। रामदास कठिन परिश्रम से परेशान हो जाता है। सोचता है इससे तो खेती किसानी ही ठीक थी। परन्तु भविष्य सोचकर वह कड़े मन से प्रशिक्षण लेता है। छुट्टी के दिन रामदास साथियों सहित राजनांदगांव शहर घूमने जाता है। कामठी लाइन, गुड़ाखू लाइन, महामाया पारा, ब्राह्मण पारा होते हुए महामाया मंदिर पहुंच जाते हैं। प्रसिद्ध महामाया मंदिर में नारियल, फूल अगरबत्ती जलाकर पूजा करते हैं। पास के तालाब से राणा के महल, बगीचा, बहुत मनोरम दृश्य देखकर रामदास खुश हो जाता है। रानी तालाब होकर पैदल प्रशक्षण स्कूल पहुंच जाते हैं। रामदास समय पर खाना, सोना, पढ़ना सभी काम समय पर करते थे। रामदास से सभी प्रशिक्षक प्रसन्न रहते हैं। श्री वर्मा प्राचार्य रामदास को बुलाकर पूछते हैं कहाँ के रहने वाले हो। रामदास कहता है – सर, मैं मल्हार के पास गाँव टिकारी का रहने वाला हूँ। वर्मा जी कहते हैं कि – मैं बहुत पहले मस्तूरी थाने में थानेदार था। मस्तूरी थाने के सभी गाँवों को जानता हूं। टिकारी गाँव के भी बहादुर सिंह थानेदार थे। कहाँ हैं। रामदस कहते हैं – सर अभी रायगढ़ थाने के सरिया थाने में पदस्थ हैं। बहुत बढ़िया आदमी हैं। चलो अच्छा हुआ। पहचान के निकल गए। रामदास तुम घर में आते रहना। जी सर कहकर सेलूट मारकर हॉस्टल में चला गया। रामदास भोजन करके कमरे में चला आता है। और रातम में कुछ सीआरपीसी के अध्याय को पढ़ता है।

रविवार गे तिन वर्मा साहब टीआई साहब को निर्देश देते हैं कि नए सिपाहियों को डोंगरगढ़ ले जाकर माँ बम्लेश्वरी के दर्शन एवं भिलाई इस्पात संयंत्र दिखाकर ले आओ। श्री बनाफर सभी रंगरुटों को लारी में भरकर देवी दर्शन कराने ले जाते हैं। रामदास दल के नायक रहते हैं। पहाड़ी के नीचे पार्किंग स्थल पर खड़ी कर देते हैं। सभी लोग नीचे उतर जाते हैं। मंदिर जाने के ले सीढ़ी चढ़ने लगते हैं। सबी रंगरूट जवान थे। दौड़ते-दौड़ते चढ़ जाते हैं। रामदास एवं बनाफर साहब धीरे-धीरे सीढ़ी चढ़ते हैं। जगह-जगह पानी की व्यवस्था थी। पानी पीकर जूतों को एक जगह रखकर नंगे पांव दर्शन के लिए जाते हैं। रामदास दुकान से नारियल, अगरबत्ती, इलायची के प्रसाद, फूलमाला, लाल चुनरी, पट्टी खरीद कर ले जाता है। जय माता दी कहते सभी भक्तजन सीढ़ी चढ़ रहे थे। लाइन से सभी महिला पुरुष पूजा करने जाते हैं। रामदास अगरबताती जलाकर माँ बम्लेश्वरी को दोनों हाथ जोड़कर माथा टेकता है। प्रार्थना करता है कि माँ, मेरे परिवार को सुखी रखना। प्रसाद नारियल पुजारी को देता है। नारियल प्रसाद को चढ़ाकर वह वापस कर देता है। जय माता दी की पट्टी, टिकुली, बंदन, फीता रामदास को प्रसाद के रूप में दे देता है। रामदास मंदिर में बैठकर थकान मिटाता है। सभी जवान मंदिर के चारों ओर खड़े होकर डोंगरगढ़ नगर के दृश्य को देखते हैं। मंदिर से रेलगाड़ी की पांतें साफ-साफ दीखती हैं। पहाड़ी के चारों ओर हरे-भरे वृक्षों की कतारें हैं। मंदिर के चारों ओर बहुत ही मनोहारी दृश्य है। सभी जवान मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरकर कार्यालय के पास बैठ जाते हैं और प्रसाद खाते हैं। रामदास नीचे नारियल को तोड़ता है। प्रसाद सभी लोगों में बांट देता है। जो नहीं आए थे उनके लिए प्रसाद रख लेता है। रामदास जोर से जय बम्लेश्वरी माता बोलता है। पूरी पहाड़ी माता की जयकार से गूँज उठती है। जय माता दी कहते हुए सभी रंगरूट सीढ़ी से पहाड़ी से नीचे उतर जाते हैं। पानी पीकर सभी जवानों को लेकर बनाफर साहब राजनांदगांव प्रशिक्षण स्कूल वापस लौट जाते हैं।

रामदास देवी माँ का प्रसाद लेकर श्री वर्मा साहब के यहाँ जाते हैं। घंटी का बटन दबाते ही वर्मा साहब दरवाजा खोलते हैं। रामदास सेलूट मारता है। सर प्रसाद लाया हूँ। वर्मा ने कहा – लाओ, रामदास कैसा रहा टूर। रामदास – बहुत बढ़िया सर। देवी माँ के दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया सर। वर्मा जी प्रसाद ले लेते हैं। प्रसाद के लिए धन्यवाद। रामदास – धन्यवाद की कोई बात नहीं सर। यह तो मेरा फर्ज है। आप ही की कृपा से देवी दर्शन हुआ सर। नहीं रामदास मैंने देवी माँ की कृपा से ही आदेश दिया था। रामदास जाने के लिए सेलूट मारता है। जय हिंद सर। मुड़कर हॉस्टल चला जाता है। रामदास को कानूनी की अच्छी और पूरी शिक्षा मिलती है। नेक, ईमानदार, सद्चरित्र, अनुशासनप्रिय, न्यायप्रिय, समानता का व्यवहार, दीनहीन की सेवा, सहायता करने का प्रशिक्षण मिलता है। कठिन प्रशिक्षण से रामदास परिपक्व बनता जाता है। राजनांदगांव में गणेश पूजा के लिए गणेश चतुर्थी बहुत धूमदाम से मनाते हैं। जिस गली चौराहे को निकल जाओ, गणेश मूर्ति की भव्य स्थापना रहती है। सिंधी कॉलोनी, कामठी लाइन, रेलवे कॉलोनी, चिखली, नदी चौक, मण्डी समिति, गुजराती समाज मूर्ति स्थापना के साथ भव्य झांकी बनाए रहते हैं। आसपास के गाँवों से झांकियां देखने के लिए बहुत आदमी आते हैं। रामदास एवं साथियों की प्रतिदिन भीड़ नियंत्रण के लिए ड्युटी लगाई जाती हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश मूर्ति के विसर्जन के दिन रात्रि में झांकियों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। एक से पढ़कर एक भव्य झांकियां निकाली जाती हैं। रात आठ बजे से प्रारंभ होकर सुबह पाँच बजे तक सड़कों पर झांकी देखने ग्रमीण महिला पुरुषों की भीड़ लगी रहती है। सभी सड़कों पर भीड़ ही भीड़। रामदास की ड्यूटी पुराना थाना क्षेत्र में लगी रहती है। जहाँ नियंत्रण कक्ष रहता है। पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर, सिटी मजिस्ट्रेट, एसडीएम, नगर निगम अध्यक्ष, कार्यपालन यंत्री सभी वहां बैठते हैं। शोभायात्रा में चलने के लिए कई समितियों में कभी-कभी विवाद हो जाता है। कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक मामले को सलटा लेतेहैं। सुबह पाँच बजे सभी गणेश मूर्तियों का विसर्जन रानीसागर के घाट में कर दिया जाता है। झांकियां अपने-अपने समितियों के साथ बढ़ती हैं। राजनांदगांव के झांकियों को सजा संवार कर रायपुर वाले लाते हैं। रात्रि मे ही शोभायात्राएं निकालते हैं। ऐसी झांकियां आसपास नहीं निकलती हैं। मध्यप्रदेश का इंदौर पहले स्थान पर है। रामदास रात भर झांकियां देखता रहता है। रामदास बहुत आनंद लेता है। सुबह आठ बजे ड्यूटी समाप्त कर हॉस्टल चला जाता है। राजनांदगांव का गणेश समारोह आसपास बहुत प्रसिद्ध है। राजनांदगांव के लोग गणेश पूजा की साल भर प्रतीक्षा करते हैं। जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाचा, गम्मत, पण्डवानी, कवि सम्मेलन, करमा, छत्तीसगढ़ संगीत आरकेस्ट्रा इत्यादि होते रहते हैं।

रामदास बराबर रामवती को चिट्ठी पत्री भेजता रहता था। रामदास अपने साथियों के साथ सभी प्रशिक्षणार्थियों को पाँच दिनों की छुट्टी मिल जाता है। रामदास अपने साथियों के साथ छत्तीसगढ़ में बैठकर बिलासपुर आ जाता है। बिलासपुर में रामदास बेबी के लिए फ्रॉक, रामवती के लिए साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज, माँ के लिए साड़ी, पिताजी के लिए धोती कमीज खरीदता है। मिठाई दुकान से एक किलो बूंदी के लड्डू, एक किलो पेड़ा खरीदता है। शाम को बस मैं बैठकर मस्तूरी चला जाता है। मस्तूरी से साइकिल से टिकारी गाँव पहुंच जाता है। रामवती इंतजार में द्वार पर बैठी बाट जोहती रहती है। एकाएक अपने वीर सिपाही को देखकर चहक उठती है। बरामदे में पिताजी और माँ को चरण छूकर प्रणाम करता है। बेबी को गोदी में लेकर चूमने लगता है। रामवती हँसते हुए चरण छूकर प्रणाम करती है। रामदास घर के भीतर आंगन में जाता है। रामदास आशीर्वाद देता है – दूधो नहाओ पूतो फलो। सौभाग्यवती भवः। आधा दर्जन बच्चे की माँ बनो। रामवती खूब हंसती है। सिपाही ट्रेनिंग में सब सीख रहो कि खूब बच्चे पैदा करो सभी जवानों। देश की सेवा बाद में। क्यों । रामदस घर जाकर रामवती को कसकर पोटार लेता है। रामवती कसमसा जाती है। रामवती कहती है कि माँ आ जाएगी। एक बहुत दिनों के बाद आ रहे हो। कभी हम लोगों की याद आई। रामदास कहता है – पगली कैसे भूल सकता हूँ। तुम तो मेरी जीवनसाथी हो। सुख-दुख के साथी। रामवती कहती है – कौन जाने भइया। कहीँ और तो नहीं ढूंढ लिए हो। रामदास कहता है पानी पिलाओगी या ऐसे ही धमकाती रहोगी। माधुरी बिटिया तंग तो नहीं करती। रामवती कहती है – माधुरी को पिता का दुलार चाहिए। मैं कहां से लाऊँ। बहुत खोजती है। माँ, बाबूजी खेती किसानी में व्यस्त रहते हैं। रामदास मजाक में कहता है माधुरी के लिए बाजार से बाप तो नहीं खरीद लिए। रावती कहती है कि – बाजार में यदि मिले तो खरीद लेती। परन्तु यहां तो कोई नहीं है। शायद शनिचरी बाजार में बिलासपुर में मिल जाते होंगे।

रामदास खूब जोर-जोर से हंसता है। चलो हाथ पैर धो लो – रामदास कहता है। पहले तालाब जाऊँगा। शौच से निपटकर आ रहा हूँ। कपड़े बदलकर लूंगी बनियान में निकल जाता है। भोजवा तालाब में स्नान करके रामदास घर आ जाता है। भोजन करने के के बाद सोने लगते हैं। रामवती रात भर राजनांदगांव के बारे में पूछती है। रामदास सब कुछ बताता है। डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी माँ के बारे बात आते ही रामवती कहती है मुझे भी कभी माँ के दर्शन करा देना। माधुरी दूध पीकर सो जाती है। रामवती रामदास दोनों गप्पें मारकर एक हो जाते हैं। कब नींद आ जाती है पता नहीं चलता। रामवती पति के प्यार दुलार पाकर फूल के कुप्पा हो जाती है। गदगद हो जाती है। फिर नौकरी के प्रथम साड़ी, सभी के लिए नए कपड़े और मिठाई लाया था। रामवती सोचती है इस वर्ष दिवाली अच्छी मनेगी।

रामदास गाँव में पाँच दिन रुक जाता है। दीपावली के दिन रामवती और शांति मिलकर चावल की भिन्न प्रकार की रोटियां बनाती हैं। रामदास की पसंद की खीर-पूरी पकाई जाती है। रामदास पेट भर खाता है। रामवती कहती है – जी भर के खाओ। ये तो पाँच महीने के प्रशिक्षण में नहीं मिल पाया होगा। रामदास बताता है – चार माह हो गए एक टाइप का खाना खाते-खाते। रामवती पंखा झलती रहती है और परोसते भी जाती है। रामदास खाना खाता जाता है। रामदास पेट भरने के बाद ए चम्मच खीर रामवती को भी खिलाता है। शाम को लक्ष्मीपूजा भी नए वस्त्र पहन कर ही करते हैं। माँ पिताजी, माधुरी और रामवती नई साड़ी पहनकर पूजा करती हैं। माँ दीप जलाती जाती है। रामवती दौड़-दौड़ कर सभी जगह आंगन, द्वार, कोठा, कोठी, तुलसी चौका में दीप रखती है। रामदास बेबी को पकड़कर गुमा रहा था। झालर बरामदे में बैठकर गप्पें मार रहे थे। रामदास, सामवती सुरसुरी चकरी जलाकर लक्ष्मी पूजा करते हैं। घर में लक्ष्मी की कमी हो गई थी। जिस कोठी में धान भरा रहता था। अकाल के कारण खाली है। रामदास को दादा-दादी की याद आ जाती है। दाद-दादी के रहते घर धनधान्य से भरा था। आज नहीं है, तो मजा नहीं आ रहा है। रामदास के आंसू टपकने लगते हैं। रामवती भी रोने लगती है। सामवती कोबेटी बराबर मानते थे। रामदास एक बम फटाका गली में फोड़ता है। पूरा गाँव गूँज उठता है। रामवती भी बम फटाका फोड़ती है। शांतिबाई झालरदास गुड़िया को गोदी में लिए दिखा रहे थे। रात के दस बजे तक रामदास अपने साथियों के साथ राजनांदगाव जाने के लिए पूछता है। दीपावली के दूसरे दिन छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से जाना तय होता है। रात में रामवती कहती है कि पाँच माह की खुराक ले लो। बाद में नहीं तो पछताओगे। रामदास जी भर के प्यार करता है। रामवती प्यार पा के गदगद हो जाती है। दूसरे दिन साइकिल से मस्तूरी, मस्तूरी से बस में बैठकर बिलासपुर। बिलासपुर से ट्रेन से राजनांदगांव शाम के पांच बजे पहुंच जाता है।

दूसरे दिन सुबह पाँच बजे से पीटी परेड, दौड़, खेलकूद शुरू हो जाता है। दस बजे से पाँच बजेतक क्लास में पढ़ाई, शाम सात बजे रामदास दीपावली की बधाई देने श्री वर्मा साहब के घर पहुँचता है। वर्मा साहब बाहर चहलकदमी कर रहे थे। रामदास सेलूट मारता है। दीपावली की शुभकामानाएं सर। आपको भी। आओ रामदास। घर में सब ठीक तो हैं। दीपावली ठीक मनी। रामदास कहता है – आपकी कृपा से सब ठीक-ठाक हैं सर। रामदास मिठाई खाओगे। नहीं सर। वर्मा प्लेट में मिठाई ले आते हैं। लो रामदास। एक पीस मिठाई खाता है। अब नहीं सर। गिलास से पानी पीता है, प्लेट गिलास को अंदर रख आता है। रामदास जाने के लिए सेलूट मारता है। पीछे मुड़कर हॉस्टल की ओर चल देता है। भोजन करके चला जाता है। रात में रामवती, माधुरी की याद आती है। माधुरी की मुस्कान को याद कर रामदास मुसकरा देता है। कुछ माह प्रशिक्षण और चलता है। प्रशिक्षण का वार्षिक उत्सव खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। रामदास लम्बी कूद, चार सौ मीटर दौड़, फुटबाल, गोला फेंक में प्रथम आता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी बढ़चढ़ कर भाग लेता है। शाम सात बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम था। रामदास दस साथियों के साथ नृत्य का रिहर्सल दो दिनों से कर रहा था। अच्ची तैयारी कर ली थी। सास्कृतिक कार्यक्रम के उदघाटन पुलिस महानिरीक्षक भिलाई द्वारा सरस्वती के फोटो में फूलमाला चढ़ाया जाता है। दीप जलाकर, अगरबत्ती जलाकर उद्घाटन करता है। दो शब्द कार्यक्रम के बारे में वर्मा जी भी जानकारी देते हैं। महानिरीक्षक महोदय शुभकामनाएं देते हैं। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से होती है।

दूसरा कार्यक्रम करमा गीत नृत्य से शुरू होता है। करमा ददरिया अच्छे ढंग से मंदिर के थाप के साथ प्रस्तुत करते हैं। तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज जाता है। तीसरा कार्यक्रम रामदास पंथी नृत्य प्रस्तुत करता है। रामदास सफेद धोती, सफेद बनियान पैर में घुँघरू, सभी साथियों के साथ चीता जैसी स्फूर्ति से तेज गति से नाचते हुए एक-एक करके दस लोग आते हैं। मांदर, झांझ, मंजीराके साथ पंधी गीत नृत्य प्रस्तुत करते हुए आतेहैं। दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करते हैं।


गीत

तन्ना रे नन्ना, नन्ना हो ललना,
खेले बर आए हे खैलाय बर आए हे
गुरू जग मोहना गुरू मन मोहना,
खेलत खेलत जग हो होलना
तन्ना रे नन्ना, नन्ना हो ललना।।

रामदास के सभी साथी झूम-झूमकर नाचते हैं। संसार में तेज गति के नृत्य पंथी नृत्य कहलाते हैं। रामदास ने झूम-झूमके कला का प्रदर्शन किया। वर्मा जी महानिरीक्षम महोदय को बताते हैं कि रामदास सबसे होशियार, ईमानदार, आज्ञाकारी और सभी खेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रथम रहता है। पंथी नृत्य के बाद छत्तीसगढ़ी नृत्य का कार्यक्रम होता है। कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। प्रथम पुरस्कार रामदास और उसके साथियों को मिलता है। रामदास खुश हो जाता है। दीक्षांत समारोह में देश भक्ति और जन सेवा की शपथ लेते हैं।

दीक्षांत परेड में रामदास प्रथम आता है। मंत्री महोदय द्वारा रामदास को पुरस्कृत किया जाता है। प्रथम आने सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षणार्थी के लिए पुरस्कारस्वरूप एक फीता वाला हवलदार बना दिया जाता है। रामदास प्रशिक्षण प्राप्त कर बिलासपुर पुलिस लाइन ज्वाइन कर लेता है। पुलिस अधीक्षक द्वारा सभी लोगों को पुलिस थाने पदस्थापना का आदेश देता है। रामदास की प्रथम नियुक्ति मुंगेली थाने में की जाती है। उत्तमदास को पण्डरिया, रामसहाय रायपुर के, महेत्तर की पाली थाने में की जाती है।

Jemsbond
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Re: पछतावा

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 03:29

रामदास नियुक्ति पत्र लेकर सीधे बस द्वारा मस्तूरी, मस्तूरी से साइकिल से मल्हार माँ डिडनेश्वरी देवी के दर्शन के लिए पहुंच जाता है। साइकिल आम पेड़ के नीचे खड़ी कर देता है। तालाब में हाथ-पैर धोता है। नारियल, अगरबत्ती, इलायचीदाना का प्रसाद माँ को प्रणाम करते हुए चढ़ाता है। कमल फूल भी माँ के चरणों में अर्पित करता है। नारियल बाहर में तोड़कर प्रसाद आधा पुजारी को देता है। आधा बच्चों के लिए रख लेता है। माँ डिडनेश्वरी देवी की मुख्य प्रतिमा देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। माँ से आशीर्वाद मांगता है – मेरे परिवार को सुखी रखना माँ। मेरी नौकरी सही सलामत रहे। दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके साइकिल से मल्हार से गाँव टिकारी आ जाता है। मल्हार से टिकारी आते समय मुक्तिधाम पड़ता है। पीपल पेड़ के नीचे दादा-दादी का मठ बना हुआ है। रामदास वहां चाकर अगरबत्ती जलाकर प्रणाम करता है। रामदास की आँखों से आंसू बहने लगते हैं। रामदास आशीर्वाद मांगता है दादा-दादी मेरे सिर पर आपकी छांव हमेशा बनी रहे। गाँव के अमरई घने छांव पीपल, नीम, आम के बाग देखकर रामदास खुश हो जाता है। ये ही आम के पेड़ हैं जिसके मीठे फल पत्थर फेंक कर गिराए और चखे हैं। वह भी क्या समय था। मजे ही मजे थे।

रामदास साइकिल से घर पहुंचता है। बरामदे में गली में पचासों लोगों का जमघट। झालरदास वं कई वृद्धजनों को चरण छूकर प्रणाम करता है। साइकिल को लेकर आंगन में खड़ी कर देता है। शांति माधुरी से कहती है – देखो तो कौन आए हैं। तुम्हारे पापा जी आ गए। माधुरी पापा-पापा बोलने लगती है। रामदास माधुरी को गोद में ले लेता है। माँ को प्रणाम करता है। शांति पूछती है – बेटा कहां से आ रहे हो। रामदास कहता है – माँ मेरा प्रशिक्षण समाप्त हो गया है। मेरी पोस्टिंग थाना मुंगेली में हुई है। माधुरी को जोर से हवा में उछालता है। माधुरी हंसती हुई आती है। रामदास माथे को चूम लेता है। रामवती आवाज सुनकर रसोई घर से बाहर निकलती है। रामदास के पैर पड़ती है। रामदास हंसते हुए आशीर्वाद देता है – जुड़वा बच्चे की माँ बनो। रामवती लजा जाती है। कहती हैकि एक बच्ची का पालन-पोषण नहीं हो पा रहा है, इधर आधा दर्जन बच्चों का क्या होगा। रामवती कहती है कि – मैं क्या बच्चे पैदा करने की मशीन हूँ। जो सिर्फ यही कामरह गया है। घर-द्वार खेती किसानी, माँ-बाबूजी की सेवा कौन करेगा। मेरी सौत। रामदास हंसने लगता है – तुम्हारी ये बात सुनने के लिए तो तरस रहा था। माधुरी की एक गाल चुम्बन, माँ की एक गाल में रामदास लेता है। रामवती हंसते हुए साइकिल से सामान उतारती है। अब तो मैं भी साथ रहूँगी। यहां अकेले रहते-रहते थक गई हूँ। बहुत दिन हो गए शादी के बाद प्रताप टाकीज में फिल्म नहीं देखी। जब मैं पढ़ती थी तो गाँव से टांगा में बैटकर फिल्म देखने जाती थी। रामवती कहती है – हाथ पैर दोलो। रामदास मना कर देता है, कहता है – मैं शौच एवं स्नान करने तालाब जाऊँगा। रामवती कहती है – मेरे वीर सिपाही चलो मैं स्नान बाड़ी में करा देती हूँ। कभी-कभी हमको भी तो मौका दो। रामदास कहता है – अभी तो पूरी जिंदगी बची है। थक जाओगी सेवा करते-करते। सिपाही की बीवी बनी हो। कोई अफसर की नहीं। सभी काम अपने हाथों से करना पड़ेगा। गाँव के गोबर उठाने से तो बच जाऊँगी। रामवती कहती है।

रामदास कपड़ो उतार कर लुंगी-बनियान पहनकर भोजवा तालाब स्नान करने चला जाता है। घाट में पहले से बैठे पुराने साथी कहते हैं – नमस्कार भइया। रामदास – नमस्कार भाई। प्रशिक्षण समाप्त हुआ कि नहीं – पूरन पूछता है। रामदास कहता है – मुंगेली थाने में पदस्थापना हुई है। कल उपस्थित होना है। गाँव से मिल कर आ जाऊँ। पूरन व साथी कहते हैं – अब तो मुंगेली घूमने जाया करेंगे। रामदास कहता है – यार पूरन चल कल मुंगेली जाएंगे। पूरन कहता है – अभी तो ज्वाइन होकर आओ। जब भाभी को लेकर जाओगे तो सभी जाएंगे। रामदास लोटे में पानी लेकर घनी अमराई को पार कर खेत में शौच के लिए चला जाता है। अमराई के ऊँचे भाग में पकते हुए पीले-पीले आम चमक रहे थे। रामदास शौच से निपट कर आम को देखने लगता है। दिन डूब चुका था। अंधकार का विस्तार हो रहा था। रामदास ने सोचा चलो रात हो रही है। आम का मजा कभी जीवन रहा तो ले लेंगे। रामदास पचरी घाट में आ जाता है। पूरन से कहता है कि – यार हमारे गाँव का क्या कहना संगी। दूर-दूर गाँव में भोजवा तालाब जैसा पानी नहीं है। चारों तरफ आम के पेड़, हरियाली। तालाब में कमल फूल। बतखें ऐसी पनडुब्बी चिड़ियों की चहचहाट। मनोरम दृश्य हैं सभी। पूरन ने बताया – संगी दो-तीन दिन से हँस-हँसनी का जोड़ा यहाँ तालाब में तैर रहा है। देखने में बड़ा आनन्द आ रहा है। रामदास कहता है – संगी कोई विदेशी पक्षी होगा। पूरन ने बताया कि हँस-हँसिनी सफेद रंग, एक फीट चोंच, लगभग पचास-पचास किलो वजन के एकदम सफेद जोड़ी मछली घूम-घूमकर खाते हैं। सुबह आ जाते हैं, शाम को कहीं चले जाते हैं। रामदास कहता है – संगी उड़ने के लिए पंख हैं, खुला स्तब्ध आसमान है, जहां भूख लगे वहीं डेरा बना लेते हैं। स्वतंत्र घूम-फिर रहे हैं।

रामदास जल्दी से स्नान करने तालाब में कूद जाता है। दूर तैरते हुए निकल जाता है। तैरने का अभ्यास भी हो जाता है। सिर डुबोकर बार-बार डुबकियां लेता है। स्नान करके रामदास व साधी अपने-अपने घर आ जाते हैं। रामवती बाट जोहती रहती है। माँ-बाबूजी देखते हैं कि आज सब साथ में बैठकर खाना खाएंगे। रामवती रामदास से गुस्से में कहती है – हम लोगों के लिए समय नहीं है तुम्हारे पास। रामदास हंसकर कहता है – अब कुछ दिन की और बात है। मुझे मकान मिल जाने दो। फिर तुम्हारे साथ तुम्हारे आँचल में सिर छुपाए दिन भर बैठा रहूंगा। रामवती कहती है – अच्छा-अच्छा। चलो कपड़े बदल लो। बरामदे में माँ-बाबूजी बैठे इंतजार कर रहे हैं। रामदास जल्दी-जल्दी कपड़े बदलकर बरामदे में बैठ जाता है। झालरदास, माँ पूछती है – बेटा कब जा रहे हो। रामदास बताता है – माँ कल मुंगेली थाने में उपस्थिति दर्ज कराऊंगा। वहां पुलिस लाइन में कोई कमरा खाली होगा तो मिल जाएगा। नहीं तो किराए का मकान लेकर आऊंगा। कुल वेतन 85 रुपए महीने मिलेगा। झालर कहता है – इतनी कम रकम में गुजारा कैसे होगा। रामदास – बाबूजी गुजारा तो करना पड़ेगा। नई-नई नौकरी है, देखभाल के ऊँच-नीच देखकर काम चलाना पड़ेगा।

रामवती रसोई से थाली में खान लेकर आती है। थाली में दुबराज चांवल का भात, अरहर की दाल (भुनी हुई) भाजी के साग, लहसुन मिर्च की चटनी, आम का अचार, शुद्ध घी रामवती सबको परोस के रामदास के पास ही बैठ जाती है। शांति माधुरी को रामवती को सौंपती है। रामदास के पास बैठकर वह भी आँचल से हवा करती है। माधुरी पापा की थाली से दाल भात अपने हाथ से निकालकर खाती है। रामदास दाल चांवल की खुशबू से मांग-मांग कर खूब खाता है। रामवती भी आँचल से हवा करती है। बेबी को खिलाती है और रामदास को परोसती जाती है। रामदास भर पेट भोजन कर ओम की डकार करके उठ जाता है। मां-बाबूजी धी रे-धीरे चबाकर भोजन करते हैं। रामदास ने पाँच माह बाद घर का भोजन किया था। रामवती के हाथ के बनाए भोजन का अलग स्वाद मिठास रही है। रामवती हमेशा मन लगाकर ध्यान से भोजन पकाती रही है।

मणिदास, वेदवती भी रामवती की सदा तारीफ करते थे। भोजन करने में आनन्द मिलता है। माधुरी पापा को पाकर फिर किसी के पास जाना नहीं चाहती। माधुरी को मालूम हो जाता है कि पापा बहुत दिन बाद आए हैं और फिर कहीं भाग जाएंगे। रामदास गोदी में लेकर बरामदे गली से घुमाकर लाता है। तब तक रामवती खाना खाकर चौका बर्तन को साफ करने जाती है। तत्पश्चात अपने हाथ-पैर धोकर कमरे में आती है। जहां रामदास सोने के लिए खाट पर बैठा रहता है। रामदास माधुरी को सुलाने का प्रयास करता है। रामवती दरवाजा बंद कर आ जाती है। चुपके रामवती बगल में सो जाती है। बेबी माँ पिताजी को देखकर बहुत खुश होकर हंसती है। माधुरी एक बार माँ सीने पर चढ़कर खेलती है। दूसरे बार पिताजी के सीने में चढ़कर खेलती है। रामवती बेबी को दूध पिलाकर सुलाने का प्रयास करती है। सिर में थपकी देकर सुलाती है। थोड़ी देर में माधुरी सो जाती है। रामदास रामवती एक-दूसरे को प्यार करने लगते हैं। एक जान दो शरीर हो जाते हैं। रामदास पूछता है – घर में कोई तकलीफ तो नहीं है। रामवती कहती है – मुझे क्या तकलीफ होगी। बस, तुम्हारी कमी अखरती है। मुझे धन दौलत कुछ नहीं चाहिए। बस तुम्हारी बाहों का साया हो और क्या। रामदास कहता – कुछ महीने अकेली रह लो। फिर साथ में रहेंगे। रामवती कहती है कि जबसे तुम प्रशिक्षण में गए हो, तुम्हारी चिंता में नींद नहीं आती थी। रात बर करवट बदल-बदल कर आँखों में ही रात काटी है। इधर रात में बेबी पापा को खोजती थी। मैं कहाँ से पापा लाती। रो-रोकर सो जाती थी। अब पहचानने लगी है। माँ-बाबूजी दिनभर खेत में काम करने चले जाते हैं। मैं दिन भर भूतनी बनकर घर में अकेली रहती थी। रामदास और रामवती रात भर सो नहीं पाते। बातें करते चार बज जाते हैं। पाँच माह की दूरी को रात भर में ही पूरा करना चाहते थे। रामवती संतुष्ट हो जाती है। दोनों चार बजे तक जागते हैं। फिर न जाने कब नींद पड़ जाती है पता नहीं चलता। सुबह माधुरी जाग जाती है और सीने से लगकर रोने लगती है। सीने से चिपक जाती है। रामदास बच्ची को प्यार से बाल में हाथ फेरने लगता है। रामवती कपड़े ठीक कर उठ जाती है। रामदास बेबी को गोद में लिए उठता है। रामदास रामवती से कहता है – कुछ रोटी और भात पका ले, मैं शीघ्र स्नान करके तालाब से आता हूं। रामदास लोटा लेकर तालाब के मेड़ के अमराई में चला जाता है। शौच से निवृत्त होकर तालाब के घाट में स्नान करने लगता है। रामदास को देखकर दो-चार लड़के पूछते हैं – भइया... अभी कहां हो। रामदास बोलता है – मुंगेली थाने में ज्वाइन करूंगा। मैं जल्दी में हूँ, अभी जाना है। स्नान कर लोटे में जल लेकर जलहरी में पानी चढ़ाता है। जल्दी-जल्दी पैदल घर पहुंचता है। झालर, माँ दरवाजे के पास बरामदे में बैठकर बेबी को खिलाते रहते हैं। रामदास को देखकर पापा-पापा कहहकर रामदास की गोदी में आ जाती है। रामवती भोजन पकाकर बैठी रहती है। बरामदे में रामदास बैठकर भोजन करता है। रामवती कहती है – जल्दी-ल्दी में सब्जी नही बनी है। रात की दाल को सूखने डाल दिया है। भात-दूध के साथ टमाटर के चटनी, अचार के साथ खाना खा लो। रामदास कहता है – जो भी हो परोस दे। तुम्हारे हाथ के भोजन का अलग स्वाद होता है। रामवती गरम-गरम भात थाली में निकलाती है, गाय का दूध डालती है। थोड़ा-सा शक्कर डालती देती है। रामदास मजे से भोजन करके तैयार हो जाता है। रामदास साइकिल से मस्तूरी और मस्तूरी से बस में बैठकर बिलासपुर आ जाता है। पुलिस लाइन से पेटी-सामान लेकर मुंगेली के लिए फिर बस में बैठ जाता है। बस मुंगेली थाना के सामने रुकती है। रामदास सामान लेकर थाने में पहुंचता है। बड़े मुंशी संतोष मिश्र जी रामदास को थानेदार साहब के निवास में परवाना लेकर भेज देते हैं। थानेदार दलगंज सिंह साहब बरामदे में बैठकर कुछ-लिखा पढ़ी कर रहे थे। रामदास उन्हें देखकर सेल्यूट मारता है। ‘जयहिंद सर’ सिंह साहब पूछते हैं – कहां के रहने वाले हो। रामदास बोलता है कि सर, मैं गाँव टिकारी मस्तूरी के पास का रहने वाला हूँ। सिंह साहब कहते हैं – बैठो-बैठो। टिकारी में मेरा मामा का घर है। बहादुर सिंह नाम है मेरा। रामदास महंत कहता है सर हम लोगों का चेला है। बस क्या था। जान-पहचान होने से तुरंत मिश्रा को बुलाया। मिश्रा से कहा – रामदास को एक कमरा जो खाली है उसे सुपुर्द कर दो। रामदास सेल्यूट कर वापस थाने में आ गया। मुंशी जी ने कहा – रामदास ये लो चाबी। रामदास चाबी लेकर मकान देखने चला गया। मुंशी जी ने कहा – रामदास ये दो कोटवार बैठे हैं। ले जाओ। झाड़ू, साफ-सफाई करवा लो। दो कोटवार लेकर साफ सफाई कराकर अपना पेटी सामान इस बीच कमरे में रख देता है। कोटवार घड़े में पानी भर देता है। रामदास एक कोटवार को बाल्टी, रस्सी मग्गा और गिलास के लिए बाजार भेज देता है। एक काट भी बाजार से खरीद कर ले आता है। इस प्रकार से पहले दिन रात कमरे में काटता है। दूसरे दिन सुबह उठकर शौच, दातून करके तैयार होकर सुबह की हाजिरी में चला जाता है। सभी सिपाही हवलदार, मुंशी से परिचय होता है। सिंह साहब परिचय कराता है – रामदास मेरे मामा के गाँव के हैं। इसलिए सब लोग ठीक से व्यवहार करेंगे। मुंशी जी से कहा जाना है ड्यूटी बता देता है। थाने में ज्यादा स्टाफ नहीं था। एक थानेदार दो सहायक निरीक्षक एक मुंशी दो हवलदार बारह सिपाही थे। रामदास अपने पदोन्नति योग्यता के सोपानों के बारे में बताता है। पहले वह एक फीता वाला हवलदार रहता है। दरोगा साहब के साथ देहात गाँव जाते थे। बुलेट मोटर साइकिल में पीछे में डण्डा पकड़े बैठा रहता है। रामदास को सभी गुर मुंशी जी सिखाते रहते हैं। रामदास बहुत ईमानदार और व्यवहारकुशल सिपाही था। रामदास पुलिस विभाग में रहते प्रचलित व्यवहारों से बहुत दुखी रहता था। पुलिस के डण्डे के डर से करीब लोग कुछ नहीं कहते थे। रामदास को एक माह से अधिक समय हो गया था परन्तु पुलिसिया हरकत नहीं सीख पाया था। सज्जन लोग या अच्छे परिवार के लोग थाने की सीढ़ियां चढ़ना पसंद नहीं करते। शहर गाँ कई परिवारों के कई पीढ़ियों से थाने की सीढ़ी तक नहीं देखी है। पुलिस कर्मचारियों के लट्ठ व्यवहार से अच्छे-अच्छो निडर व्यक्ति की भी घिग्घी बंध जाती है।

थाने के आमने-सामने चेम्बर में दलगंजसिंह बैठे फाइल निपटा रहे थे। सिंह साहब रामदास को बुलाता है। रामदास सेल्यूट कर जयहिंद सर कहता है। सिंह साहब ने कहा – रामदास बैठो। आओ चायपिता हैं। कोटवार को बुलाकर कहा पाँच चाय ले आओ। रामदास ने कहा – सर मैं चाय नहीं पीता. सिंहा साहब ने पूछा तो क्या पीते हो। सर न पीता हूँ न खाता हूँ। मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ। यहां तक पान, सुपारी दारू,-शराब, मांस-मछली कुछ भी नहीं खाता। मैं स्व. मणिदास महंत के परिवार का हूँ। सह हमारे यहां कई पीढ़ियों से मांस नहीं खाते। सतनाम के असली पुजारी हैं सर।

वाह भाई रामदास तुम तो गजब के आदमी हो। तुम्हारे संग जाए तो हम भूखे मर जाएंगे।
नहीं सर, आपके लिए सब व्यवस्था कर देंगे सर।
रामदास मैं तो आधा बकरा खा जाऊँगा। कुछ नहीं होगा बल्कि सबको पचा जाऊँगा। हम तो भाई असुर प्रवृत्ति के हैं। हमें सब चलता है पर तुम पुलिस विभाग के लायक नहीं हो। यहां तो खूब खाओ, सबको खिलाओ। जमकर लूटो। अपना घर भरो।

रामदास कहता है – सर, मैं तो ये सब नहीं करूँगा। सिंह साहब बोले – नहीं तो तुम भूखे मरोगे। रामदास कहता है – सर हम लोगों ने देशभक्ति, जन सेवा का शपथ लिया है। सिंह साहब कते हैं – सभी नौकरी में आने से पहले शपथ लेते हैं। बाद में भूल जाते हैं। रामदास कहता है – सर आपकी कृपा मिल जाए, तो मैं जाकर अपना परिवार ले आता हूँ सर। सिंह साहब कहते हैं – तुम दो दिन की छुट्टी ले लो। पुलिस अधीक्षक कार्यालय की डाक ले जाओ। वहां देकर घर चले जाना। रामदास आवेदन देकर मुंशी जी के पास जाता है। उसी समय एक शराबी को पकड़कर सिपाही हेतराम लाता है। उसे इस कदर लात घूंसों से मारते हैं, जो सिपाही आए वहीं दो लात मारे। शराबी तो पेंट में पेशाब कर डालता है। रामदास दरोगा साहब के पास जाकर कहता है – सर, ज्यादा मारने से मर जाएगा। सर उसे छोड़ दीजिए। मैं इसे पानी पिला देता हूँ। सिंह साहब ने कहा – रामदास तुम इसे पानी पिलाकर सड़क के उस पार छोड़कर आना। साला मर जाएगा तो मेरे मत्थे मढ़ जाएगा। मारे सारे सिपाही, सजा पाए थानेदार। रामदास का दिल दहल जाता है। पुलिस विभाग में तो लगता है मानवीयता, इंसानियत मह गई है। बेचारा शराबी थोड़ी पी क्या गया दुर्गति हो गई।

रामदास दूसरे दिन डाक लेकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाता है। वहां डाक देकर गोलबाजार चला जाता है। वहां बेबी के लिए फ्रॉक, माँ के लिए साड़ी, बाबू जी के लिए धोती खरीदता है। कोहिनूर होटल से एक किलो रसगुल्ला खरीदता है। बस स्टैण्ड जाकर बस से मस्तूरी पहुंच जाता है। रामदास किराए की साइकिल लेकर गाँव टिकारी पहुंच जाता है। बरामदे में दो-चार लोग गप्प मारते रहते हैं। पूरन बेबी को खिलाता रहता है। पूरन जोर से कहता है देखो कौन आ गया ? पापा-पापा माधुरी तुतली भाषा में बोलती है। पूरन उसे गोदी में दे देता है। रामदास बेबी को पकड़कर आंगन में जाता है। तभी पूरन साइकिल का आंगन में लाकर खड़ी कर देता है। रामदास रामवती को पुकारता है। रामवती बाड़ी में मुनगा पेड़ से मुनका पत्ता (भाजी) तोड़ रही थी। पेड़ के ऊपर चढ़ी हुई थी। रामवती दूर नहीं थी चढ़ी थी। ताकि कोई उसे पुकारे तो जल्दी से उतर सके। रामवती ऊपर से चिल्लाती है कि मैं यहां बाड़ी में हूँ। रामदास बेबी को गोदी में उठाए बाड़ी में पहुंच जाता है। पूरन भी साथ रहता है। भौजी ज्यादा ऊपर मत चढ़ना। मुनगा का पेड़ जल्दी टूटने वाला होता है। रामदास कहता है – आ। अब उतर बहुत भाजी तोड़ लिये। आज के बाद नहीं चड़ोगी। रामवती जल्दी-जल्दी पेड़ से उतरती है। रामदास के पैर छूती है। रामवती कहतीहै कि – आज जरूर आओगे ऐसा मेरे को महसूस हो गया था। आज ही सुबह दो कौआ काँव-काँव कर रहे था। मेरा बांया पैर भी खुजला रहा थआ। रामदासपूछता है कि माँ, बाबूजी कहां हैं ? रामवती कहती है कि खेत देखने गए हैं। आने ही वाले हैं। रामवती सजी संवरी रहती है। दो बेनियों में लाल फीता झबुआ, काली नैनों में काजल, लौंग फूल नाक, में फूल कान में, कान में बाली और गालों पर स्नो पाउडर लाली लगाई रहती है। रामदास को अच्छा लगता है। उसके इस रूप को देखकर उसमें काम-इच्छा जागृत हो जाती है। वह उसे आलिंगन में लेने को होता है कि तभी माधुरी जोर से चिल्लाती है पापा-पापा मेरा खिलौना ? रामवती छुड़ाती है। उसी समय दरवाजे पर खटका होता है। माँ-बाबू जी आ जाते हैं। रामदास चरण छूकर प्रणाम करता है। झालरदास पूछता है – कितने समय आए ? दरोगा साहब ने मुझे रहने क्वार्टर दे दिया है और परिवार ले जाने के लिए दो दिन की छुट्टी। शांतिबाई कहता है – बेटा अच्छा है बहू को अपने साथ ले जाओ। वह बेचारी यहां गाँव में उकता रही है। गाँव के कीचड़ से निजात पाएगी।

रामदास बरामदे में आकर बैठ जाता है। दो-चार साथी बैठे रहते हैं। रामदास तालाब नहर की ओर जाने के लिए कहता है। चार-पाँच लोग नहर की ओर चल पड़ते हैं। पूरन, बलदाऊ, रामूं, सोहन बारी-बारी से पूछते हैं सिपाहीका पद कैसा है ? क्या-क्या करना पड़ता है ? रामदास अपना दो माह का अनुभव बताता है। क्या पूछते हो संगी ? पुलिस विभाग डण्डे का विभाग है। डण्डे के जोर से अत्याचार होता है। किसी को मारना-पीटना, बेइज्जत करना, धौंस देना, फर्जी केसों में फंसा देना थोड़ी सी बात है। रुपए ऐंठना, कोई गलती करे तो दूसरे को तंग करना पुलिस विभाग के इन्हीं अत्याचारों से आम नागरिक जरा भी खुश नहीं हैं। दरोगासाहब ने एक दिन मवझे कह दिया कि रामदास तुम इस विभाग के लायक नहीं हो। यहां तो बदमाश लोग ही चाहिए। यहां गुण्डों, बदमाशों, अपराधियोंसे निपटना पड़ता है। नहीं तो पुलिस अधीक्षक थाने में थोड़ी टिकने देंगे। किसी लूप लाइन में डाल देंगे। पुरन व साथी सुनते जाते हैं। सभी पुलिया पर बैठकर गप मारते रहते हैं। पूरन पूछता है कि भर्ती कब हो रही है। जनवरी में भर्ती हो गई ऐसा रामदास कहता है। फिर शौच के लिए सभी साथी तालाब आ जाते हैं। भोजवा तालाब में स्नान करके अपने-अपने घर चले जातेहैं। रामवती दाल-भात, मुनगा भाजी, लाल मिर्च की चटनी काए रहती है। माँ-बाबूजी, रामदास सभी साथ बैठकर खाते हैं। माधुरी को रामदास अपने हाथों से खिलाता है। माधुरी अपने हाथ से भात को फेंककर आती है। रामदास मना करता है। माधुरी दादा के साथ खाने लगती है। उसके बाद दादी के साथ खाने लगती है। सभीके साथ घूम-घूम कर खा रही थी। रामदास की नजर रामवती से मिल जाती है, दोनों हंसते हैं। रामदास खाना खाने लगते हैं। रामदास कहता है – रामवती तुम्हारे हाथ के बनाए भोजन से ही मेरा पेट भरता है। रामवती आंचल से हवा करने लगती है। मुनगा भाजी और परोसती है। मुनगा भाजी और परोसती है। माँ-बाबूजी कहते हैं बेटी अपने लिए बचाया कि नहीं ? रामवती कहती है – अभी बहुत है। रामदास भरपेट भोजन करके ओम की डकार लेते हुए उठता है। उधर शांति माधुरी के हाथ-पांव को दोती है। माधुरी पापा-पापा करकर रामदास के पास आ जाती है।रामदास उसे गोदी में उठाकर आंगन बाड़ी की ओर घूमने जाता है।

रामदास थोड़ी देर बरामदे में बैठकर मां बाबूजी से बात करता है। बताता है कि दरोगासाहब के मामा घर बहादुर सिंह के यहां है। इसलिएदरोगा साहब का स्नेह मेरे ऊपर अधिक है। फिर मैं पुलिस विभाग के प्रपंच में नहीं पड़ा हूँ। झालरदास कहता है – किसी से घूस मत लेना। न किसी गरीब को सताना। माँ कहती है – किसी के हाथ का पान मत खाना। रामदास माँ-बाप की समझाइशों को गांठ बांधकर धर लेता है। झलरदास फिर कहते हैं – बेटा देरे दादा जी पंडित महंत मणिदास महंत का दूर-दूर तक शोर है कि कई अच्छे-अच्छे ईमानदार दानी आदमी थे। अपने दादा जी के सम्मान को ठेस मत पहुंचाना। रामदास कहता है कि पिताजी दादा जी का कुछ असर नाती में भी होता है। मैं दादाजी के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास कर रहा हूँ। माधुरी दूध पीने के लिए रोने लगती है। रामदास माधुरी को परसों ले जाने के लिए कहता है। झालर कहता है कि घर से चावल, दाल, मिर्च, मसाला, अचार ले जाना। रामदास बेबी को लेकर रामवती के पास जाता है। रामवती बर्तन भांडे साफ कर रही थी। चौकर बर्तन कर हाथ पैर धोकर चेहरे में पानी डालकर जल्दी आई। गमछा में मुँह पोंछ कर माधुरी को गोद में ले लेती है और दूध पिलाने लगती है। कहती है – बड़ी पापा की बेटी बनती है और पापा के पास रहती भी नहीं। बेबी छककर दूध पीती है। पेट भर जाने के बाद पापा-पापा कहने लगती है। रामवती कहती है। बड़ी पापा की दुलारी, पापा एक दिन क्या आए तू पापा की हो गई। रामदास बेबी को गोदी में उठा लेता है। थपकी देकर सुलाने का प्रयास करता है। बेबी आँख बंदकर सोती है। पापा भाग न जाएं सोचकर जरा आँख खोलकर देखती भी है। इधर दोनों खूब हंसते हैं। रामवती थपकी देती है। लोरी सुनाती है। फिर बेबी सो जाती है। रामदास व रामवती भी सो जाते हैं।

सुबह उछकर रामदास शौच के लिए नहर किनारे दूर तक तीन-चार किलोमीटर तक चला जाता है। शौच से निपटकर भोजवा तालाब के घाट में बड़ पेड़ के नीचे बैठ जाता है। सभी पुराने साथी, गाँव नव युवक बच्चे मिल जाते हैं। रामदास एकटक समुद्र जैसे तालाब को देखता है। कमल की पत्ती के बीच में ऐरी चिड़िया ची... ची... चिल्लाती रहती है। बतख, बगुला पंख फड़फड़ाकर इधर-उधर भागते रहते हैं। कमल फूल खिले रहते हैं। घाट में छोटी-मोटी मछलियां झुंड के झुंड तैर रही थीं। रामदास को बचपन से अच्छ लगती थी। पास की अमराई से झुंड के झुंड चमगादड़ इधर-उधर उड़ रहे थे। बचपन की स्मृतियां याद आ जाती हैं। हंसकर वह उठ जाता है। तभी पूरन, सोहन, मोहन, नंदू जाते हैं। कहते हैं – भइया, आज तालाब के उस पार तैरकर चलते हैं। उस पार घाट में अशोक, महेत्तर, वीरेन्द्र दिख रहे हैं। रामदास कहता है – चलो उस पार तैरकर चलते हैं। लगभग एक किलोमीटर तैर कर जाते हैं और तुरंत तैर कर वापस आ जाते हैं। तालाब के बीच में कहीं नहीं सुस्ताते (आराम)। घाट में आकर ही दम लेते हैं। रामदास की सांसें फल जाती हैं। जमीन में खड़े होकर दम भरता है। सभी लड़के धीरे-धीरे आ जातेहैं। रामदास तैरने में होशियार था। कमल फूल के कांटे से रामदास के हाथ, पैर, पेट में चिन्ह पड़ गए थे। रामदास पानी में सभी को सहलाता है। बेबी के लिए दो कमल के फूल (कली) को तोड़ लेता है। पूरन ने कमल फूल का कांदा निकाल लिया। कांदा का धोकर पूरन रामदास को खाने के लिए देता है। पानी में रगड़कर धोए और खाए। बहुत आनन्द आया। बहुत दिनों के बाद मिला था यह सब। शहर में कहां मिलेगा ? ये तो प्रकृति के अनुपम उपहार हैं। ये सब चीजें गाँवों में मिलती हैं। रामदास स्नान कर घाट में साथियों को देखते हैं। सभी साथी मिलकर अपने-अपने घर आते हैं। रामदास बरामदे में बैठी माँ से माधुरी बेबी को लेता है। बेबी को उठाकर अंदर चला जाता है। रामवती घर को गोबर से लीप रही थी। चूल्हा-चौकी को लीप रही थी। रामदास बेबी को खाट में बिठाकर कपड़े पहनने लगा। रामवती सभी काम निपटाकर आती है। दूध को गरम गोरसी में रख देती है। रामदास को कहती है मैं कुएं से पानी भरकर लाती हूँ। गली के मोड़ पर रामवती को एकसहेली मिल जाती है। रामवती से पूछती है – कब मुंगेली जा रहे हो ? रामवती कहती है कल पूरा सामान साथ लेकर जाएंगे। अभी से सामान बांधने लगे हैं। रामवती तालाब नहाने के लिए जाती है। शौच से निपटकर घाट में आकर नहाने लगती है। उसकी सुंदरता को देख दूसरी महिलाएं कहती हैं – रामवती तुम्हारे जैसा सुन्दर पूरे गाँव में कोई नहीं है। रामवती साबुन लगाकर नहाती है, बालों को काली मिट्टी से धोती है। कपड़े आदि धोकर रामवती घर लौट आती है।

रामवती कपड़े पहनकर भोजन के लिए रसोई में घुस जाती है। रामदस परछी में बैठकर बेबी को खिलौने देकर खिलाता है। माँ-बाबूजी खेत देखने के लिए चले जाते हैं। शांति गाय के कोठा से गोबर लाकर घूरे में फेंकती है और खेत की तरफ चली जाती है। रामदास रसोई में पहुंच जाता है। रामवती केश सुखाकर चूल्हा जलाती है, लकड़ एवं कंडा रखकर आग लगा देती है। लकड़ी के धुएं से रसोई भर जाती है। रामदास बेबी को लेकर बाहर आ जाता है। दाल के लिए पतीली चढ़ाकर रामदास के पास आकर बैठ जाती है। रामदास कहता है – कुछ खिलाओ, पिलाओ। रामवती कहती है जल्दी से खाना बन जाएगा। मैं चाय बनाकर लाती हूँ। रामदास कहता है – मैं चाय नहीं पीता। दूध दे दो। रामवती एक गिलास। बेबी को दूध पिलाता हूँ। बचे गिलास के दूध को रामदास पीता है। रामवती कहती है – मुंगेली तो ठीक है। रामदास कहता है – सब ठीक है। दोनों, क्या-क्या ले जाना है कहकर गप मारने लगते हैं। बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आती है। रामदास दरवाजा खोलता है, पूरन अपने लड़के को लेकर आता है। दोनों बरामदे में बैठकर बच्चों को खिलाने लगते हैं। दो-चार पढ़ने वाले लड़के आ जाते हैं। रामदास से कहते हैं – भइया हम लोग बेरोजगाह हैं। यदि भर्ती हो तो हम खेत बेचकर रुपए दे देंगे। गाँव की जलालत, जुआ, दारू, चुगली से दूर रहेंगे। आप कम-से-कम गाँव के लफड़े से दूर हो जाएंगे। रामदास आश्वासान देताहै कि जब भी भर्ती होगी चिट्ठी पत्री भेजूंगा। भोजन का समय हो जाता है। रामवती और रामदास दोनों बैठकर भोजन करते हैं। माँ-बाबूजी खेत से आए नहीं रहते हैं। रामदास पचास किलो चावल, दस किलो दाल, मिर्च-मसाले, अचार, थाली, लोटे, गिलास, चार कटोरी, एक-एक हौला, भाद दाल पकाने के लिए गुण्डी, कड़ाही, चम्मच-चमचा, बेलन, चौकी आदि गृहस्थी का सामान तैयार कर लेता है। दूसरे दिन बैलगाड़ी में सामान व रामवती और बेबी को लेकर झालरदास मस्तूरी पहुंचता है। रामदास साइकिल से जल्दी से पहुंचकर किराया जमा करता है। बस खाली मिल जाती है। मस्तूरी से सीधे मुंगेली बस में बैठ जाते हैं। दो बजे मुंगेली घर पहुंच जाते हैं। बस थाने के पास रुकती है। रामवती बेबी को लेकर उतरती है। सामान को बस कंडक्टर निवास तक पहुंचा देता है। रामदास, रामवती सामान को सजाने लगते हैं। बेबी सो जाती है। रसोई के सामान को जमाते हैं। रात का भोजन दोनों मिलकर बनाते हैं और खाना खाकर सो जाते हैं। दूसरे दिन सुबह थाना के सामने हाजिरी में पहुंच जाता है। दरोगा साहेब सबको मुंशी को कहकर ड्यूटी बांट देता है। रामदास की ड्यूटी थाने में सशस्त्र गार्ड के रूप में लगाते हैं। रामदास आठ बजे से 2 बजे तक ड्यूटी करके घर चला जाता है। शाम को मुंगेली का बाजार रामवती को दिखाने, कुछ सामान खरीदने चले जातेहैं। कुछ घर के सामान खरीदकर बेबी के लिए फुग्गा (बेलून) लेकर आ जाते हैं। थानेदार साहब तीन बार आदमी भेजकर पूछ चुके थे कि रामदास को बुलाओ। सिंह साहब रामदास को लेकर चोरी के मामले में तफ्तीश में जाना था। रामदास बेबी को रामवती को पकड़ाकर जल्दी-जल्दी दलगंज सिंह साहब के पास पहुंच जाता है। पास के गांव रानीसागर में एक किराने की दूकान में सेंध मार सामान चुराकर ले गए। रामदास पीछे बंदूक लेकर बैठे थे। थोड़े समय में वहां पहुंच जाते हैं। रामदास मोटरसाइकिल खड़ी करता है। सिंह साहब कोटवार को बोलता है सभी नमस्ते करते हैं। दूकानदास सुधीर गुप्ता कहता है – सर, पीछे से दीवार फोड़कर ले गए हैं। रामदास साथ में पीछे देखता है। दाल की बोरी ले गए थे। रास्ते में गिरा मिला बहुत दूर खेतों तक जहां-जहां गया वहां तक दाल गिरी है। सिंह साबह को बताता है सर उस खेत की ओर भागे हैं। दूकान के अंदर रामदास, सिंह साहब मुआयना करतेहैं। चोर ने कोई सुराग नहीं छोड़ा था। दूकानदार का बयान रामदास लेता है। कोटवार और पड़ोसी का बयान भीलेता है। रामदास कहता है – सर, बयान ले लिए हैं। कोई शक शुभा हो तो बताओ। सुधीर गुप्ता बोलता है – सर हमें नहीं पता। कोटवार से चोर बदमाशों का नाम पूछते हैं। चार-पाँच बदमाशों का नाम बताते हैं। दरोगा साहब कहते हैं – रामदास दूकान से एक किलो काजू, आधा किलो बादाम, आधा किलो किशमिश, एक पाव पिस्ता, एक पाव लौंग इलायची ले लो। रामदास सुधीर से सामान लेता है। कुल दो हजार रुपयों का सामन नए झोले में भरकर दे देता है। रामदास दरोगा साहब से कहता है – सर, दो हजार रुपए देना है। सिंह साहब कहता है – बाद में देंगे। सिंह बुलेट मोटर साइकिल स्टार्ट करता है। रामदास पीछे बैठ जाता है। दरोगा साहब रामदास को फटकारता है – तुम पुलिस विभाग के लायक नहीं हो। जब मेरे साथ रहोगे तो चुपचाप रहना। मैं जैसे कहता हूं करते जाना। नहीं तो भूखे मरोगे। रामदास गलती के लिए माफी मांगताहै। रामदास थानेदार साहब के घर सामान पहुंचाकर आ जाता है। साहब चोरी के निगरानीशुदा बदमाशों को थाने में बुलाने के लिए मुंशी संतोष मिश्रा को हुक्म देते हैं। मिश्रा तत्काल चार सिपाही चारों ओर दौड़ा देता है।

रामदास घर चल देता है। रामवती इंतजार करती रहती है। बेबी रो-धोकर सो जाती है। रामदास हाथ-पैर धोकर भोजन करने के लिए दोनों बैठ जाते हैं। रामदास कहता है कि पुलिस विभाग में डाकू भरे हुए हैं। आज क्या हुआ। बनिया के दूकान में चोरी हो गया था। तफ्तीश के लिए गए थे। दूकानदार के तो चोरी हो गई ऊपर से थानेदार साहब दो हजार रुपए के काजू, किशमिश ले आए। मैं रुपए के लिए बोला तो डांट दिए। और चेतावनी दिए कि मेरे साथ रहोगे तो चुपचाप रहना। रामवती समझाती है कि तुम ईमानदार हो सभी थोड़े ही होंगे। तुम अपना काम करते रहो। दुनिया का ठेका मत लो। पुलिस विभाग ऊपर से लेकर, संत्री से लेकर मंत्री, सिपाही ऊँचे अधिकारी तक है। रामदास तबभी कहता है कि इस विभाग में मानवता नाम की चीज नहीं है। अभी थाने में बदमाशों को बुलाया गयाहै। सभ लोगों की पिटाई हो रही है। कई तो बेकसूर हैं लोग हैं। असली चोर तो भाग गया होगा। परन्तु छोटे-मोटे चोर फंस गए होंगे। जिसने हफ्ता नहीं दिया होगा उसकी पिटाई उस क्षेत्र के सिपाही लात, घूंसों, जूतों से पीट रहे होंगे। रामवती बेकार इस विभाग में आ गया। देशभक्ति, जनसेवा के नाम से जनता को लूट रहे हैं। सिंह साहब जरूर रुपए लौटा देंगे। बहुत बढ़िया अफसर हैं। परन्तु समस्त स्टाफ मुफ्त के राशन, घी, दूध, कपड़े, सोने-चांदी से मालामाल हो रहे हैं। विभाग वेतन क्यों देता है ? वेतन ते मात्र दक्षिणा है सरकार उन्हें मुफ्त में दे रही है। रामवती कहती है – पहले भोजन कर लो। ज्यादा चिंता मत करो। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएगा तो देश का क्या होगा ? जब बाड़ ही खेत को चर जाएगा तो बकरे का क्या दोष। रामदास भोजन करके बेबी को घुमाने थाने की ओर ले जाता है। थाने में मुंशी संतोश मिश्रा, सिपाही रामप्रसाद साहू चोरों की पिटाई कर रहे थे। सबको लाइन में खड़े कर पूछ रहे थे। आखिरी वाले यासीन खां से कहा बता दो नहीं तो मार खाओगे। रामदास की बात मानकर अपनी चोरी कबूल कर लिया। रामदास ने बेबी को घर में पहुंचा दिया और रामप्रसाद के साथ चोरी का माल जप्त कर ले आया। रामदास ने कड़ाई से पूछा तो कैंग का नाम बता दिया। रामदास ने आसपास की चोरी का पता लगा लिया। दरोगा साहब बहुत खुश हुए। चोर एवं गैंग को जेल भेज दिया गया। रामदास की पहली सफलता थी। रामदास अपनी सफलता से बहुत खुश थे। रामवती उसे समय-समय पर समझाती रहती थी – पुलिस विभाग में सभी कर्मचारी, अधिकारी बेईमान, भ्रष्टाचारी नहीं होते परन्तु नब्बे प्रतिशत लोगों का व्यवहार ठीक नहीं है। आचरण भी ठीक नहीं है। इसलिए तो पुलिस विभाग बदनाम है।