प्यार हो तो ऐसा compleet

Discover endless Hindi sex story and novels. Browse hindi sex stories, adult stories ,erotic stories. Visit psychology-21.ru
rajaarkey
Platinum Member
Posts: 3125
Joined: 10 Oct 2014 04:39

Re: प्यार हो तो ऐसा

Unread post by rajaarkey » 03 Nov 2014 00:59

ऱुद्र प्रताप और वीर दौनो के चेहरे गुस्से से लाल हो जाते हैं. दोनो बलवंत की बात सुन कर तिलमिला उठे हैं.

“पिता जी देख लिया सराफ़ात का नतीज़ा आपने, इन गाँव वालो को हमेसा ज़ूते के नीचे रखने की ज़रूरत है. आप सब कुछ मुझ पर छ्चोड़ दीजिए, मैं अभी उस हराम खोर मदन की बहन को नंगी करके यहा घसीट कर लाता हूँ” – वीर प्रताप ने कहा

“वीर शांत रहो, अगर वाकाई में इसमे उस मदन का हाथ है तो हम किसी को नही बक्सेंगे”

वीर दाँत भीच कर रह जाता है

“अपने चाचा को यहा बुला कर लाओ, हम खुद उस से बात करेंगे” --- रुद्र ने बलवंत से कहा

बलवंत अपने चाचा को बुला कर लाता है.

उसका चाचा डरते -डरते ठाकुर के सामने आता है और सर झुका कर चुपचाप खड़ा हो जाता है

“क्या देखा था तुमने कल मंदिर के बाहर, सब सच-सच बताओ” --- रुद्र ने पूछा

“जी मालिक……. मैने वर्षा मेम-साब को मदन से बाते करते देखा था. मैने पेड़ के पीछे खड़े हो कर उनकी बाते भी सुनी थी. मदन, वर्षा मेम-साब को रात में खेत में आने को कह रहा था. बस इतना ही सुना था मैने मालिक… और मुझे कुछ नही पाता”

“अगर ये झूठ हुवा तो हम तुम्हारा वो हाल करेंगे कि तुम सोच भी नही सकते”

“मालिक…. आपसे झूठ बोल कर हम कहा जाएँगे, हम तो आपके गुलाम हैं”

“ठीक है-ठीक है…दफ़ा हो जाओ यहा से”

“जी मालिक”

ये कह कर बलवंत का चाचा वाहा से चला जाता है.

“पिता जी अब सब कुछ मुझ पर छ्चोड़ दीजिए” ---- वीर ने कहा और कह कर कमरे से बाहर चला गया

ऱुद्र प्रताप उसे जाते हुवे देखता रहा, शायद उसकी भी यही इच्छा थी कि मदन के घर को बर्बाद कर दिया जाए, इश्लीए उसने वीर को जाते हुवे नही टोका

“बलवंत, वीर के साथ जाओ और हाँ अपने कुछ ख़ास आदमी साथ ले लो” --- रुद्र प्रताप ने कहा

“जी मालिक”

“क्या तुम्हारी बहन का कुछ पता चला ?”

“वो तो पक्का कहीं किशोर के साथ ही होगी मालिक, वो मिल गया तो मैं उसे जिंदा नही छोड़ूँगा”

“ठीक है…. अब जाओ और वीर का ध्यान रखना”

“आप चिंता मत करो मालिक”

ये कह कर बलवंत वाहा से चला जाता है.

इधर खेत में साधना और उसके पिता जी गुलाब चंद मूह लटकाए बैठे हैं, सुबह से शाम हो चुकी है पर मदन का कहीं आता पता नही. सरिता अपनी मा के पास घर जा चुकी है. वो दोनो इस बात से अंजान हैं कि एक बहुत बड़ा तूफान उनके घर की तरफ बढ़ रहा है, जो कि अगर ना रुका तो उनका सब कुछ निगल जाएगा.

“पिता जी भैया कहा जा सकते हैं ?”

“क्या पता बेटी, अब तो जब वो लोटेगा तो वही बताएगा कि कहा गया था, चल हम घर चलते हैं. मैं खाना खा कर वापस आ जाउन्गा..लगता है आज रात मुझे ही खेत में रुकना पड़ेगा ?”

“तभी वाहा उनके पड़ोसी का लड़का मुन्ना भाग कर आता है”

“दीदी-दीदी तुम्हारे घर पर ठाकुर के लोग हुन्गामा कर रहे हैं”

“कैसा हुंगमा मुन्ना… ये क्या कह रहे हो ?”

“दीदी… तुम घर मत जाना”

“ये सब क्या कह रहे हो तुम ?” साधना ने पूछा

“बेटी मैं जा कर देखता हूँ, तुम यहीं रूको”

“वो….वो ठाकुर का बड़ा बेटा सरिता दीदी के कपड़े उतार कर उन्हे घसीट कर ले जा रहा है, आप घर मत जाना”

“ये सुन कर गुलाब चंद घर की तरफ भागता है”

“पिता जी मैं भी आ रहीं हूँ”

“नही बेटी तुम्हे मेरी कसम… तुम यहीं रूको, मैं देखता हूँ कि क्या बात है” गुलाब चंद रुक कर कहता है और फिर से अपने घर की तरफ दौड़ पड़ता है

“मुन्ना तुम भी जाओ, अंधेरा होने को है”

“दीदी आप को यहा डर नही लगेगा”

“नही लगेगा.. मुन्ना तुम जाओ”

“अगर डर लगे भी ना दीदी… तो भी घर मत आना”

“ये कह कर मुन्ना रोने लगता है, साधना उसकी उन्कहि बात समझ कर उसे गले लगा लेती है और उसकी आँखो में भी आँसू उतर आते हैं”

“जाओ मुन्ना इस से पहले की अंधेरा हो जाए तुम यहा से निकल जाओ”

मुन्ना के जाने के बाद साधना अकेली खेत में बैठी हुई सोचती है कि ‘हे भगवान !! आज ये हमारे साथ क्या हो रहा है ?, दीदी का ख्याल रखना वरना हम जीजा जी को क्या मूह दीखाएँगे

इधर जब गुलाब चंद घर पहुँचता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. उसकी बीवी घर के दरवाजे पर पड़ी मिलती है. कोई भी उसके पास नही है. ठाकुर के दर के कारण कोई भी उसे देखने तक नही आता

rajaarkey
Platinum Member
Posts: 3125
Joined: 10 Oct 2014 04:39

Re: प्यार हो तो ऐसा

Unread post by rajaarkey » 03 Nov 2014 01:00

जब गुलाब चंद अपनी बीवी बिम्ला देवी को उठाने की कोशिस करता है तो वो पता है कि वो मर चुकी है.

“हे भगवान ये कौन से पापो की सज़ा दे रहे हो हमे आज” --- गुलाब चंद रोते हुवे बोलता है और लड़खड़ा कर ज़मीन पर गिर जाता है.

पर सरिता का ख्याल आते ही वो जल्दी ही हड़बड़ाहट में खड़ा होता है और ठाकुर की हवेली की तरफ दौड़ता है.

वो अभी बीच रास्ते में ही पहुँचता है कि उसकी रूह काँप उठती है.

वो देखता है कि उसकी बेटी सरिता के शरीर पर एक भी कपड़ा नही है और वीर प्रताप उसकी पीठ पर चाबुक मार-मार कर उसे आगे बढ़ने पर मजबूर कर रहा है. गुलाब चंद ये सब देख नही पता और लड़खड़ा कर वहीं सड़क पर गिर जाता है.

“चल साली कुतिया, रुकी तो… यहीं तेरी चूत में डंडा डाल दूँगा” --- वीर प्रताप ने चील्ला कर कहा

“मुझे छ्चोड़ दो मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है”

“इस गाँव की लड़कियों की तो मैं बिना कुछ बिगाड़े भी ऐसी तैसी कर देता हूँ, तेरे भाई ने तो फिर भी बहुत बड़ी गुस्ताख़ी की है”

सरिता भी ये बात आछे से जानती थी कि छोटे ठाकुर से ज़ुबान लड़ाना ठीक नही है लेकिन उसके पास कोई चारा भी तो नही था. उसकी इज़्ज़त सरे आम उतार ली गयी थी. उसे सरे आम नंगा घुमाया जा रहा था.

गुलाब चंद मुस्किल से खड़ा होता है और भाग कर वीर के पैरो में गिर जाता है

“छोटे ठाकुर क्या भूल हो गयी हम से जो हमारे साथ ये सब किया जा रहा है”

“ये अपने बेटे मदन से जा कर पूछ, जिश्ने हमारी छोटी बहन को अगवा कर लिया है” – वीर ने गुलाब चंद को लात मारते हुवे कहा

ये सुन कर गुलाब चंद हैरान रह जाता है, लेकिन फिर से होश संभाल कर ठाकुर के कदमो में गिर जाता है

“मेरी बिटिया को छ्चोड़ दो छोटे ठाकुर, इसने तो आपका कुछ नही बिगाड़ा, जैसे ही मदन मिलेगा मैं खुद उसे आपके पास ले आउन्गा”

“तू क्या उसे मेरे पास लाएगा नीच, चल भाग यहा से वरना तेरी बीवी की तरह तू ही मारा जाएगा”

इस बार वीर इतनी ज़ोर से गुलाब चंद के मूह पर लात मारता है कि वो वहीं बेहोश हो कर गिर जाता है.

“पिता जी आप यहा से चले जाओ ?” – सरिता रोते हुवे कहती है

“चल साली आगे बढ़… वरना तेरी चाँदी उधेड़ दूँगा” --- वीर सरिता की पीठ पर चाबुक मारते हुवे कहता है.

वो लड़खड़ा कर दर्द से कराहते हुवे गिर जाती है

“लगता है इसका यहीं काम करना पड़ेगा”

वीर सरिता के बाल पकड़ कर उसे अपने आगे झुकाता है और पीछे से उस में बेरहमी से समा जाता है.

वाहा चारो तरफ सरिता की चीन्ख गूँज उठती है. गाँव के सभी लोग घरो में हैं. वीर के चारो तरफ बस ठाकुर के ही आदमी हैं.

सरिता पीछे मूड कर देखती है, उसके पिता जी अभी भी बेहोश ज़मीन पर पड़े हैं.

“हे भगवान मेरे साथ यही सब करना था तो मुझे ये जींदगी ही क्यों दी थी. मुझे वैसे ही मार देते. ये मौत से बद-तर सज़ा क्यों मिल रही है मुझे”

वीर अपनी हवश शांत करके हट जाता है और कहता है, “जल्दी से इसकी छोटी बहन का भी पता लगाओ, सुना है कि वो बहुत सुन्दर है, उसका भी यही हाल करना है”

“जी मालिक आप चिंता मत करो वो भी मिल जाएगी” --- बलवंत ने हंसते हुवे कहा

सरिता ज़मीन पर गिर जाती है

“चल उठ साली………… तुझे हवेली तक चलना है”


gataank se aage..............
Madan, kishore aur rupa ke gaayab hone ki khabar gaanv mein aag ki tarah fail jaati hai. Par kisi ko ye nahi pata ki thakur rudra pratap ki ladki varsha bhi gaayab hai. Varsha ke gaayab hone ki khabar sirf thakur ki haweli tak shimit hai. Haweli mein sabhi pareshaan hain, aur pareshaan ho bhi kyon na ?, varsha ko dekhne ladke wale aane wale hain aur varsha ka kuch ata pata nahi hai.

5th January 1901
10:00 am

“Arey aap uth gaye” --- renuka ne veer ke paanv chute huve kaha

“Haan uth gaya kyon ? aur ye roj-roj naatak mat kiya kar paanv chune ka”

“Ye naatak nahi hai”

“Chup kar main tujh se subah-subah bahas nahi karna chaahta”

“Pita ji varsha ko lekar pareshaan hain”

“Kyon kya huva ?”

“Varsha ko dekhne ladke wale aane wale hain par….”

“Par kya” – veer ne gusse mein pucha
“par vo ghar mein nahi hai”

“kya bakwaas kar rahi ho, hogi yahin kahin, chal tu apna kaam kar” --- veer ne kaha aur kah kar apne pita ji ke kamre ki taraf chal diya

Rudra pratap apne kamre mein kursi par baitha hai, uske saamne sar jhukaaye uska khaas naukar bhima khada hai. Jaise hi veer kamre mein ghusta hai vo dekhta hai ki uske pita ji bhima se kuch baat kar rahe hain

“Bhima jao mandir ke chaaro taraf dekho, varsha vahin aas paas hogi”

“ji maalik” --- bhima ne sar jhuka kar kaha

“kya huva pita ji” --- veer ne pucha

“pata nahi ye varsha subah-subah kaha chali gayi” --- rudra pratap ne kaha

“acha….to ye renuka theek hi kah rahi thi” --- veer ne kaha

“kya theek kah rahi thi, ushe daant kar rakha karo, bahut jubaan ladaati hai vo”

“maalik mai chalun ?” --- bhima ne pucha

“haan-haan jao, mera muh kya dekh rahe ho, jaldi vaha dekh kar aao, aur haan pujaari se bhi puch lena ki usne varsha ko dekha hai ki nahi”

“ji maalik”

pura din beet jaata hai. mandir ke saath-saath varsha ko dhundne ke liye thakur ke aadmi pura gaanv chaan maarte hain, par unhe varsha ka kuch pata nahi chalta. Ladke wale aa kar chale jaate hain. Chintaao ke baadal ghane hone lagte hain.



“Aisa kaise ho gaya, kaha jaa sakti hai varsha bina bataaye ?” ---- veer ne kaha

rudra pratap chehre par chintaao ke bhaav liye chupchaap baitha hai

tabhi vaha rupa ka bada bhai balwant aata hai, vo sar jhuka kar kahta hai, “thakur sahib agar bura na maane to ek baat kahun”

“haan-haan kaho kya baat hai ?”

“mujhe pata chala hai ki gulab chand ka ladka madan bhi gaayab hai”


“kahna kya chaahte ho tum ?” – rudra pratap ne gusse mein kaha

“gustakhi maaf maalik….. par kahin is sab mein madan ka to haath nahin”

“kya matlab saaf-saaf kaho kya kahna hai?”

“kal mandir ke baahar mere chacha ne madan ko varsha mem-saab se baat karte huve dekha tha”

“varsha ushe jaanti hai, ek baar vo jab khet mein raasta bhatak gayi thi to madan ushe ghar tak chhod kar gaya tha” – rudra pratap ne kaha

“maalik ek baat aur hai jo main aapko bataana chaahta hun”

“haan-haan bataao”

“chacha ne ped ke peeche se unki baate shuni thi, unke anushaar vo raat mein khet mein milne ki baat kar rahe the”

“kya bakwaas kar rahe ho tum, hum tumhaari jubaan kheench lenge”

“gutaakhi maaf maalik…..par jo mujhe pata chala tha vo aapko bata diya, aap chaahe to meri jaan le lijiye lekin is baat par gaur jaroor karein”

Rudra pratap aur veer dauno ke chehre gusse se laal ho jaate hain. Dauno balwant ki baat sun kar tilmila uthe hain.
“Pita ji dekh liya saraafat ka natiza aapne, in gaanv walo ko hamesa zoote ke niche rakhne ki jaroorat hai. Aap sab kuch mujh par chhod dijiye, main abhi us haraam khor madan ki bahan ko nangi karke yaha ghasit kar laata hun” – veer pratap ne kaha

“Veer shaant raho, agar vaakayi mein isme us madan ka haath hai to hum kisi ko nahi baksenge”

Veer daant bheech kar rah jaata hai

“apne chacha ko yaha bula kar laao, hum khud us se baat karenge” --- rudra ne balwant se kaha

balwant apne chacha ko bula kar laata hai.

Uska chacha darte -darte thakur ke saamne aata hai aur sar jhuka kar chupchaap khada ho jaata hai


“kya dekha tha tumne kal mandir ke baahar, sab sach-sach bataao” --- rudra ne pucha

“ji maalik……. maine varsha mem-saab ko madan se baate karte dekha tha. maine ped ke peeche khade ho kar unki baate bhi suni thi. Madan, varsha mem-saab ko raat mein khet mein aane ko kah raha tha. bas itna hi suna tha maine maalik… aur mujhe kuch nahi pata”

“agar ye jhut huva to hum tumhaara vo haal karenge ki tum soch bhi nahi sakte”

“maalik…. aapse jhut bol kar hum kaha jaayenge, hum to aapke gulaam hain”

“theek hai-theek hai…dafa ho jao yaha se”

“ji maalik”
ye kah kar balwant ka chacha vaha se chala jaata hai.

“Pita ji ab sab kuch mujh par chhod dijiye” ---- veer ne kaha aur kah kar kamre se baahar chala gaya

Rudra pratap ushe jaate huve dekhta raha, shaayad uski bhi yahi icha thi ki madan ke ghar ko barbaad kar diya jaaye, ishliye usne veer ko jaate huve nahi toka

“balwant, veer ke saath jao aur haan apne kuch khaas aadmi saath ley lo” --- rudra pratap ne kaha

“Ji maalik”

“Kya tumhaari bahan ka kuch pata chala ?”

“vo to pakka kahin kishore ke saath hi hogi maalik, vo mil gaya to main ushe jinda nahi chodunga”

“Theek hai…. ab jao aur veer ka dhyaan rakhna”

“Aap chinta mat karo maalik”

Ye kah kar balwant vaha se chala jaata hai.

Idhar khet mein sadhna aur uske pita ji gulab chand muh latkaaye baithe hain, subah se shaam ho chuki hai par madan ka kahin ata pata nahi. Sarita apni ma ke paas ghar ja chuki hai. Vo dono is baat se anjaan hain ki ek bahut bada toofan unke ghar ki taraf badh raha hai, jo ki agar na ruka to unka sab kuch nigal jaayega.
“Pita ji bhaiya kaha jaa sakte hain ?”

“Kya pata beti, ab to jab vo lotega to vahi bataayega ki kaha gaya tha, chal hum ghar chalte hain. Main khaana kha kar vaapas aa jaaunga..lagta hai aaj raat mujhe hi khet mein rukna padega ?”

“Tabhi vaha unke padosi ka ladka munna bhaag kar aata hai”

“Didi-didi tumhaare ghar par thakur ke log hungaama kar rahe hain”

“Kaisa hungama munna… ye kya kah rahe ho ?”

“Didi… tum ghar mat jaana”

“Ye sab kya kah rahe ho tum ?” sadhna ne pucha

“Beti main jaa kar dekhta hun, tum yahin ruko”

“Vo….vo thakur ka bada beta sarita didi ke kapde utaar kar unhe ghasit kar ley jaa raha hai, aap ghar mat jaana”

“Ye sun kar gulab chand ghar ki taraf bhaagta hai”

“Pita ji main bhi aa rahin hun”

“Nahi beti tumhe meri kasam… tum yahin ruko, main dekhta hun ki kya baat hai” gulab chand ruk kar kahta hai aur phir se apne ghar ki taraf daud padta hai

“Munna tum bhi jao, andhera hone ko hai”

“Didi aap ko yaha dar nahi lagega”

“Nahi lagega.. munna tum jao”

“Agar dar lage bhi na didi… to bhi ghar mat aana”

“Ye kah kar munna rone lagta hai, sadhna uski unkahi baat samajh kar ushe gale laga leti hai aur uski aankho mein bhi aansu utar aate hain”

“Jao munna is se pehle ki andhera ho jaaye tum yaha se nikal jao”

Munna ke jaane ke baad sadhna akeli khet mein baithi huyi sochti hai ki ‘hey bhagvaan !! aaj ye hamaare saath kya ho raha hai ?, didi ka khyaal rakhna varna hum jija ji ko kya muh deekhaayenge


Idhar jab gulab chand ghar pahunchta hai tab tak bahut der ho chuki hoti hai. Uski biwi ghar ke darwaaje par padi milti hai. Koyi bhi uske paas nahi hai. Thakur ke dar ke kaaran koyi bhi ushe dekhne tak nahi aata

Jab gulab chand apni biwi bimla devi ko uthaane ki koshis karta hai to vo pata hai ki vo mar chuki hai.

“Hey bhagvaan ye kaun se paapo ki saja de rahe ho hame aaj” --- gulab chand rote huve bolta hai aur ladkhada kar jamin par gir jaata hai.


Par sarita ka khyaal aate hi vo jaldi hi hadbadaahat mein khada hota hai aur thakur ki haweli ki taraf daudta hai.

Vo abhi beech raste mein hi pahunchta hai ki uski ruh kaanp uthti hai.

Vo dekhta hai ki uski beti sarita ke sharir par ek bhi kapda nahi hai aur veer pratap uski peeth par chaabuk maar-maar kar ushe aage badhne par majboor kar raha hai. Gulab chand ye sab dekh nahi pata aur ladkhada kar vahin sadak par gir jaata hai.

“Chal saali kuttiya, ruki to… yahin teri c*** mein danda daal dunga” --- veer pratap ne cheella kar kaha

“Mujhe chhod do maine tumhaara kya bigaada hai”

“Is gaanv ki ladkiyon ki to main bina kuch bigaade bhi aisi taisi kar deta hun, tere bhai ne to phir bhi bahut badi gustaakhi ki hai”


Sarita bhi ye baat ache se jaanti thi ki chote thakur se jubaan ladaana theek nahi hai lekin uske paas koyi chaara bhi to nahi tha. Uski izzat sare aam utaar li gayi thi. Ushe sare aam nanga ghumaaya ja raha tha.

Gulab chand muskil se khada hota hai aur bhaag kar veer ke pairo mein gir jaata hai

“Chote thakur kya bhool ho gayi hum se jo hamaare saaath ye sab kiya ja raha hai”
“Ye apne bete madan se ja kar puch, jishne hamaari choti bahan ko agva kar liya hai” – veer ne gulab chand ko laat maarte huve kaha

Ye sun kar gulab chand hairaan rah jaata hai, lekin phir se hosh sambhaal kar thakur ke kadmo mein gir jaata hai

“Meri bitiya ko chhod do chote thakur, ishne to aapka kuch nahi bigaada, jaise hi madan milega main khud ushe aapke paas ley aaunga”

“Tu kya ushe mere paas laayega neech, chal bhaag yaha se varna teri biwi ki tarah tu hi maara jaayega”


Is baar veer itni jor se gulab chand ke muh par laat maarta hai ki vo vahin behosh ho kar gir jaata hai.


“Pita ji aap yaha se chale jao ?” – sarita rote huve kahti hai

“Chal saali aage badh… varna teri chamdi udhed dunga” --- veer sarita ki peeth par chaabuk maarte huve kahta hai.

Vo ladkhada kar dard se karaahte huve gir jaati hai

“Lagta hai iska yahin kaam karna padega”

Veer sarita ke baal pakad kar ushe apne aage jhukaata hai aur peeche se us mein berahmi se sama jaata hai.

Vaha charo taraf sarita ki cheenkh gunj uthti hai. Gaanv ke sabhi log gharo mein hain. Veer ke charo taraf bas thakur ke hi aadmi hain.

Sarita peeche mud kar dekhti hai, ushke pita ji abhi bhi behosh jamin par pade hain.

“Hey bhagvaan mere saath yahi sab karna tha to mujhe ye jeendagi hi kyon di thi. Mujhe vaise hi maar dete. Ye maut se bud-tar saja kyon mil rahi hai mujhe”


Veer apni havash shaant karke hat jaata hai aur kahta hai, “jaldi se iski choti bahan ka bhi pata lagaao, suna hai ki vo bahut sunder hai, ushka bhi yahi haal karna hai”

“Ji maalik aap chinta mat karo vo bhi mil jaayegi” --- balwant ne hanste huve kaha

Sarita jamin par gir jaati hai

“Chal uth saali………… tujhe haweli tak chalna hai”









rajaarkey
Platinum Member
Posts: 3125
Joined: 10 Oct 2014 04:39

Re: प्यार हो तो ऐसा

Unread post by rajaarkey » 03 Nov 2014 01:01

प्यार हो तो ऐसा पार्ट--4



गतान्क से आगे..............

“चल अंदर” वीर ने सरिता को हवेली के एक कमरे में धकेलते हुवे कहा

सरिता ने रोते हुवे मूड कर उसकी और देखा.

“देख क्या रही है, सूकर मना तू अभी तक ज़िंदा है” --- वीर प्रताप ने कहा


रेणुका दूर खड़ी हुई सब कुछ देख रही है. उसने ऐसा आज तक अपनी जींदगी में नही देखा, इश्लीए बहुत हैरान और परेशान है. वो दौड़ कर रुद्र प्रताप के कमरे में जाती है

“पिता जी-पिता जी….. देखिए ये किशे यहा उठा लाए हैं…आप इन्हे रोकते क्यों नही ?”


“चुप रहो बहू, एक साल हो गया तुम्हे इस घर में आए… पर तुमने अब तक ये नही सीखा कि इस घर की औरते ज़ुबान नही चलाती”

“माफ़ करना….पिता जी… पर जो कुछ ये कर रहे हैं… ग़लत कर रहे हैं. एक औरत को यहा ऐसी हालत में घसीट कर लाए हैं कि मैं कह नही सकती”


“वीर !!!” --- रुद्र प्रताप ने चील्ला कर आवाज़ लगाई


वीर भाग कर वाहा आता है

“जी पिता जी क्या हुवा ?”


“बहू से कहो यहा से चली जाए वरना हम अपना आपा खो बैठेंगे….. अब ये हमे बताएगी कि हम क्या करें क्या नही”


वीर ने तुरंत रेणुका की ओर बढ़ कर उसके बाल पकड़ लिए और चील्ला कर बोला, “क्या तकलीफ़ है तुम्हारी”


“आहह क..क..कुछ नही मैं तो बस पिता जी से ये कह रही थी कि ये जो हो रहा है ग़लत हो रहा है” --- रेणुका ने कराहते हुवे कहा


“और जो हमारी वर्षा के साथ हुवा वो क्या सही था ?” वीर ने पूछा


वीर रेणुका के बाल खींचते हुवे उशे अपने कमरे तक ले आया और उशे बिस्तर पर पटक दिया और बोला, “खबरदार जो आज के बाद यहा किशी से कुछ बोला तो, मुझ से बुरा कोई नही होगा”


“आप से बुरा… कोई है भी नही दुनिया में”

“बिल्कुल सही, बहुत जल्दी समझ में आ गया तुझे”


तभी वीर को बाहर से आवाज़ आती है

“छोटे मालिक”


वीर बाहर आ कर पूछता है

“क्या बात है बलवंत ?”


“मालिक मैं कुछ आदमियों को लेकर पीछे के खेतो में जा रहा हूँ, मुझे यकीन है कि मदन की छोटी बहन वहीं छुपी होगी”


“रूको मैं भी साथ चलूँगा ?”

“ठीक है मालिक चलिए”



“भीमा !!” वीर भीमा को आवाज़ लगाता है

भीमा भाग कर आता है और सिर झुका कर कहता है , “जी मालिक ?”


“वो बाहर के कमरे का ताला लगा दो, हम अभी आते हैं”

“जो हूकम मालिक”

वीर बलवंत और उसके साथियों के साथ हवेली के पीछे के खेतो की तरफ चल पड़ता है


खेत में साधना बड़ी असमंजस की हालत में है. वो मन ही मन सोच रही है कि वो घर जाए या फिर यहीं खेत में बैठी रहे. एक पल वो मदन के लिए परेशान होती है…. और दूसरे ही पल सरिता के लिए. वो इस बात से अभी अंजान है कि उसकी मा मर चुकी है, उसके पिता जी सड़क पर बेहोश पड़े हैं और उसकी बहन सरिता ठाकुर की हवेली में क़ैद है. वो इस बात से भी बेख़बर है कि वीर प्रताप कुछ लोगो के साथ उसकी तरफ बढ़ रहा है



अचानक साधना को किसी के आने की हुलचल सुनाई देती है. साधना भाग कर मक्की की फसलों में छुप जाती है.


“पूरा खेत छान मारो वो यही कही होगी ?” वीर ने कहा

“छोटे ठाकुर आप चिंता मत करो वो यहा से बच कर नही जा पाएगी” – बलवंत ने कहा


ठाकुर के आदमी पूरे खेत में फैल जाते हैं.


साधना, वीर और बलवंत की बाते सुन लेती है और समझ जाती है कि वो लोग उशे ढूंड रहे हैं.


“मालिक मैं यहा सामने की फसलों में देखता हूँ” --- बलवंत ने कहा


“हां-हां देखो, जल्दी ढूंड कर लाओ उशे”


साधना के दिल की धड़कन बढ़ जाती है क्योंकि बलवंत उशी की तरफ बढ़ रहा है.



पर तभी वीर के पास कल्लू चीखता हुवा आता है


“मालिक-मालिक लगता है वो लड़की जंगल में घुस्स गयी”


ये सुन कर बलवंत वापिस मूड जाता है और कल्लू से पूछता है

“क्या बकवास कर रहे हो… उस जुंगल में लोग दिन में जाने से डरते हैं, अब रात होने को है, वो लड़की भला वाहा कैसे जाएगी” --- बलवंत ने कहा