Thriller -इंतकाम की आग compleet

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raj..
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Re: Thriller -इंतकाम की आग

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 02:46

फिर से दोनो ने कुछ फ़ैसला किए जैसे एक दूसरे की ज़ोर से ताली बजाई और फिर से ज़ोर से हंस ने लगे.

रात को हॉस्टिल के गलियारे मे घना अंधेरा था, गलियारे के लाइट्स या तो किसी ने चोरी किए होंगे या लड़को ने तोड़ दिए होंगे. एक काला साया धीरे धीरे उस गलियारे मे चल रहा था, और वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर शरद, सुधीर और उसके दो दोस्त संतोष और एक साथी एक खंबे के पीछे छुप कर बैठे थे. उन्होने पक्का फ़ैसला किया था कि आज किसी भी हाल मे इस चोर को पकड़ कर हॉस्टिल की लगभग रोज होने वाली चोरियाँ रोकनी है. काफ़ी समय से वे वहाँ छिप कर चोर की राह देख रहे थे. आख़िर वह साया उन्हे दिखते ही उनके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी.

चलो इतने देर से रुके.... आख़िर मेहनत रंग लाई...

खुशी के मारे उनमे खुसुर फुसुर होने लगी.

"आए चुप रहो... यही अच्छा मौका है... साले को रंगे हाथ पकड़ने का" शरद ने सबको चुप रहने की हिदायत दी.

वे वहाँ से छिपते हुए सामने जाकर एक दूसरे खंबे के पीछे छुप गये.

उन्होने चोर को पकड़ ने की पूरी प्लॅनिंग और तैय्यारि कर रखी थी. चारों ने आपस मे काम बाँट लिया था. उन चारों मे एक लड़का अपने कंधे पर एक काला ब्लंकेट संभाल रहा था.

"देखो.... वह रुक गया.... साले की रपट ही करेंगे..."शरद धीरे से बोला.

वह साया गलियारे मे चलते हुए एक रूम के सामने रुक गया.

"अरे ये किस की रूम है वह...?" संतोष ने पूछा.

"अंकिता की...." सुधीर ने धीमे स्वर मे जवाब दिया.

वह काला साया अंकिता के दरवाजे के सामने रुका और अंकिता के दरवाजे के की होल मे अपने पास की चाबी डालकर घूमने लगा.

"देखो उसके पास चाबी भी है..." शरद फुसफुसाया.

"मास्टर के होगी..." सुधीर ने कहा.

"या ड्यूप्लिकेट बनाकर ली होगी साले ने..." संतोष ने कहा.

"अब तो वह बिल्कुल मुकर नही पाएगा... हम उसे अब राइड हॅंड पकड़ सकते है..." शरद ने कहा.

शरद और सुधीर ने पीछे मुड़कर उनके दो साथियों को इशारा किया.

"चलो... यह एकदम सही वक्त है..." सुधीर ने कहा.

वह साया अब ताला खोलने की कोशिश करने लगा.

सब लोगों ने एकदम उस काले साए पर हल्ला बोल दिया. सुधीर ने उस साए के शरीर पर उसके दोस्त के कंधे पर जो था वह ब्लंकेट लपेट दिया और शरद ने उस साए को ब्लंकेट के साथ कस कर पकड़ लिया.

"पहले साले को मारो..." संतोष चिल्लाया.

सब लोग मिल कर अब उस चोर की धुलाई करने लगे.

"कैसा हाथ आया रे साले..." सुधीर ने कहा.

"आए साले... दिखा अब कहाँ छुपा कर रखा है तूने हॉस्टिल का सारा चोरी किया हुआ माल..." संतोष ने कहा.

ब्लंकेट के अंदर से 'आह उउउः' ऐसा दबा हुआ स्वर आने लगा.

अचानक सामने का दरवाजा खुला और अंकिता गड़बड़ाई हुई दरवाजे से बाहर आगयि. शायद उसे उसके रूम के सामने चल रहे धाँधली की आहट हुई होगी. कमरे मे जल रही लाइट की रोशनी अब उस ब्लंकेट मे लिपटे चोर के शरीर पर पड़ गयी.

"क्या चल रहा है यहाँ..." अंकिता घबराए हुए हाल मे हिम्मत बटोरती हुई बोली.

"हमने चोर को पकड़ा है..." सुधीर ने कहा.

"ये तुम्हारा कमरा ड्यूप्लिकेट चाबी से खोल रहा था..." शरद ने कहा.

उस चोर को ब्लंकेट के साथ पकड़े हुए हाल मे शरद को उस चोर के शरीर पर कुछ अजीब सा लगा. धाँधली मे उसने क्या है यह टटोलने के लिए ब्लंकेट के अंदर से अपने हाथ डाले. शरद ने हाथ अंदर डालने से उसकी उस साए पर की पकड़ ढीली हो गयी और वह साया ब्लंकेट से बाहर आगेया.

raj..
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Re: Thriller -इंतकाम की आग

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 02:46

"ओह माइ गॉड मीनू!" अंकिता चिल्लाई...

मीनू उनके ही क्लास की एक सुंदर स्टूडेंट थी. वह ब्लंकेट से बाहर आई और अभी भी असमंजस के स्थिति मे शरद उसके दोनो उरोज अपने हाथ मे कस कर पकड़ा हुआ था. उसने खुद को छुड़ा लिया और एक ज़ोर का तमाचा शरद के कान के नीचे जड़ दिया.

शरद को क्या बोले कुछ समझ मे नही रहा था वह बोला, "आइ आम सौरी... आइ आम रियली सौरी..."

"वी आर सौरी..." सुधीर ने भी कहा.

"लेकिन इतने रात गये तुम यहाँ क्या कर रही हो...?" अंकिता मीनू के पास जाते हुए बोली.

"ईडियट... आइ वाज़ ट्राइयिंग टू सर्प्राइज़ यू... तुम्हे जन्मदिन की शुब्कामनाए देने आई थी में.." मीनू उसपर चिढ़ते हुए बोली.

"ओह्ह्ह.... थॅंक यू... आइ मीन सौररी.... आइ मीन आर यू ओके...?" अंकिता को क्या बोले कुछ समझ नही आ रहा था.

अंकिता मीनू को रूम मे ले गयी और शरद फिर से माफी माँगने के लिए रूम मे जाने लगा तो दरवाजा उसके मुँह पर धडाम से बंद हो गया.

क्लास चल रहा था. क्लास मे शरद और सुधीर पास-पास बैठे थे. शरद का ख़याल बिल्कुल क्लास मे नही था. वह बैचेन लग रहा था और अस्वस्थता से क्लास ख़त्म होने की राह देख रहा था उसने एकबार पूरे क्लास पर अपनी नज़र घुमाई, ख़ासकर मीनू की तरफ देखा. लेकिन उसका कहाँ उसकी तरफ ध्यान था? वह तो अपनी नोट्स लेने मे व्यस्त थी. कल रात का वाक़या याद कर शरद को फिर से अपराधी जैसा लगने लगा.

उस बेचारी को क्या लगा होगा....?

इतने सारे लोगों के सामने और अंकिता के सामने मैने...

नही मेने ऐसा नही करना चाहिए था....

लेकिन जो भी हुआ वह ग़लती से हुआ....

मुझे क्या मालूम था कि वह चोर ना होकर मीनू थी...

नही मुझे उसकी माफी माँगनी चाहिए....

लेकिन कल तो मेने उसकी माफी माँगने का प्रयास किया था....

तो उसने धडाम से गुस्से से दरवाज़ा बंद किया था....

नही मुझे वह जब तक माफ़ नही करती तब तक माफी माँगते ही रहना चाहिए...

उसके दिमाग़ मे विचारों का तूफान उमड़ पड़ा था. इतने मे पीरियड बेल बजी. शायद ब्रेक हो गया था.

चलो यह अच्छा मौका है...

उससे माफी माँगने का....

वह उठकर उसके पास जाने ही वाला था इतने मे वह लड़कियों की भीड़ मे कहीं गुम हो गयी थी.

ब्रेक की वजह से कॉलेज के गलियारे मे स्टूडेंट्स की भीड़ जमा हो गयी थी. छोटे छोटे समूह बनाकर गप्पे मारते हुए स्टूडेंट्स सब तरफ फैल गये थे, और उस भीड़ से रास्ता निकालते हुए शरद और सुधीर उस भीड़ मे मीनू को ढूँढ रहे थे.

कहाँ गयी...?

अभी तो लड़कियों की भीड़ मे क्लास से बाहर जाते हुए दिखी थी..

वे दोनो इधर उधर देखते हुए उसे ढूँढ ने की कोशिश करने लगे. आख़िर एक जगह कोने मे उन्हे अपने दोस्तों के साथ बाते करती हुई मीनू दिख गयी.

"चलो मेरे साथ..." शरद ने अपने दोस्तो से कहा.

"हम किस लिए... हम यहीं रुकते है... तुम ही जाओ..." सुधीर ने कहा.

"अबे... साथ तो चलो..." शरद उनको लगभग पकड़कर मीनू के पास ले गया.

जब शरद और सुधीर उसके पास गये तब उसका ख़याल इन लोगों की तरफ नही था. वह अपनी गप्पे मारने मे मशगूल थी. मीनू ने गप्पे मारते हुए एक नज़र उनपर डाली और उनकी तरफ ध्यान ना देते हुए अपनी बातों मे ही व्यस्त रही. शरद ने उसके और पास जाकर उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया. लेकिन बार बार वह उनकी तरफ ध्यान ना देते हुए उन्हे टालने का प्रयास कर रही थी. उधर उनसे काफ़ी दूर संतोष गलियारे से जा रहा था वह शरद की तरफ देख कर मुस्कुराया और उसने अपना अंगूठा दिखा कर उसे बेस्ट ऑफ लक विश किया.

"मीनू.... आइ म सौरी..." शरद को इतने लड़को लड़कियों की भीड़ मे शर्म भी आ रही थी. फिर भी धाँढस बाँधते हुए उसने कहा.

मीनू ने एक कॅषुयल नज़र उसपर डाली.

शरद की गड़बड़ी हुई दशा देख कर उसके दोस्तों ने अब सिचुयेशन अपने हाथ मे ली.

"आक्च्युयली हम एक चोर को पकड़ ने की कोशिश कर रहे थे..." सुधीर ने कहा.

"हाँ ना... वह रोज हॉस्टिल मे चोरी कर रहा था..." संतोष उनके करीब आता हुआ बोला.

शरद अब अपनी गड़बड़ी भरी दशा से काफ़ी उभर गया था. उसने फिर से हिम्मत कर अपनी रात जारी रखी, "मीनू... आइ एम सौरी... आइ रियली डिड्न'ट मीन इट... में तो उस चोर को पकड़ने की..."

शरद हाथों के अलग अलग इशारों से अपने भाव व्यक्त करने की कोशिश कर रहा था. वह क्या बोल रहा था और क्या इशारे कर रहा था उसका उसको ही समझ नही आ रहा था. आख़िर वह एक हाव-भाव के पोज़िशन मे रुका. जब वह रुका तब उसके ख़याल मे आया कि, भले ही स्पर्श ना कर रहे हो, लेकिन उसके दोनो हाथ फिर से मीनू के ऊरोजो के आसपास थे. वह मीनू के भी ख़याल मे आया. उसने झट से अपने हाथ पीछे खींच लिए. उसने गुस्से से भरा एक कटाक्ष उसके उपर डाला और फिर से एक ज़ोर का थप्पड़ उसके गालपर जड़ करचिढ़कर बोली, "बदतमीज़...."

इसके पहले कि शरद फिर से संभाल कर कुछ बोले वह गुस्से से पैर पटकती हुई वहाँ से चली गयी थी. जब वह होश मे आया वह दूर जा चुकी थी और शरद अपना गाल सहलाते हुए वहाँ खड़ा था.

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क्रमशः…………………..

raj..
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Re: Thriller -इंतकाम की आग

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 02:47

इंतकाम की आग--8

गतान्क से आगे………………………

शाम का समय था. अपनी शॉपिंग से लदी हुई बॅग संभालती हुई मीनू फुटपाथ से जा रही थी. वैसे अब खरीदने को कुछ ख़ास नही बच्चा था. सिर्फ़ एक-दो चीज़े खरीदने की बची थी.

वह चीज़े खरीद ली के फिर घर ही वापस जाना है...

वह बची हुई एक-दो चीज़े लेकर जब वापस जाने के लिए निकली तब लगभग अंधेरा होने को आया था और रास्ते पर भी बहुत कम लोग बचे थे. चलते चलते मीनू के अचानक ख़याल मे आया कि बहुत देर से कोई उसका पीछा कर रहा है. उसकी पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नही बन रही थी. वह वैसे ही चलती रही फिर भी उसका पीछा जारी है इसका उसे एहसास हुआ. अब वह घबरा गयी. पीछे मुड़कर ना देखते हुए वह वैसे ही ज़ोर से आगे चलने लगी.

इतने मे उसे पीछे से आवाज़ आई, "मीनू..."

वह एक पल रुकी और फिर चलने लगी.

पीछे से फिर से आवाज़ आया, "मीनू..."

आवाज़ के लहजेसे नही लग रहा था कि पीछा करने वाले का कोई ग़लत इरादा हो. मीनू नेचलते चलते ही पीछे मुड़कर देखा. पीछे शरद को देखते ही वह रुक गयी. उसके चेहरे पर परेशानी के भाव दिखने लगे.

यह इधर भी....

अब तो सर पटाकने की नौबत आई है...

वह एक बड़ा फूलों का गुलदस्ता लेकर उसके पास आ रहा था. वह देख कर तो उसे एक क्षण लगा भी कि सचमुच अपना सर पटक ले. वह शरद उसके नज़दीक आने तक रुक गयी.

"क्यों तुम मेरा लगातार पीछा कर रहे हो...?" मीनू नाराज़गी जताते हुए गुस्से से बोली.

"मुझ पर एक एहसान कर दो और भगवान के लिए मेरा पीछा करना छोड़ दो..." वह गुस्से से हाथ जोड़ते हुए, उसका पीछा छुड़ा लेने के अविर्भाव मे बोली.

गुस्से से वह पलट गयी और फिर से आगे पैर पटकती हुई चलने लगी. शरद भी बीच मे थोड़ा फासला रखते हुए उसके पीछे पीछे चलने लगा.

शरद फिर से पीछा कर रहा है यह पता चलते ही वह गुस्से से रुक गयी.

शरद ने अपनी हिम्मत बटोर कर वह फूलों का गुलदस्ता उसके सामने पकड़ा और कहा, "आइ एम सौरी...."

मीनू गुस्से से तिलमिलाई. उसे क्या बोले कुछ सूझ नही रहा था. शरद को भी आगे क्या बोले कुछ समझ नही आ रहा था.

"आइ स्वेर, आइ मीन इट.." वह अपने गलेको हाथ लगाकर बोला.

मीनू गुस्से मे तो थी ही, उसने झट से अपने चेहरे पर आ रही बालों की लतें एक तरफ हटाई. शरद को लगा कि वह फिर से जोरदार तमच्चा अपने गालपर जड़ने वाली है. डर के मारे अपनी आँखें बंद कर उसने झट से अपना चेहरा पीछे हटाया.

उसके भी यह ख़याल मे आया और वह अपनी हँसी रोक नही सकी. उसका वह डरा हुआ सहमा हुआ बच्चों के जैसा मासूम चेहरा देख कर वह खिल खिलाकर हंस पड़ी. उसका गुस्सा कब का रफ्फु चक्कर हो गया था. शरद ने आँखें खोल कर देखा. तब तक वह फिर से रास्ते पर आगे चल पड़ी थी. थोड़ी देर चलने के बाद एक मोड़ पर मुड़ने से पहले मीनू रुक गयी, उसने पीछे मुड़कर शरद की तरफ देखा. एक नटखट मुस्कुराहट से उसका चेहरा खिल गया था.

घद्बडाये हुए हाल मे, सम्भ्रह्म मे खड़ा शरद भी उसकी तरफ देख कर मंद मंद मुस्कुराया. वह फिर से आगे चलते हुए उस मोड़ पर मुड़कर उसके नज़रों से ओझल हो गयी. भले ही वह उसके नज़रों से ओझल हुई थी, फिर भी शरद खड़ा होकर उधर मन्त्रमुग्ध होकर देख रहा था. उसे रह रहकर उसकी वह नटखट मुस्कुराहट याद आ रही थी.

वह सचमुच मुस्कुरई थी या मुझे वैसा आभास हुआ...

नही नही आभास कैसे होगा....

यह सच है कि वह मुस्कुराइ थी...

वह मुस्कुराइ इसका मतलब उसने मुझे माफ़ किया ऐसा समझना चाहिए क्या..?

हाँ वैसा समझ ने मे कोई दिक्कत नही...

लेकिन उसका वह मुस्कुराना कोई मामूली मुस्कुराना नही था....

उसके उस मुस्कुराहट मे और भी कुछ ग़ूढ अर्थ छिपा हुआ था...

क्या था वह अर्थ...?

शरद वह अर्थ समझ ने की कोशिश करने लगा और जैसे जैसे वह अर्थ उसके समझ मे आ रहा था उसके भी चेहरे पर वही, वैसी ही मुस्कुराहट फैलने लगी.

धीरे धीरे शरद और मीनू एक दूसरे के नज़दीक खींचते चले गये. उनके दिल मे कब प्रेम का बीज पनपना शुरू हो गया उन्हे पता ही नही चला. झगड़े से भी प्रेम की भावना पनप सकती है यह वे खुद अनुभव कर रहे थे. कॉलेज मे कोई पीरियड खाली होने पर वे मिलते. कॉलेज ख़त्म होनेपर मिलते. लाइब्ररी मे पढ़ाई के बहाने से मिलते थे. मिलने का एक भी मौका वे छोड़ना नही चाहते थे. लेकिन सब छिप छिपकर चल रहा था. उन्होने उनका प्रेम अभी तक किसी के ख़याल मे आने नही दिया था. लेकिन जो किसी के ख़याल मे नही आए उसे प्रेम कैसे कहे...? या फिर एक वक्त ऐसा आता है की प्रेमी इतने बिंदास हो जाते है कि उनका प्रेम किसी के ख़याल मे आएगा या किसी को पता चलेगा इस बात की फिक्र करना वे छोड़ देते है. लोगों को अपना प्रेम पता चले ऐसी भावना भी शायद उनके मन मे आती हो.

काफ़ी रात हो चुकी थी. अपनी बेटी अभी तक कैसे घर वापस नही आई यह चिंता मीनू के पिता को खाए जा रही थी. वे बैचेन होकर हॉल मे चहलकदमी कर रहे थे. वैसे उन्होने मीनू को पूरी छूट दे रखी थी. लेकिन ऐसी गैर ज़िम्मेदाराना वह कभी नही लगी थी. कभी देर होती तो वह घर फोन कर बताती थी. लेकिन आज उसने फोन करने की भी जहमत नही उठाई थी. इतने साल का उसके पिता का अनुभव कह रहा था कि मामला कुछ गंभीर है...

मीनू किसी ग़लत संगत मे तो नही फँस गयी...?

या फिर ड्रग्स वैगेरह की लत तो नही लगी उसे...?

अलग अलग प्रकार के अलग अलग विचार उनके दिमाग़ मे घूम रहे थे. इतने मे उन्हे बाहर कोई आहट हुई.