संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:42

फिर धन्नो ने पंडित जी को नीद मे सो जाने और सावित्री को अकेली पाते ही गर्म बातों का लहर और तेज करते हुए धीमी आवाज़ मे आगे बोली "तुम्हे क्या बताउ बेटी ...मुझे डर लगता है की तुम मेरी बात को कहीं ग़लत मत समझ लेना...तुम्हारे उम्र की लड़कियाँ तो इस गाओं मे तूफान मचा दी हैं...और तुम हो एकदम अनाड़ी ...और गाँव के कुच्छ औरतें तो यहाँ तक कहती है की तुम्हारी मुनिया तो पान भी नही खाई होगी..." सावित्री को यह बात समझ नही आई तो तुरंत पुछि "कौन मुनिया और कैसा पान ?" धन्नो चाची इतना सुनकर सावित्री के कान मे काफ़ी धीरे से हंसते हुए बोली "अरे हरजाई तुम इतना भी नही जानती ..मुनिया का मतलब तुम्हारी बुर से है और पान खाने का मतलब बर जब पहली बार चुदति है तो सील टूटने के कारण खून पूरे बुर पर लग जाता है जिसे दूसरी भाषा मे मुनिया का पान खाना कहते हैं...तू तो कुच्छ नही जानती है...या किसी का बाँस खा चुकी है और मुझे उल्लू बना रही है" धन्नो की ऐसी बात सुनते ही सावित्री को मानो चक्कर आ गया. वह कभी नही सोची थी कि धन्नो चाची उससे इस तरह से बात करेगी. उसका मन और शरीर दोनो सनसनाहट से भर गया. सावित्री के अंदर अब इतनी हिम्मत नही थी की धन्नो के नज़र से अपनी नज़र मिला सके. उसकी नज़रें अब केवल फर्श को देख रही थी. उसके मुँह से अब आवाज़ निकालने की ताक़त लगभग ख़त्म हो चुकी थी. धन्नो अब समझ गयी की उसका हथोदा अब सावित्री के मन पर असर कर दिया है. और इसी वजह से सावित्री के मुँह से किसी भी तरह की बात का निकलना बंद हो गया था. धन्नो अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सावित्री के कान के पास काफ़ी धीरे से फुसफुससाई "तुम्हे आज मैं बता दूं की जबसे तुम कस्बे मे इस दुकान पर काम करने आना सुरू कर दी हो तबसे ही गाओं के कई नौजवान तो नौजवान यहाँ तक की बुड्ढे भी तेरी छाति और गांद देखकर तुम्हे पेलने के चक्कर मे पड़े हैं..और मैं तो तुम्हे खुल कर बता दूं कि काफ़ी संभाल कर रश्ते मे आया जाया कर नही तो कहीं सुनसान मे पा कर तुम्हे पटक कर इतनी चुदाइ कर देंगे की ...तुम्हारी मुनिया की शक्ल ही खराब हो जाएगी."

धन्नो फिर आगे बोली "तुम्हारे जैसे जवान लड़की को तो गाओं के मर्दों के नियत और हरकत के बारे मे पूरी जानकारी होनी चाहिए..और तू है की दुनिया की सच्चाई से बेख़बर....मेरी बात का बुरा मत मानना ..मैं जो सच है वही बता रही हूँ....तेरी उम्र अब बच्चों की नही है अब तुम एक मर्द के लिए पूरी तरह जवान है...." सावित्री धन्नो के इन बातों को सुनकर एक दम चुप चाप वैसी ही बैठी थी. सावित्री धन्नो की इन बातों को सुनकर डर गयी की गाओं के मर्द उसके चक्कर मे पड़े हैं और धन्नो के मुँह से ख़ूले और अश्लील शब्दों के प्रयोग से बहुत ही लाज़ लग रही थी.

धन्नो फिर लगभग फुसफुससाई "तुम्हे भले ही कुच्छ पता ना हो लेकिन गाओं के मर्द तेरी जवानी की कीमत खूब अच्छि तरीके से जानते हैं...तभी तो तेरे बारे मे चर्चा करते हैं..और तुम्हे खाने के सपने बुनते हैं..." आगे फिर फुसफुससते बोली "तेरी जगह तो कोई दूसरी लड़की रहती तो अब तक गाओं मे लाठी और भला चलवा दी होती...अरे तेरी तकदीर बहुत अच्छि है जो भगवान ने इतना बढ़िया बदन दे रखा है..तभी तो गाओं के सभी मर्द आजकल तेरे लिए सपने देख रहे हैं..ये सब तो उपर वाले की मेहेरबानी है." धन्नो के इस तरह के तारीफ से सावित्री को कुच्छ समझ नही आ रहा था की आख़िर धन्नो इस तरह की बाते क्यों कर रही है. लेकिन सावित्री जब यह सुनी की गाओं के मर्द उसके बारे मे बातें करते हैं तो उसे अंदर ही अंदर एक संतोष और उत्सुकता भी जाग उठी. धन्नो अब सावित्री के मन मे मस्ती का बीज बोना सुरू कर दी थी. सावित्री ना चाहते हुए भी इस तरह की बातें सुनना चाहती थी. फिर धन्नो ने रंगीन बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए बोली "तुम थोड़ा गाओं के बारे मे भी जानने की कोशिस किया कर..तेरी उम्र की लौंडिया तो अब तक पता नही कितने मर्दों को खा कर मस्त हो गयी हैं और रोज़ किसी ना किसी के डंडे से मार खाए बगैर सोती नही हैं..और तू है की लाज़ से ही मरी जा रही है" फिर कुच्छ धीमी हँसी के साथ आगे बोली "अरे हरजाई मैने थोड़ी सी हँसी मज़ाक क्या कर दी की तेरी गले की आवाज़ ही सुख गयी..तू कुच्छ बोलेगी की ऐसे ही गूँग की तरह बैठी रहेगी..और मैं अकेले ही पागल की तरह बकती रहूंगी.." और इतना कहने के साथ धन्नो एक हाथ से सावित्री की पीठ पर हाथ घुमाई तो सावित्री अपनी नज़रें फर्श पर धँसाते हुए ही हल्की सी मुस्कुराइ. जिसे देख कर धन्नो खुश हो गयी. फिर भी धन्नो के गंदे शब्दों के इस्तेमाल के वजह से बुरी तरह शर्मा चुकी सावित्री कुच्छ बोलना नही चाहती थी. फिर धन्नो ने धीरे से कान के पास कही "कुच्छ बोलॉगी नही तो मैं चली जाउन्गि.." धन्नो के इस नाराज़ होने वाली बात को सुनते ही सावित्री ना चाहते हुए भी जबाव दी "क्या बोलूं..आप जो कह रहीं हैं मैं सुन रही हूँ.." और इसके आगे सावित्री के पास कुच्छ भी बोलने की हिम्मत ख़त्म हो गयी थी. फिर धन्नो ने सावित्री से पुछि "पंडित जी रात को अपने घर नही जाते क्या?" इस सवाल का जबाव देते हुए सावित्री धीरे से बोली "कभी कभी जाते होंगे..मैं बहुत कुच्छ नही जानती ..और शाम को ही मैं अपने घर चली जाती हूँ तो मैं भला क्या बताउ ." सावित्री धन्नो से इतना बोलकर सोचने लगी की धन्नो अब उससे नाराज़ नही होगी. लेकिन धन्नो ने धीरे से फिर बोली "हो सकता है कही इधेर उधेर किसी की मुनिया से काम चला लेता होगा.." फिर अपने मुँह को हाथ से ढँक कर हंसते हुए काफ़ी धीमी आवाज़ मे सावित्री के कान मे बोली "कहीं तेरी मुनिया........हाई राम मुझे तो बहुत ही हँसी आ रही है..ऐसी बात सोचते हुए...." सावित्री धन्नो की बात सुनते ही एकदम से सन्न हो गयी. उसे लगा की कोई बिजली का तेज झटका लग गया हो. उसे समझ मे नही आ रहा था की अब क्या करे. सावित्री का मन एकदम से घबरा उठा था. उसे ऐसा लग रहा था की धन्नो चाची जो भी कह रही थी सच कह रही थी. उसे जो डर लग रहा था वह बात सच होने के वजह से था. एक दिन पहले ही पंडिताइन के साथ हुई घटना भी सावित्री के देमाग मे छा उठी. सावित्री को ऐसा लग रहा था की उसे चक्केर आ रहा था. वह अब संभाल कर कुच्छ बोलना चाह रही थी लेकिन अब उसके पास इतना ताक़त नही रह गयी थी. सावित्री को ऐसा महसूस हो रहा था मानो ये बात केवल धन्नो चाची नही बल्कि पूरा गाओं ही एक साथ कह रहा हो. धन्नो अपनी धीमी धीमी हँसी पर काबू पाते हुए आगे बोली "इसमे घबराने की कोई बात नही है...बाहर काम करने निकली हो तो इतना मज़ाक तो तुम्हे सुनना पड़ेगा..चाहे तुम्हारी मुनिया की पिटाई होती हो या नही..." और फिर हँसने लगी. सावित्री एक दम शांत हो गयी थी और धन्नो की इतनी गंदी बात बोल कर हँसना उसे बहुत ही खराब लग रहा था. धन्नो ने जब देखा की सावित्री फिर से चिंता मे पड़ गयी है तब बोली "अरे तुम किसी बात की चिंता मत कर ..तू तो मेरी बेटी की तरह है और एक सहेली की तरह भी है...मैं ऐसी बात किसी से कहूँगी थोड़े..औरतों की कोई भी ऐसी वैसी बातें हमेशा च्छूपा. कर रखी जाती है..जानती हो औरतों का इज़्ज़त परदा होता है..जबतक पर्दे से धकि है औरत का इज़्ज़त होती है और जैसे ही परदा हटता है औरत बे-इज़्ज़त हो जाती है..पर्दे के आड़ मे चाहे जो कुछ खा पी लो कोई चिंता की बात नही होती..बस बात च्छूपना ही चाहिए..हर कीमत पर...और यदि तेरी मुनिया किसी का स्वाद ले ली तो मैं भला क्यूँ किसी से कहूँगी...अरे मैं तो ऐसी औरत हूँ की यदि ज़रूरत पड़ी तो तेरी मुनिया के लिए ऐसा इंतज़ाम करवा दूँगी की तेरी मुनिया भी खुश हो जाएगी और दुनिया भी जान नही पाएगी ...यानी मुझे मुनिया और दुनिया दोनो का ख्याल रहता है...कोई चिंता मत करना..बस तुम मुझे एक सहेली भी समझ लेना बेटी..ठीक" धन्नो ने इतना कह कर अस्वासन दे डाली जिससे सावित्री का डर तो कुच्छ कम हुआ लेकिन उसकी मुनिया या बुर के लिए किसी लंड का इनज़ाम की बात सावित्री को एकदम से चौंका दी और उसके मन मे एक रंगीन लहर भी दौड़ पड़ी. सावित्री पता नही क्यूँ ना चाहते हुए भी अंदर अंदर खुश हो गयी. लंड के इंतज़ाम के नाम से उसके पूरे बदन मे एक आग सी लगने लगी थी. इसी वजह से उसकी साँसे अब कुच्छ तेज होने लगी थी और उसके बुर मे भी मानो चिंतियाँ रेंगने लगी थी. सावित्री बैठे ही बैठे अपनी दोनो जांघों को आपस मे सताने लगी. धन्नो समझ गयी की लंड के नाम पर सावित्री की बुर मस्ताने लगी होगी. और अब लोहा गरम देख कर धन्नो हथोदा चलते हुए बोली "मेरे गाओं की लक्ष्मी भी बहुत पहले इसी दुकान पर काम करती थी.और उसने अपनी एक सहेली से ये बताया था की पंडित जी का औज़ार बहुत दमदार है...क्योंकि लक्ष्मी की मुनिया को पंडित जी ने कई साल पीटा था..लेकिन जबसे लक्ष्मी को गाओं के कुच्छ नये उम्र के लड़कों का साथ मिला तबसे लक्ष्मी ने पंडित जी के दुकान को छ्होर ही दी. लक्ष्मी भी उपर से बहुत शरीफ दीखती है लेकिन उसकी सच्चाई तो मुझे मालूम है ..उसकी मुनिया भी नये उम्र के लुंडों के लिए मुँह खोले रहती है."

क्रमशः............

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:43

Sangharsh--26

dhanno bhi aaj mauka miltaa dekh kar savitri se garam garam baaten karnaa chahti thi. dhanno khoob achchhi tarah jaanti thi ki is umra ki jawaan ladkian kaise gandi baaten dhyaan se sunti hain aur mardon se mazaa lene ke sapne dekhti hain. yahi sab sochte huye dhanno ne aaj savitri ko dukaan wale hisse me akele paa kar dheere dheere baatne suru karnaa chahti thi. dhanno ko is baat ka vishwaas tha ki bas thodi si mehnat ke baad savitri usase khool jaayegi aur fir jab savitri ko lund ki pyaas lagna suru ho jaayega tab khoob mardon ke firaak me rahegi aur aise me naye umra ke ladke bhi jab savitri ke chakkar me padenge to mauka dekh kar dhanno bhi un me se kisi ko fans kar mazaa le paayegi. dhanno ki umra savitri se jyaade hone ke naate dhanno kafi savdhaani se savitri se dheere dheere mauz masti ki baaten suru karnaa chahti thi. aur aaj maukaa kafi badhiya dekh kar dhanno ne baat aage badhaati huyi boli "tumne achha kiyaa jo kaam pakad liyaa ..isase tumhe do paise ki aamdani bhi ho jaayegi aur tumhara man bhi bahal jaayega..nahi to gaon me to kahin aane jaane laayak nahi hai aurton ke liye... har jagah awaare kameene ghoomte rahte hain jinhe bas sharaab aur aurton ke alawaan kuchh dikhaai hi nahi detaa. "

dhanno chataai par leti hui savitri ke chehre ke bhaav ko dhyaan se dekhti huyi ab baat cheet me kuchh garmi dalne ke niyat se aage boli "lekin ye gaon waale kutte tumhaare kasbe me kaam par aane jaane ko bhi apni nazar se dekhte hain beti..maine kisi se sunaa ki we sab tumhaare saath pandit ji kaa naam jod kar hansi udaate hain..maine to beti vahin par kah diyaa ki jo bhi is tarah ki baat kare bhagwaan use maut de de...savitri ko to sara gaon jaanta hai ki bechaari kitni seedhi aur shareef hai...bhalaa koi dusari ladki rahti to koi kuchh shaak bhi kare lekin savitri to ek dam doodh ki dhoi hai..." dhanno is baat ko bolne ke saath apni nazron se savitri ke chehre ke bhaav ko taulne kaa kaam bhi jaari rakhaa. is tarah ka charitra par hamle ki ashankaa ko bhampate huye savitri ke chehre par pareshaani aur ghabraahat saaf dikhne lagaa. saath hi savitri ne dhanno ke taraf apni najren karte huye kaafi dheere se aur dari huyi haal me puchhi "kaun aisi baat kah rahaa tha..a" dhanno hamle ko ab thoda dheere dheere karne ki niyat se boli "are tum iski chintaa mat karo ..gaon hai to aisi vaisi baaten to aurton ke baare me hoti hi rahti hai...mardon ka kaam hi hotaa hai aurton ko kuchh na to kuchh bolte rahnaa ..iskaa yah matlab thodi hai ki jo mard kah denge vah sahi hai...lekin mere gaon ki kuchh kutian hai jo badnaam karne ke niyat se jhuthe hi dosh lagaati rahti hain beti...bas inhi harjaaion se sajag rahnaa hai..ye sab apne to kai mardon ke neeche............. aur shareef auron ko jhuthe hi badnaam karne ke firaak me rahti hain." fir bhi savitri ki bechaini kam nahi huyi aur aage boli "lekin chachi mere baare me akhir koi kyon aisi baat bolegaa?" dhanno ne savitri ke gusse aur bechaini ko kam karne ke niyat se kahi "are tum to itnaa ghabraa jaa rahi ho mano koi pahaad toot kar gir padaa ho...beti tum ye mat bhulo ki ek aurat ka janm milaa hai tumhe ......aur ...aurat ko puri jindagi bahut kuchh bardasht karnaa padtaa hai..itnaa ghabraane se kuchh nahi hogaa...gaon me har aurat aur ladki ke baare me kuchh na to kuchh afwaah udati rahti hai...jhoothe hi sahi..ham aurton ka kaam hai ek kaan se suno to dusre kaan se nikaal denaa..." dhanno ki in baaton ko savitri kaafi dhyaan se sun rahi thi aur tabhi andar waale kamare se pandit ji ke naak bajne ki aawaj aane lagi aur ab pandit ji kafi need me so rahe the.

fir dhanno ne baat aage badhaate huye kafi dheemi awaaz me lagbhag fusussate huye boli "dekh .mera gaon aisa hai ki chaahe tum shareef raho ya badmaash ..badnaam to har haal me hona hai kyonki ye awaaron aur kameeno ka gaon hai....kisi haal me yahaan badnaami se bachnaa muskil hai...chaahe koi mazaa le chaahe shareef rahe ..ye kutte sabko ek hi nazar se dekhte hain ...to samajho ki tum chaahe laakh shareef kyon na raho tumhe chinaal banaate der nahi lagaate..."

fir dhanno baat lambi karte boli "aisi baat bhi nahi hai ki we sab hamesaa jhuth hi bolte hai savitri ...mere gaon me bahut saari chhinaar kism ki bhi aurten hain jo gaon me bahut mazaa leti hain....tum to abhi bachchi ho kyaa jaanogi in sab ki kahaanian ki kyaa kyaa gul khilaati hain ye sab kuttian...kabhi kabhi to inke kartooton ko sunkar main yahi sochti hun ki ye sab aurat ke naam ko hi badnaam kar rahi hain...beti ab tumhe main kaise apne munh se bataun ...tumko bataane me mujhe khood hi laaz lagti hai..ki kaise kaise gaon ki bahut si aurten aur tumhari umra ki ladkian upar se to kafi izzat se rahti hain lekin chori chhupe kitne mardon ka ...chhee beti kyaa kahun mere ko bhi achchha nahi lagta tumse is tarah ki baat karnaa .....lekin sach to sach hi hota hai...aur yahi soch kar tumse batana chahti hun ki ab tum bhi jawaan ho gayi ho isliye jaroori bhi hai ki duniaa ki sachchai ko jaano aur samjho taaki kahin tumhaare bholepan ke vajah se tumhe koi dhokha na ho jaay."

dhanno ke is tarah ki baaton se savitri ke ander bechaini ke saath saath kuchh utsuktaa bhi paida hone lagi ki aage dhanno chachi kyaa bataati hai jo ki vah abhi tak nahi jaanati thi. shayad aisi soch aane ke baad savitri bhi ab chup ho kar maano apne kaan ko dhanno chachi ke baaton ko sunane ke liye khol rakhi ho. dhanno chachi savitri ke jawaan man ko samajh gayi thi ki ab savitri ke ander samaaj ki gandi sachchaion ko jaanane ki laalach paida hone lagi hai aur agle pal chataai par dheere se uthkar baith gayi taaki savitri ke aur kareeb aa karke baaten aage badhaaye aur vahin savitri laaz aur dar se apni sir ko jhukaaye huye apni nazre dukaan ke farsh par gadaa chuki ho maano upar se vah dhanno chachi ki baat nahi sunanaa chahti ho.

fir dhanno ne pandit ji ko need me so jaane aur savitri ko akeli paate hi garm baaton ka lahar aur tej karte huye dheemi aawaaj me aage boli "tumhe kya bataaun beti ...mujhe dar lagtaa hai ki tum meri baat ko kahin galat mat samajh lenaa...tumhaare umra ki ladkiaan to is gaon me tufaan machaa dee hain...aur tum ho ekdam anaadi ...aur goan ke kuchh aurten to yahaan tak kahti hai ki tumhaari munia to paan bhi nahi khaayi hogi..." savitri ko yah baat samajh nahi aayi to turant puchhi "kaun munia aur kaisa paan ?" dhanno chachi itna sunkar savitri ke kaan me kafi dheere se hanste huye boli "are harjaai tum itnaa bhi nahi jaanti ..munia ka matlab tumhaari bur se hai aur paan khaane ka matlab bur jab pahli baar chudati hai to seal tootne ke kaaran khoon pure bur par lag jaata hai jise dusri bhasha me munia ka paan khaana kahte hain...tu to kuchh nahi jaanti hai...ya kisi ka baans khaa chuki hai aur mujhe ullu banaa rahi hai" dhanno ki aisi baat sunte hi savitri ko maano chakkar aa gayaa. vah kabhi nahi sochi thi ki dhanno chachi usase is tarah se baat karegi. uska man aur shareer dono sansanaahat se bhar gayaa. savitri ke andar ab itni himmat nahi thi ki dhanno ke nazar se apni nazar milaa sake. uski nazren ab keval farsh ko dekh rahi thin. uske munh se ab awaaj nikalne ki taakat lagbhag khatm ho chuki thi. dhanno ab samajh gayi ki uskaa hathodaa ab savitri ke man par asar kar diyaa hai. aur isi vajah se savitri ke munh se kisi bhi tarah ki baat ka niklna band ho gayaa tha. dhanno apni baat ko aage badhaate huye savitri ke kaan ke paas kafi dheere se fusfussai "tumhe aaj main bataa dun ki jabse tum kasbe me is dukaan par kaam karne aana suru kar di ho tabse hi gaon ke kai naujvaan to naujvaan yahaan tak ki buddhe bhi teri chhaati aur gaand dekhkar tumhe pelne ke chakkar me pade hain..aur main to tumhe khul kar bataa dun ki kafi sambhal kar rashte me aaya jaaya kar nahi to kahin sunsaan me paa kar tumhe patak kar itni chudaai kar denge ki ...tumhaari munia ki shakl hi kharaab ho jaayegi."

dhanno fir aage boli "tumhaare jaise jawaan ladki ko to gaon ke mardon ke niyan aur harkat ke baare me puri jankaari honi chahiye..aur tu hai ki duniyaa ki sachchai se bekhabar....meri baat ka bura mat mananaa ..main jo sach hai vahi bataa rahi hun....teri umra ab bachchon ki nahi hai ab tum ek mard ke liye puri tarah jawaan hai...." savitri dhanno ke in baaton ko sunkar ek dam chup chap vaisi hi baithi thi. savitri dhanno ki in baaton ko sunkar dar gayi ki gaon ke mard uske chakkar me pade hain aur dhanno ke munh se khoole aur ashleel shabdon ke prayog se bahut hi laaz lag rahi thi.

dhanno fir lagbhag fusfussai "tumhe bhale hi kuchh pataa na ho lekin gaon ke mard teri jawaani ki keemat khoob achchhi tareeke se jaante hain...tabhi to tere baare me charcha karte hain..aur tumhe khaane ke sapne bunate hain..." aage fir fusfussate boli "teri jagah to koi dusari ladki rahti to ab tak gaon me laathi aur bhalaa chalwa dee hoti...are teri takdeer bahut achchhi hai jo bhagwaan ne itna badhiaa badan de rakhaa hai..tabhi to gaon ke sabhi mard aajkal tere liye sapne dekh rahe hain..ye sab to upar wale ki meherbaani hai." dhanno ke is tarah ke tareef se savitri ko kuchh samajh nahi aa rahaa tha ki akhir dhanno is tarah ki baate kyon kar rahi hai. lekin savitri jab yah suni ki gaon ke mard uske baare me baaten karte hain to use andar hi andar ek santosh aur utsuktaa bhi jaag uthi. dhanno ab savitri ke man me masti ka beej bonaa suru kar di thi. savitri na chahte huye bhi is tarah ki baaten sunanaa chahti thi. fir dhanno ne rangeen baaton ka silsila aage badhaate huye boli "tum thoda gaon ke baare me bhi janane ki koshis kiyaa kar..teri umra ki laundian to ab tak pataa nahi kitne mardon ko khaa kar mast ho gayi hain aur roz kisi na kisi ke dande se maar khaaye bagair soti nahi hain..aur tu hai ki laaz se hi mari jaa rahi hai" fir kuchh dheemi hansi ke saath aage boli "are harjaai maine thodi si hansi mazaak kya kar di ki teri gale ki awaaj hi sukh gayi..tu kuchh bolegi ki aise hi gung ki tarah baithi rahegi..aur main akele hi paagal ki tarah bakati rahungi.." aur itna kahne ke saath dhanno ek hath se savitri ki peeth par hath ghumaai to savitri apni nazren farsh par dhansaate huye hi halki si muskuraai. jise dekh kar dhanno khush ho gayi. fir bhi dhanno ke gande shabdon ke istemaal ke vajah se buri tarah sharmaa chuki savitri kuchh bolnaa nahi chahti thi. fir dhanno ne dheere se kaan ke paas kahi "kuchh bologi nahi to main chali jaaungi.." dhanno ke is naraz hone wali baat ko sunate hi savitri na chahte huye bhi jabaav di "kyaa bolun..aap jo kah rahin hain main sun rahi hun.." aur iske aage savitri ke paas kuchh bhi bolne ki himmat khatm ho gayi thi. fir dhanno ne savitri se puchhi "pandit ji raat ko apne ghar nahi jaate kya?" is savaal ka jabaav dete huye savitri dheere se boli "kabhi kabhi jaate honge..main bahut kuchh nahi jaanti ..aur shaam ko hi main apne ghar chali jaati hun to main bhalaa kyaa bataun ." savitri dhanno se itna bolkar sochne lagi ki dhanno ab usase naraz nahi hogi. lekin dhanno ne dheere se fir boli "ho saktaa hai kahi idher udher kisi ki munia se kaam chalaa leta hoga.." fir apne munh ko hath se dhank kar hanste huye kafi dheemi awaaj me savitri ke kaan me boli "kahin teri munia........hai ram mujhe to bahut hi hansi aa rahi hai..aisi baat sochte huye...." savitri dhanno ki baat sunate hi ekdam se sann ho gayi. use lagaa ki koi bijli ka tej jhatkaa lag gayaa ho. use samajh me nahi aa rahaa tha ki ab kya kare. savitri ka man ekdam se ghabraa utha tha. use aisa lag rahaa tha ki dhanno chachi jo bhi kah rahi thi sach kah rahi thi. use jo dar lag rahaa tha vah baat sach hone ke vajah se tha. ek din pahle hi panditaein ke saath huyi ghatnaa bhi savitri ke demaag me chh uthi. savitri ko aisa lag rahaa tha ki use chakker aa rahaa tha. vah ab sambhal kar kuchh bolna chah rahi thi lekin ab uske paas itna taakat nahi rah gayi thi. savitri ko aisa mahsoos ho rahaa tha mano ye baat keval dhanno chachi nahi balki puraa gaon hi ek saath kah rahaa ho. dhanno apni dheemi dheemi hansi par kaabu paate huye aage boli "isame ghabaraane ki koi baat nahi hai...baahar kaam karne nikali ho to itnaa mazaak to tumhe sunanaa padegaa..chahe tumhari munia ki pitaai hoti ho ya nahi..." aur fir hansane lagi. savitri ek dam shant ho gayi thi aur dhanno ki itni gandi baat bol kar hansnaa use bahut hi kharaab lag rahaa tha. dhanno ne jab dekhaa ki savitri fir se chintaa me pad gayi hai tab boli "are tum kisi baat ki chintaa mat kar ..tu to meri beti ki tarah hai aur ek saheli ki tarah bhi hai...main aisi baat kisi se kahungi thode..aurton ki koi bhi aisi vaisi baaten hamesha chhupa kar rakhi jaati hai..jaanti ho aurton ka izzat pardaa hota hai..jabtak parde se dhaki hai aurat ka izzat hoti hai aur jaise hi pardaa hatataa hai aurat be-izzat ho jaati hai..parde ke aad me chahe jo kuch khaa pee lo koi chintaa ki baat nahi hoti..bas baat chhupnaa hi chahiye..har keemat par...aur yadi teri munia kisi ka swaad le li to main bhalaa kyun kisi se kahungi...are main to aisi aurat hun ki yadi jaroorat padi to teri munia ke liye aisa intzaam karwaa dungi ki teri munia bhi khush ho jaayegi aur dunia bhi jaan nahi paayegi ...yaani mujhe munia aur dunia dono ka khyaal rahtaa hai...koi chinta mat karnaa..bas tum mujhe ek saheli bhi samajh lenaa beti..theek" dhanno ne itnaa kah kar aswaasan de daali jisase savitri ka dar to kuchh kam huaa lekin usaki munia ya bur ke liye kisi lund ka inzaam ki baat savitri ko ekdam se chaunkaa di aur uske man me ek rangeen lahar bhi daud padi. savitri pataa nahi kyun na chahte huye bhi andar andar khush ho gayi. lund ke intzaam ke naam se uske pure badan me ek aag si lagne lagi thi. isi vajah se uski sanse ab kuchh tej hone lagi thi aur uske bur me bhi mano chintian rengne lagi thin. savitri baithe hi baithe apni dono janghon ko apas me satane lagi. dhanno samajh gayi ki lund ke naam par savitri ki bur mastaane lagi hogi. aur ab lohaa garam dekh kar dhanno hathoda chalate huye boli "mere gaon ki laxmi bhi bahut pahle isi dukaan par kaam karti thi.aur usne apni ek saheli se ye batayaa tha ki pandit ji ka auzaar bahut damdaar hai...kyonki laxmi ki munia ko pandit ji ne kai saal peeta tha..lekin jabse laxmi ko gaon ke kuchh naye umra ke ladkon ka saath mila tabse laxmi ne pandit ji ke dukaan ko chhor hi di. laxmi bhi upar se bahut shareef deekhti hai lekin uski sachchaai to mujhe maloom hai ..uski munia bhi naye umra ke lundon ke liye munh khole rahti hai."


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:44

संघर्ष--27

धन्नो के इस तगड़े प्रहार का असर सावित्री की मन और दिमाग़ दोनो पर एक साथ पड़ा. वह सोचने लगी की पंडित जी ने पहले ही उसे बता दिया था की लक्ष्मी का दूसरा लड़का उनके शरीर से पैदा है. फिर भी लक्ष्मी को सावित्री की मा सीता और खूद सावित्री भी काफ़ी शरीफ मानती थी लेकिन अब सावित्री को महसूस होने लगा की जैसा वह सोचती थी वैसी दुनिया नही है और लक्ष्मी भी दूध की धोइ नही है. धन्नो की बातें उसे सही और वास्तविक लगने लगी. सावित्री मानो और अधिक सुनने की इच्च्छा से चुप चाप बैठी रही. धन्नो अंदर ही अंदर खुश हो गयी थी. उसे पता था की जवान लड़की के लिए इतनी गर्म और रंगीन बात उसे बेशरामी के रश्ते पर ले जाने के लिए

ठीक थी. सावित्री भी अब धन्नो की बात को सुनने के लिए बेताव होती जा रही थी लेकिन अभी भी उसे बहुत ही लाज़ लग रही थी इस वजह से अपनी नज़रें झुकाए चुपचाप बैठी थी. फिर धन्नो ने धीरे से आगे बोली "नये उम्र का लंड तो औरतों को काफ़ी जवान और ताज़ा रखता है और इसी लिए तो लक्ष्मी आज कल गाओं मे कुच्छ नये उम्र के लड़कों के पानी से अपनी मुनिया को रोज़ नहलाती है..वो भी धीरे धीरे बहुत मज़ा ले रही है..लेकिन ये बात गाओं के अंदर केवल मैं और कुच्छ उसकी सहेलियाँ ही जानती हैं...और दूसरों को जानने की क्या ज़रूरत भी है..बदनामी किसी को पसंद थोड़ी है..वो भी तो बेचारी एक औरत ही है..बस काम हो जाए और शोर भी ना मचे यही तो हर औरत चाहती ही" धन्नो ने इतना कह कर सावित्री के तेज सांस पर गौर करते हुए बात आगे बढ़ाई "वैसे लक्ष्मी काम ही ऐसा करती है की .साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटेबहुत ही चलाँकि से और होशियारीसे अपनी मुनिया को लड़कों का पानीपिलाती है...मुझे तो उसके दिमाग़ पर काफ़ी अस्चर्य भी होता है...बहुत ही चालाक और समझदारी से रहती है..अब ये ही समझ की तेरी मा सीता उसकी बहुत करीबी सहेली है और उसे खूद ही नही पता की लक्ष्मी वास्तव मे कितनी चुदैल है..और तेरी मा उसे एक शरीफ औरत समझती है. लेकिन सच पुछो तो मेरे विचार मे वह एक शरीफ है भी...बहुत सावधानी से चुदति है...क्योंकि उसकी इस करतूत मे उसकी कुच्छ सहेलियाँ मदद करती हैं और इसी कारण उसके उपर कोई शक नही करता...और होता भी यही है यदि कोई एक औरत किसी दूसरे औरत का मदद लेते हुए मज़ा लेती है तो बदनामी का ख़तरा बहुत ही कम होता है...और आज कल तो इसी मे समझदारी भी है..." सावित्री इस बात को सुनकर फिर एक अलग सोच मे पड़ गयी की धन्नो उससे ऐसी बात कह कर क्या समझना चाह रही थी. सावित्री के दिमाग़ मे धन्नो द्वारा लंड का इंतज़ाम और फिर एक औरत की मदद से मज़ा लूटने का प्लान बताने के पीछे का मतलब समझ आने लगा. अब वह बहुत ही मस्त हो गयी थी. मानो धन्नो उसे स्वर्ग के रश्ते के बारे मे बता रही हो. सावित्री ने महसूस किया की उसकी बुर कुच्छ चिपचिपा सी गयी थी. फिर आगे धन्नो ने सावित्री के कान के पास धीरे से कुच्छ गंभीरता के साथ फुसफुससाई "मेरी इन बातों को किसी से कहना मत...समझी की नही ..." धन्नो ने सावित्री के कंधे पर एक हाथ रख कर मानो उससे हामी भरवाना चाहती थी लेकिन सावित्री अपनी आँखे एकदम फर्श पर टिकाए बैठी रह गयी. वह हाँ कहना चाहती थी लेकिन उसके पास अब अंदर से ताक़त नही लग रही थी क्योंकि वह इतनी गंदी और खुली हुई बात किसी से नही की थी. और चुप बैठी देख धन्नो ने उसके कंधे को उसी हाथ से लगभग हिलाते हुए फिर बोली "अरे पगली मेरी इन बातों को किसी से कहेगी तो लोग क्या सोचेंगे की मैं इस उम्र मे एक जवान लड़की को बिगाड़ रही हूँ...ये सब किसी से कहना मत ...क्यों कुच्छ बोलती क्यों नही..." दुबारा धन्नो की कोशिस से सावित्री का हिम्मत कुच्छ बढ़ा और काफ़ी धीरे से अपनी नज़रें झुकाए हुए ही फुसफुसा "नही कहूँगी" इतना सुनकर धन्नो ने सावित्री के कंधे पर से हाथ हटा ली और फिर बोली "हां बेटी तुम अब समझदार हो गयी हो और तुझे मालूम ही है की कौन सी बात किससे करनी चाहिए किससे नहीं....और आज से तुम मेरी एक बहुत ही अच्छी सहेली भी है और वो इसलिए की सहेली के रूप मे तुम हमसे खूल कर बात कर सकोगी और मैं ही एक सहेली के रूप मे जब तेरा मन करेगा तब उस चीज़ का इंतज़ाम भी धीरे से करवा दूँगी...तेरी मुनिया की भी ज़रूरत पूरी हो जाएगी और दुनिया को पता भी नही चलेगा..." इतना कह कर धन्नो हँसने लगी और सावित्री के पीठ पर धीरे एक थप्पड़ भी जड़ दी और सावित्री ऐसी बात दुबारा सुनने के बाद मुस्कुराना चाह रही थी लेकिन आ रही मुस्कुराहट को रोकते हुए बोली "धात्त्त...छ्चीए आप ये सब मुझसे मत कहा करें..मुझे कुच्छ नही चाहिए..." धन्नो ने जब सावित्री के मुँह से ऐसी बात सुनी तो उसे बहुत खुशी हुई और उसे लगा की आज की मेहनत रंग ला दी थी. फिर हँसते हुए बोली "हाँ तुम्हे नया या पुराना कोई औज़ार नही चाहिए ..मैं जानती हूँ क्यों नही चाहिए ...आज कल पंडित जी तो खूद ही तुम्हारी मुनिया का ख्याल रख रहे हैं और इस बुड्ढे के शरीर की ताक़त अपनी चड्डी मे भी पोत कर घूम रही हो...और उपर से यह बूढ़ा तुम्हे दवा भी खिला रहा है.....अरे बेटी यह मत भूलो की मैं भी एक समय तेरी तरह जवान थी और ...अब तुमसे क्या छुपाना मेरी भी मुनिया को रस पिलाने वाले बहुत थे...और झूठ क्या बोलूं...मेरी मुनिया भी खूब रस पिया करती थी..." अब तक का यह सबसे जबर्दाश्त हमला होते ही सावित्री एकदम से कांप सी गयी और दूसरे पल उसकी बुर के रेशे रेशे मे एक अजीब सी मस्ती की सनसनाहट दौड़ गयी. सावित्री को मानो साँप सूंघ गया था. अब उसे विश्वास हो गया था की उस दिन घर के पीच्छवाड़े पेशाब करते समय चड्डी पर लगे चुदाई के रस और सलवार पहनते समय समीज़ की जेब से गिरे दवा के पत्ते को देखकर धन्नो चाची सब माजरा समझ चुकी थी. और शायद इसी वजह धन्नो के व्यवहार मे बदलाव आ गया था.