संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:17

सावित्री किसी ढंग से खड़ी हो पा रही थी क्योंकि धन्नो चाची उसके पीछे की ओर से झुकी हुई थी और पंडित जी धन्नो की बुर पीछे से चोद रहे थे. पंडित जी दुबारा धक्के धन्नो की बुर मे मारना सुरू कर दिए और धन्नो फिर सिसकारना सुरू कर दी. धन्नो की बुर गीली हो जाने की वजह से पंडित जी लंड काफ़ी आसानी से बुर मे घुसने लगा. धन्नो की अश्लील सिसकारीओं का असर सावित्री के उपर पड़ने लगा. सावित्री अपने जीवन मे कभी नही सोची थी की इस उम्र की अधेड़ औरत इतनी गंदी तरह से बोलती हुई चुदेगि. और पंडित जी समझ गये थे की धन्नो काफ़ी चुदी पीटी औरत है और वह सावित्री को अपने अश्लीलता को दिखा कर मज़ा लेना चाह रही है. पंडित जी ने जब लंड को किसी पिस्टन की तरह धन्नो की बुर मे अंदर बाहर करने लगे तब धन्नो को काफ़ी मज़ा आने लगा. फिर धन्नो ने देखा की सावित्री भी हर धक्के के साथ हिल रही थी मानो पंडित जी उसी को चोद रहे हों. सावित्री भी काफ़ी चुपचाप धन्नो के चुदाइ का मज़ा ले रही थी. उसकी बुर मे भी चुनचुनाहट सुरू हो गयी थी. अब धन्नो ने यह समझ गयी की सावित्री की भी बुर अब लंड की माँग कर रही होगी तो इज़्ज़त के लिए गिड़गिदाने की बजाय अपने इज़्ज़त को खूब लुटाने के लिए बोलना सुरू कर दी "सी सी ऊ ऊ ऊ अरे अब तो बहुत मज़ा आ रहा है...और ज़ोर से आ आ आ आ आ आ ह ज़ोर ज़ोर ज़ोर्से ज़ोर से चोदिए ऊ ओह ....." पंडित जी इतना सुन कर धक्के की स्पीड बढ़ा दिए और सावित्री ने जब धन्नो के मुँह से ऐसी बात सुनी तो उसकी चूछुना रही बुर मे आग लग गयी. अब वह अपनी जगह पर अकड़ कर खड़ी हो गयी और एक लंबी सांस खींची. धन्नो समझ गयी अब सावित्री को इस अश्लीलता और बेशर्मी का सीधा असर पड़ने लगा है. फिर धन्नो ने एक बार फिर पीछे की ओर से चोद रहे पंडित जी से बोली "अरे और ज़ोर से चोदिए...चोदिए...मेरी बुर को..अब क्या बचा है मेरे पास जब मुझे लूट ही लिए तो चोद कर अपनी रखैल बना लीजिए..पेल कर फाड़ दीजिए मेरी बुर को ....ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ................................इतना मज़ा आ रहा है की क्या बताउ....हाई राम जी करता है की रोज़ आ कर चुदाउ ...ओह ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ऊवू ऊवू ......अरे कस कर चोदिए की मैं बर्बाद हो जाउ...मेरे राजा..मेरे करेजा ....चोदिए ...आप तो एक दम किसी जवान लड़के की तरह चोद रहे हैं मेरी बुर को....." पंडित जी इतना सुन कर धक्के मारते हुए तपाक से बोल पड़े "कितने लड़के चोदे हैं इस बुर को...?" धन्नो ने सावित्री के शरीर को पकड़ कर झुकी स्थिति मे कुच्छ सोच कर जबाव दे डाली "अरे के बताउ अब कया छुपाउ आपसे आप तो मेरे गाओं की हालत जानते ही हैं आख़िर कैसे कोई बच सकता ही मेरे गाओं के .....ओहो ओह ओह ओह ऊ ऊ ओह अरे किस किस को बताउ जिसने मेरी......अरे लड़को से करवाने मे तो और भी मज़ा आता है....जवान लड़को की बात कुच्छ और ही होती है....ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ऊवू ......मेरे गाओं मे तो शायद ही कोई औरत बची हो इन........ऊ ऊ ऊ ऊ .....अरे बाप रे बाप ....खूब डालिए अंदर " पंडित जी को सावित्री के सामने ही लड़कों की तारीफ कुच्छ ठीक नही लगी तो कुच्छ धक्को मे तेज़ी लाते हुए बोले "अभी तो मादर्चोद शरीफ बन रही थी और अब बता रही है की तेरी बुर पर काईओं ने चढ़ाई कर ली है.....तेरी बेटी की बुर चोदु साली रंडी.....लड़के साले क्या मेरी तरह चोदेन्गे रे...जो मैं चोद दूँगा....लड़कों की तारीफ करती है और वो भी मेरे सामने......वी साले शराब और नशा कर ते हैं ....उनके लंड मे ताक़त ही कहा होती है की बुर चोदेन्गे....मादार चोद...तेरी बेटी को चोद कर रंडी बना दूं साली ....चल इस चौकी पर चिट लेट फिर देख मैं तेरी इस भोसड़ी को कैसे चोद्ता हूँ..." इतना कहते ही पंडित जी कुच्छ गुस्साए हुए धन्नो के बुर से लंड को बाहर खींच लिए और भीगा हुआ लंड बाहर आ कर चमकने लगा. धन्नो अब सावित्री के कंधे के उपर से हटते हुए चौकी पर चढ़ गयी और फिर चित लेट गयी. पंडित जी पास मे खड़ी सावित्री की बाँह को पकड़ कर अपनी ओर खींचते हुए बोले "देख जब मैं इसकी बुर मे लंड घुसाउन्गा तब तुम पीछे बैठ कर इसकी बुर को अपने दोनो हाथों से कस कर फैलाना ताकि लंड को गहराई तक पेल सकूँ." सावित्री इतना सुन कर सन्न रह गयी. वैसे सावित्री भी तुरंत चुदना चाह रही थी. सावित्री वहीं खड़ी हो कर अपनी नज़रें झुका ली. तभी पंडित जी भी चौकी पर चढ़ कर धन्नो के दोनो घुटनो को मोड़ कर थोड़ा जांघों को चौड़ा कर दिए. धन्नो की बुर फैल गयी. लेकिन तभी पंडित जी ने सावित्री को कहा "तू पीछे बैठ कर अपने दोनो हाथो से इस चुदैल की बुर की फांकों को ऐसा फैलाओ की इसकी बुर की गहराई को चोद दूं." सावित्री ने अपने काँपते हाथों से धन्नो के बुर के दोनो फांको को कस फैलाया तो बुर का मुँह खूल गया. धन्नो सावित्री से बोली "अरे कस के फैलाना ...ताकि पंडित जी का पूरा लंड एक ही धक्के मे ऐसा घूस जाए मानो मेरे गाओं के आवारे मुझे चोद रहे हों...फैला मेरी बुर को मेरी बेटी रानी ऊ" सावित्री के फैलाए हुए धन्नो के बुर मे पंडित जी ने लंड को एक ही झटके मे इतनी तेज़ी से पेला की लंड बुर के गहराई मे घुस गया और दूसरे पल पंडित जी काफ़ी तेज़ी से पेलने लगे और सावित्री के हाथों से फैली हुई बुर की चुदाई काफ़ी तेज होने लगी. सावित्री के हाथ पर पंडित जी के दोनो अनदुए टकराने लगे. सावित्री की नज़रें पंडित जी के मोटे और गोरे लंड पर टिक गयी जो धन्नो की बुर मे आ जा रहा था और लंड पर काफ़ी सारा चुदाई का रस लगने लगा था. सावित्री की बुर भी चिपचिपा गयी थी. सावित्री का मन कर रहा था की वह धन्नो की बुर मे चुदाई कर रहे लंड को अपनी बुर मे डाल ले. बुर की आग ने सावित्री के अंदर की लाज़ और शार्म को एकदम से ख़त्म ही कर दिया था जो की धन्नो चाहती थी की सावित्री एक चरित्रहीं औरत बन जाए तो फिर उसकी सहेली की तरह गाओं मे घूम घूम कर नये उम्र के लड़कों को फाँस कर दोनो मज़ा ले सकें. धन्नो की बुर को इतनी कस कस कर चोद रहे थे की पूरी चौकी हिल रही थी मानो टूट जाए. कमरे मे चुदाइ और धन्नो की सिसकारीओं की आवाज़ गूँज उठी. सावित्री का मनमे एक दम चुदाई हो चुकी थी. सावित्री भी यही चाह रही थी पंडित जी उसे भी वही पर लेटा कर चोद दें. अब सावित्री लज़ाना नही चाह रही थी क्योंकि उसकी बुर मे लंड की ज़रूरत एक दम तेज हो गयी थी. धन्नो ने भी चुदते हुए फिर से अशीलता सुरू कर दी "चोदिए ऊ ऊवू ऊ ऊवू ऊ ह ऊओ हू रे ऊऊ मई ऊऊ रे बाप ...कैसे घूस रहा है ...अरे बड़ा मज़ा आ रहा है ऐसे लग रहा की कोई लड़का मुझे चोद रहाआ है अरे बेटी सावित्री...देख रे हरजाई मेरी बुर मे कैसे लंड जा रहा है....तेरी भी बुर .....अब पनिया गयी होगी रे.....देख मेरी बुर मे इस बुढ्ढे का लंड कैसे जा रहा है...ऊ ऊ ऊवू तू भी ऐसे ही चुदाना रे बढ़ा मज़ा आता है ...ऊओहू हूओ ऊओहू ऊ ऊ ऊवू ऊवू ऊवू ऊवू ऊओहूओ स्सो ओहो अरे इस गंदे काम मे इतना मज़ा आता है की क्या बताउ से हरजाई ...तू भी मेरी तरह चुदैल बन ....तेरी भी बुर ऐसी ही चुदेगि....ऊ..." और पंडित जी ने इतने तेज चोदना सुरू कर दिया की पूरी चौकी ऐसे हिलने लगी मानो अगले पल टूट ही जाएगी. तभी धन्नो काफ़ी तेज चीखी "म्‍म्म्मममममममममम ससस्स व्व न कककककककककककककक ऊऊऊऊऊऊओह अरे कमीने चोद मेरी बुर और मेरी बेटी की भी चोद मेरी मुसम्मि को भी चोद.....चोद कर बना डाल रंडी....मैं तो झड़ी आऊऊह ओ हू " और इतना कहने के साथ धन्नो झड़ने लगी और तभी पंडित जी भी पूरे लंड को उसकी बुर मे चॅंप कर वीर्य की तेज धार को उदेलना सुरू कर दिए और पीछे बैठी सावित्री अपने हाथ को खींच ली और समझ गयी की पंडित जी धन्नो चाची की बुर मे झाड़ रहे हैं और एक हाथ से अपनी बुर को सलवार के उपर से ही भींच ली.

क्रमशः.....................


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:18

Sangharsh--29

pandit ji dono chuchion ko meesate huye dhanno ke mansal aur bhare buye shareer ka jayajaa lene lage. dhanno jab pandit ji dono hathon ko apni chuchon par se hataa nahi paayi to laaz deekhate huye apni dono hathon se chehre ko dhak lee. lekin pandit ji agle pal apne ek haath se uske haath ko chehre par se hataate huye apne munh dhanno ke munh par tikaane lage. itnaa dekh kar dhanno apne sar ko idher udher ghumaane lagi aur pandit ji ke liye dhanno ke munh par apne munh ko bhidanaa mushkil hone lagaa. itnaa dekh kar pandit ji uske chuchion par se haath hataa kar turant apne ek haath se dhanno ke sar ko kas kar pakad liye aur dusare haath se uske gaal aur jabade ko kas kar dabayaa to dhanno ka munh khool sa gayaa aur pandit ji turant apne munh ko uske munh par sataa diya aur dhanno ke khule huye munh me dher saraa thuk dhakelte huye apne jeebh ko dhanno ke munh me ghused kar mano aage peechhe kar ke uske munh ko jeebh se hi pelne lage. dhanno ka puraa badan jhanjhanaa uthaa. dusare pal dhanno ke othon ko bhi chusane lage. aur ab hath fir se chuchion par apna kaam karne lage. dhanno kis siskaarian dukaan wale hisse me khadi savitri ko saaf sunaai de rahaa tha. savitri ka kalejaa dhak dhak kar rahaa tha. thodi der tak aise hi dhanno ke othon ko kas kas kar chusate huye pandit ji ne dono chuchion ko khoob meesa aur nateeza yah huaa ki peticot ke andar gudaaj bur ki fankon me laar ka risaav suru ho gayaa. siskion ko sun sun kar savitri ki bhi bur me masti chhane lagi. lekin vah jaise ki taise dukaan wale hisse me khadi thi aur andar kya ho rahaa hoga yahi soch kar sihar jaa rahi thi.

tabhi pandit ji ne dhanno ke peticot ke upar se hi uske janghon ko pakad kar masalne lage. dhanno samajh gayi ki pandit ji ab uske shareer ke antim chir ko bhi harne jaa rahe hain. aur agle pal jaise hi unke haath dhanno ke peticot ke naade ko kholane ke liye badhe hi the ki vah uth kar baith gayi aur mano savitri ko sunaate huye fir se gidgidaane ka naatak suru kar di "maan jaayie ...aap jo kahiye main karoongi lekin meri peticot ko mat kholiye.. upar ki izzat par to haath fer hi diye hain lekin peticot wali meri asmat ko mat lootiye...main mosammi ke papa ke saamne kaise jaaungi...kyaa munh dikhoungi...ye to unhi ki amaanat hai......aree maan jaayiye mera dharm is peticot me hai...ooh ram..." lekin pandit ji ke haath tabtak apna kaam kar chukaa tha aur dhanno ki baat khatm hote hi peticot kamar me dheela ho chukaa tha. dhanno itna dekhte hi ek hath se dheele huye peticot ko pakad kar chauki se neeche kud gayi. pandit ji bhi turant chauki se utarkar dhanno ke pakadnaa chaha lekin tabtak dhanno bhag kar dukaan wale hisse me khadi savitri ke peechhe khadi ho kar apne peticot ke khule huye naade ko baandhne ki koshis kar hi rahi thi ki tab tak pandit ji bhi aa gaye aur jaise hi dhanno ko pakadnaa chaha ki dhanno savitri ke peechhe jaa kar savitri ko kas kar pakad li aur savitri se gidgidaai "are beti ...meri izzat bachaa lo ....apne pandit ji ko roko ...ye mere saath kyaa kar rahe hain...." savitri aisa nazara dekhte hi mano behosh hone ki naubat aa gayi. aur lund khadaa kiye huye pandit ji bhi agle pal dhanno ke peechhe aa gaye aur peticot ke naade ko dubaaraa kheench diyaa aur dusare pal hi dhanno ka peticot dukaan ke farsh par gir gayaa. savitri pandit ji ke saath saath dhanno chachi ko bhi ekdam nangi dekh kar ek jhatke se dhanno se alag huyi dukaan ke bheetar wale kamre me bhaag gayi. fir ekdam nangi ho chuki dhanno bhi uske peechhe peechee bhaagti huyi fir savtri ke peechhe jaa use kas kar pakad li mano ab use chhorna nahi chahti ho. dusare pal laplapaate huye lund ke saath pandit ji bhi aa gaye. savitri ki nazar jaise hi pandit ji khade aur tannaye lund par padi to wah ek dam sansanaa gayi aur apni nazre kamre ke farsh par tikaa li. agle pal pandit ji dhanno ke peechhe aane ki jaise hi koshis kiye dhanno fir savitri ko unke aage dhakelte huye boli "are savitri manaa kar apne pandit ji .ko ...tu kuchh bolti kyun nahi..kuchh karti kyon nahi...meri izzat lutane wali hai...are harjaayi kuchh to kar....bachaa le meri izzat....." savitri ko jaise dhanno ne pandit ji ke saamne dhakelte huye khood ko bachaane lagi to savitri ke theek saamne pandit ji ka tannaya huya lund aa gyaa jiske munh se halki laar nikalne jaisa lag rahaa tha aur supaade ke upar wali chamadi peechhe ho jaane se supada bhi ek dam lal tamatar ki tarah chamak rahaa tha. savitri ko lagaa ki pandit ji kahin use hi na pel den. savitri bhale apne sameez aur salwaaur aur dupatte me thi lekin itna sab hone ke vajah se uski bhi bur chaddi me kuchh geeli ho gayi thi. dhanno savitri ka aad lene ke liye use pakad kar idher udher hoti rahi lekin pandit ji bhi akhir dhanno ke kamar ko uske peechhe jaa kar kas kar pakad hi liya aur ab dhanno apne chutad ko kahi hilaa nahi paa rahi thi. savitri ne jaise hi dekha ekdam nagi ho chuki dhanno chachi ko pandit ji apne bas me kar liye hain vah samajh gayi ab pandit ji dhanno chachi chodna suru karnege. savitri ko aisa laga mano uski bur kafi gili ho gayi hai aur uski chaddi bhi bheeg si gayi ho. aur savitri ab dhanno se jaise hi alag hone ki koshis ki vaise dhanno ne savitri ke peechhe se uske gale me apni dono banhe daal kar apne sar ko savitri ke kandhe par rakhte huye kafi jor se pakad li aur ab savitri chah kar bhi dhanno se alag nahi ho paa rahi thi aur vivash ho kar apni dono hathon se apne munh ko chhupa li. idher pandit ji bhi dhanno ke kamar ko kas kar pakad liye the aur dhanno ke savitri ke kandhe par kuchh jhuki hone ke vajah se dhanno ka chutad kuchh baahar nikal gayaa tha aur pandit ji ka tannaaya hua lund ab dhanno ki dono chutadon ke daraar ke taraf jaa rahaa tha jise dhanno mahsoos kar rahi thi. pandit ji ke ek haath to kamar ko kas kar pakade the lekin dusraa haath jaise hi lund ko dhanno ke peechhe se uski geeli ho chuki bur par satate huye ek jor daar dhakka maara to dhakka jordaar hone ki vajah se aisa lagaa ki dhanno aage ki or gir padegi aur savitri ke aage hone ki vajah se vah dhanno ke saath saath savitri bhi buri tarah hil gayi aur ek kadam aage ki or khisak gayi aur lund ke bur me dhansate hi dhanno ne kafi ashleelta bhare awaaz me savitri ke kaan ke paas cheekh uthi "..aaaaaaaaaaaaaaaaaaaa rreee maaai re baaaaapp re baap faat gayaa.... faat gayaa ................f..at gaayi re buriaa fat fayaa ...fat gayaa re oooh re baap faad diyaa re faad diyaa ......are musaammi ke papa ko kaisa munh dekhoungi mujhe to chod diya re......shshshsh..........are. ..baap ho.....mar ....dalaa ...bur me ghooos gyaa re ..harajaayii...tere pandit ne ...chod diyaa meri ...bur....uuuhhhhhhhaare are harjai randi....tere pandit ne mujhe chod diyaa..re ...aare baap re baap main kise munh dikhaungi....aajjj to loot liyaa re.....main nahi jaanti thi ....aaj meri bur ....fat jaayegi.....oooh re maa re baap ...meri bur me ghoos hi gayaa..re..main to barbaad ho gayi...re.aaaah " pandit ji ka lund ka aadha hissa bur me ghus chukaa tha.

savitri kisi dhang se khadi ho paa rahi thi kyonki dhanno chachi ukse peechhe ki or se jhuki hui thi aur pandit ji dhanno ki bur peechhe se chod rahe the. pandit ji dubara dhakke dhanno ki bur me maarna suru kar diye aur dhanno fir siskarnaa suru kar di. dhanno ki bur gili ho jaane ki vajah se pandit ji lund kafi asani se bur me ghusane lagaa. dhanno ki ashleel siskaarion ka asar savitri ke upar padane lagaa. savitri apne jeevan me kabhi nahi sochi thi ki is umra ki adhed aurat itni gandi tarah se boleti huyi chudegi. aur pandit ji samajh gaye the ki dhanno kafi chudi piti aurat hai aur vah savitri ko apne ashleelta ko dikhaa kar mazaa lenaa chah rahi hai. pandit ji ne jab lund ko kisi piston ki tarah dhanno ki bur me andar baahar karne lage tab dhanno ko kafi mazaa aane lagaa. fir dhanno ne dekhaa ki savitri bhi har dhakke ke saath hil rahi thi mano pandit ji usi ko chod rahe hon. savitri bhi kafi chupchaap dhanno ke chudaai ka mazaa le rahi thi. uski bur me bhi chunchunaahat suru ho gayi thi. ab dhanno ne yah samajh gayi ki savitri ki bhi bur ab lund ki maang kar rahi hogi to izzat ke liye gidgidaane ki bajaay apne izzat ko khoob lutaane ke liye bolna suru kar di "si si ooh ooh ooh are ab to bahut mazaa aa rahaa hai...aur jor se aah aah aah aah aah aa h jor jor jorse jor se chodiye ooh oh ....." pandit ji itna sun kar dhakke ki speed badhaa diye aur savitri ne jab dhanno ke munh se aisi baat suni to uski chuchunaa rahi bur me aag lag gayi. ab vah apni jagah par akad kar khadi ho gayi aur ek lambi sans kheenchi. dhanno samajh gayi ab savitri ko is ashleelta aur besharmi ka sidha asar padne lagaa hai. fir dhanno ne ek baar fir peechhe ki or se chod rahe pandit ji se boli "are aur jor se chodiye...chodiye...meri bur ko..ab kya bachaa hai mere paas jab mujhe loot hi liye to chod kar apni rakhail banaa lijiye..pel kar phad dijiye meri bur ko ....ooh ooh ooh ooh ooh ooh ooh ooh ................................itna mazaa aa rahaa hai ki kyaa bataun....hai raam ji karta hai ki roz aa kar chudaun ...oh ooh ooh ooh ooh ooh oooh oooh ......are kas kar chodiye ki main barbaad ho jaun...mere raja..mere karejaa ....chodiye ...aap to ek dam kisi jawaan ladke ki tarah chod rahe hain meri bur ko....." pandit ji itna sun kar dhakke marte huye tapaak se bol pade "kitane ladke chode hain is bur ko...?" dhanno ne savitri ke shareer ko pakad kar jhuki sthiti me kuchh soch kar jabaav de daali "are kay bataun ab kayaa chhupaun aapse aap to mere gaon ki haalat jaante hi hain akhir kaise koi bach sakta hi mere gaon ke .....oho oh oh oh ooh ooh oh are kis kis ko batoun jisne meri......are ladko se karwaane me to aur bhi mazaa ataa hai....jawaan ladko ki baat kuchh aur hi hoti hai....ooh ooh ooh ooh ooh oooh ......mere gaon me to shayad hi koi aurat bachi ho in........ooh ooh ooh ooh .....are baap re baap ....khoob daliye andar " pandit ji ko savitri ke saamne hi ladkon ki tareef kuchh theek nahi lagi to kuchh dhakko me teji laate huye bole "abhi to madhercod shareef ban rahi thi aur ab bataa rahi hai ki teri bur par kaion ne chadaai kar li hai.....teri beti ki bur chodu saali randi.....ladke saale kya meri tarah chodenge re...jo main chod dunga....ladkon ki tareef karti hai aur wo bhi mere samane......we saale sharaab aur nashaa kar te hain ....unke lund me taakat hi kahaa hoti hai ki bur chodenge....madher chod...teri beti ko chod kar randi banaa dun saali ....chal is chauki par chit let fir dekh main teri is bhosadi ko kaise chodta hun..." itna kahte hi padnit ji kuchh gussaye huye dhanno ke bur se lund ko baahar kheench liye aur bheega hua lund baahar aa kar chamakne lagaa. dhanno ab savitri ke kandhe ke upar se hatate huye chauki par chad gayi aur fir let chit let gayi. pandit ji paas me khadi savitri ki baanh ko pakad kar apni or khinchate huye bole "dekh jab main iski bur me lund ghusaunga tab tum peechhe baith kar iski bur ko apne dono haathon se kas kar failaana taaki lund ko gahraai tak pel sakun." savitri itna sun kar sann rah gayi. vaise savitri bhi turant chudnaa chah rahi thi. savitri vahin khadi ho kar apni nazren jhukaa li. tabhi pandit ji bhi chauki par chad kar dhanno ke dono ghutno ko mod kar thoda janghon ko chauda kar diye. dhanno ki bur fail gayi. lekin tabhi pandit ji ne savitri ko kahaa "tu peechhe baith kar apne dono haahton se is chudail ki bur ki fankon ko aisa failao ki iski bur ki gahrai ko chod dun." savitri ne apne kampate haathon se dhanno ke bur ke dono fanko ko kas failaya to bur ka munh khool gayaa. dhanno ne savitri se boli "are kas ke failaana ...taaki pandit ji ka puraa lund ek hi dhakke me aisa ghoos jaaye mano mere gaon ke awaare mujhe chod rahe hon...failaa meri bur ko meri beti rani ooh" savitri ke failaye huye dhanno ke bur me pandit ji ne lund ko ek hi jhatke me itni teji se pela ki lund bur ke gaharaai me ghus gayaa aur dusare pal pandit ji kafi teji se pelne lage aur savitri ke hathon se faili huyi bur ki chudaai kafi tej hone lagi. savitri ke hath par pandit ji ke dono anduye takraane lage. savitri ki nazaren pandit ji ke mote aur gore lund par tik gayi jo dhanno ki bur me aa jaa rahaa tha aur lund par kafi sara chudaai ka ras lagne lagaa tha. savitri ki bur bhi chipchipaa gayi thi. savitri ka man kar rahaa tha ki vah dhanno ki bur me chudaai kar rahe lund ko apni bur me daal le. bur ki aag ne savitri ke andar ki laaz aur shaarm ko ekdam se khatm hi kar diyaa tha jo ki dhanno chahti thi ki savitri ek charitraheen aurat ban jaaye to fir uski saheli ki tarah gaon me ghum ghum kar naye umra ke ladkon ko fans kar dono mazaa le saken. dhanno ki bur ko itni kas kas kar chod rahe the ki puri chauki hil rahi thi mano toot jaye. kamare me chudaai aur dhanno ki siskaarion ki awaj goonj uthi. savitri ka man ek dam chudaai ho chuki thi. savitri bhi yahi chah rahi thi pandit ji use bhi vahi par leta kar chod den. ab savitri lazanaa nahi chah rahi thi kyonki uski bur me lund ki jaroorat ek dam tej ho gayi thi. dhanno ne bhi chudate huye fir se asheelta suru kar di "chodiye ooh oooh ooh oooh oo h ooo hoo rei oooo mai oooo re baap ...kaise ghoos rahaa hai ...are badaa mazaa aa rahaa hai aise lag rahaa ki koi ladkaa mujhe chod rahaaa hai are beti savitri...dekh re harjaai meri bur me kaise lund jaa rahaa hai....teri bhi bur .....ab paniyaa gayi hogi re.....dekh meri bur me is budhdhe ka lund kaise jaa rahaa hai...ooh ooh oooh tu bhi aise hi chudaana re badhaa mazaa ataa hai ...ooohoo hoooh ooohoo ooh ooh oooh oooh oooh oooh ooohooo sso oho are is gande kaam me itna mazaa ataa hai ki kya bataun se harjaai ...tu bhi meri tarah chudail ban ....teri bhi bur aisi hi chudegi....ooh..." aur pandit ji ne itne tej chodna suru kar diyaa ki puri chauki aise hilne lagi mano agle pal toot hi jaayegi. tabhi dhanno kafi tej cheekhi "mmmmmmmmmmmmm ssss vv n cccccccccccccc ooooooooooooohh are kameene chode meri bur aur meri beti ki bhi chod meri musammi ko bhi chod.....chod kar banaa dal randi....main to jhadi aaooooh o hoo " aur itna kahne ke saath dhanno jhadne lagi aur tabhi pandit ji bhi pure lund ko uski bur me champ kar veerya ki tej dhaar ko udelnaa suru kar diye aur peechhe baithi savitri apne haath ko kheench li aur samajh gayi ki pandit ji dhanno chachi ki bur me jhad rahe hain aur ek hath se apni bur ko salwaar ke upar se hi bheench li.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:19

संघर्ष--30

गतान्क से आगे..........

धन्नो तृप्त हो चुकी थी और पंडित जी भी खुश थे. दोनोने कपड़े पहन लिए और पंडित जी दुकान भी खोल दिए. लेकिन सावित्री की प्यास वैसी ही बनी रही. मानो उसके साथ कोई बेईमानी हो रही हो. सावित्री के पास इतनी हिम्मत नही थी की पंडित जी से कह कर अपनी बुर चुदवा ले. एक गहरी साँस ले कर सावित्री भी दुकान मे बैठ गयी.

धन्नो ने पंडित जी के दुकान से अपनी बेटी के लिए सौंदर्या के कुच्छ समान लिए फिर पंडित जी को पैसे देने लगी तब उन्होने ने पैसे वापस कर दिए.

और बोले ......"धन्नो आज मैं तुमसे बहुत खुश हूँ...तुम्हारी तरह की बड़े दिल की औरतें खोजने से भी नही मिलती हैं..."

इतना कह कर पंडित जी धन्नो की ओर देख कर मुस्कुरा उठे. नज़रें झुकाए बैठी हुई धन्नो से आगे बोले......

"ये सब सौंदर्या का समान मेरे तरफ से तेरी बेटी को उपहार है."

धन्नो अपनी तारीफ सुन कर और सौंदर्या का समान मुफ़्त मे पा कर अंदर ही अंदर प्रसन्नचित हो उठी और पंडित जी के इस नेक व्यवहार का जबाव देती हुई बोली.........

"आप जैसा नेक्दिल इंसान भी नही मिलते पंडित जी...और क्या कहूँ..."

इतना कह कर धन्नो ने सावित्री की ओर देखी जो बगल मे बैठी थी लेकिन उसकी आँखों मे वासना के डोरे सॉफ दिख रहे थे. फिर धन्नो ने आगे कुच्छ लज़ाति हुई अपनी नज़रें झुकाए हुई बोली ........

"पंडित जी आज जो भी हुआ ....किसी को पता ना चले...." इतना सुनते ही पंडित जी धन्नो को आश्वस्त करते हुए बोले......

"तू इसकी फिक्र मत कर...मेरे दुकान पर भी कभी कभी आ जाया करना...मुझे तेरी जैसी औरतें बहुत पसंद हैं धन्नो.." पंडित जी की इस बात को धन्नो सुनते ही खुश हो उठी और उसने पंडित जी को अपने घर आने का न्योता दे डाली ...........

"मैं तो आपके दुकान पर आती जाती रहूंगी...आपको भी मेरे घर आना पड़ेगा....... मेरी भी इच्च्छा है की मैं आप को अपने घर पर देखूं.."

फिर पंडित जी ने कहा ...........

"ठीक है...समय तो मिलता नही फिर भी दस मिनट के लिए ही सही ...मैं आउन्गा ज़रूर..."

धन्नो ने पंडित जी से आगे बोली ...........

"मेरा घर गाँव के किनारे वाले बड़े बगीचे के पास मे है.. वहाँ दो घर मिलेंगे जो थोड़ी थोड़ी दूरी पर हैं उसमे से एक मेरा और दूसरा इसका है..." इतना कहते हुए धन्नो ने सावित्री की ओर इशारा किया.

पंडित जी फिर आगे बोले...........

"चलो इसी बहाने सावित्री का भी घर देख लेंगे...क्यों सावित्री...?" और सावित्री से पुच्छे तब सावित्री ने धीरे से मुस्कुराते हुए बोली

"जी ...ठीक है...."

फिर आगे बोले ...........

"तुम अपने मर्द के बारे मे तो कुच्छ बताई नही..."

फिर धन्नो कुच्छ खामोश रही फिर बोली ...........

"उस कमीने के बारे मे क्या बताउ.....वो मेरे लिए मर्द कम मौत ज़्यादा है.....दूसरे शहर मे अपना कमाता ख़ाता है...और उस शराबी ने तो मेरी जिंदगी मे ज़हर ही घोल डाला है....घर से कोई मतलब ही नही रखता........... साल भर मे दो दिन के लिए ही घर आ जाय तो बहुत बड़ी बात है..."

फिर आगे बोली ...........

"वो जो कमाता है कमीना सब दारू पी जाता है..बेटी की पहली शादी मे भी कोई पैसा वैसा नही दिया ..आख़िर किसी तरह मुझे ही झेलना पड़ा..........सच कह रही हूँ कभी कभी गुस्सा इतना आता है कि सोचती हूँ कि वो दारुबाज मर जाता तो मैं अपनी माँग खुशी से धो डालती..."

धन्नो का अपने पति के उपर गुस्से को देख कर बोले...........

"क्या कह रही हो अपने मर्द के बारे मे...ऐसा नही कहते...आख़िर जैसा भी है तुम्हारा पति है..."

इतना सुनना था की धन्नो के गुस्से मे तूफान आ गया...........

"उस बुर्चोदा की बात मत कीजिए...वो मेरा पति नही बल्कि दोगला है...बुर्चोदा साला अपनी बाप के लंड के पानी से पैदा होता तब तो अपने घर बीबी बेटी बेटा को समझता...उसकी मा ना जाने किससे किससे चुदवा कर ऐसा दरुबाज़ पैदा कर डाली जो मेरी जिंदगी ही बर्बाद कर दिया,..................सच कहती हूँ......मुझे उसके उपर इतना गुस्सा लगती है की मैं भगवान से मनाती हूँ की मर जाता तो अच्च्छा होता..."

धन्नो ने ये सारी बातें तेज़ी से कह डाली फिर भी उसे संतोष नही हुआ और आयेज बकना सुरू कर दी...........

"कौन ऐसा होगा इंसान इस दुनिया मे जिसकी बेटी और बेटे जवान हो गये हो और वो उनकी शादी के बजाय दारू मे ही मस्त रहता हो,.......उसी के वजह से बेटा भी एक जवान लड़की ले कर भाग गया और अभी तक हम दोनो मा बेटी की खोज खबर लेने नही आया...पता नही किसकी दया से हम दोनो मा बेटी इस दुनिया मे जिंदा हैं..."

पंडित जी ने धन्नो की बात सुनकर चुप हो गये फिर एक गहरी साँस लेकर बोले...........

"तुम ठीक ही कहती हो...नशा करने का ये मतलब नही होता की अपने पत्नी और संतानो से ही मुँह मोड़ ले..."

फिर आगे बोले...........

"मैं तुम्हारे घर जल्दी ही आउन्गाअ...वैसे जब शादी ठीक हो जाए तो मुझे भी बता देना जो मदद हो सकेगी मैं भी कर दूँगा.."