Jaal -जाल compleet

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raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 09:17

जाल पार्ट--45

गतान्क से आगे......

हाथ-पाँव बँधे समीर को अकरम रज़ा ने उसी तरह झरने के पास था.हुआ ये था कि रज़ा कंट्रोल रूम से निकला तो उस सफेद क़ुआलिस का पीछा करने के लिए था लेकिन थोड़ा आगे बढ़ते ही उसका दिमाग़ ठनका & उसने आल्टो & जीप्सी मे बैठे अपने आदमियो को क़ुआलिस को ओवर्टेक कर उसे रोकने को कहा & खुद 5 पोलिसेवालो के साथ कंधार की ओर चल पड़ा.ना जाने क्यू उसे ऐसा लग रहा था कि उसे वही झरने के पास कुच्छ सुराग मिलेगा.जब वो वाहा पहुचा तो मदद के लिए पागलो की तरह चिल्लाता,रोता-बिलखता समीर दिखा.उसने उसके बंधन खोल उस से सवाल किए & जो समीर ने बताया उसे सुनके उसे अपने कानो पे यकीन नही हुआ.

समीर के मुताबिक उसका बाप वाहा सोनिया के साथ आया था जिस देख ब्रिज गुस्से मे पागल हो अपनी छुपने की जगह से वाहा भागता हुआ आया & उसके बाप से भीड़ गया.दोनो मे काफ़ी हाथापाई हुई,सोनिया उन्हे अलग करने की कोशिश कर रही थी लेकिन दोनो को कुच्छ नही सूझ रहा था & उसी सब के बीच पता नही कैसे तीनो किनारे तक पहुँच गये.वो चीख-2 के अपने आप को आगाह कर रहा था लेकिन अगले ही पल तीनो कगार सेकयि फीट नीचे गिर गये थे.समीर के मुताबिक उसे क्लेवर्त से हरपाल ने अगवा किया था.वो गेस्ट हाउस मे सोया हुआ था जब उसने उसकी नाक पे बेहोशी की दवा वाला रुमाल दबा उसे बेहोश किया & फिर उसी की कार मे डाल उसे ले वाहा से फरार हो गया.उसे ये नही पता था कि उसे कहा रखा गया था लेकिन वो जगह किसी गोदाम जैसी लगती थी.

शुरू मे तो उसे लगा कि उसे नौकरी से निकालने की वजह से हरपाल ने ऐसा कदम उठाया है लेकिन बाद मे उसे पता चला की इसके पीछे कोठारी का भी हाथ है.उसने अपने बाज़ू दिखाए जहा पे चीरा लगाके उसका खून निकाल उसकी कमीज़ को उस से भिगो के वो ले गये थे.रज़ा को झरने के पास पत्थर के नीचे दबा वो स्टंप पेपर भी मिला था जिसपे विजयंत के दस्तख़त भी थे.उसने समीर से हरपाल के बारे मे पुछा की जब झरने के पास हाथापाई हो रही थी तो वो कहा था तो समीर ने बताया कि ब्रिज ने उसे वाहा आने से पहले ही उसे पैसे दिए थे.उसने उनकी बातें सुन ली थी & उसी से ये अंदाज़ा लगाया था कि ब्रिज को शायद किसी तरह इस बात का पता चल गया था कि हरपाल समीर से नाराज़ है & उसी बात का फ़ायदा उसने उठाया था.जब हाथापाई हुई तो हरपाल उसे वाहा नही दिखा था जबकि वही था जिसने उसे रेलिंग के पार उस जगह पे वैसे बाँध के बिठाया था.

रज़ा ने हरपाल की खोज के लिए आदमी दौड़ा दिए थे लेकिन उसे पता था कि वो नही मिलने वाला था.1 बात और उसे परेशान कर रही थी.वो ये कि सब कुच्छ उसे बहुत साधारण,बहुत सिंपल लग रहा था.ब्रिज कोठारी जैसा पहुँचा हुआ कारोबारी ऐसा कमज़ोर जाल बुनेगा कि अगर कुच्छ गड़बड़ हो तो उसके खिलाफ सारे सबूत इतनी आसानी से जुट जाएँ.मगर & कौन उसे फँसाने की सोच सकता था?..उसका सबसे बड़ा दुश्मन तो उसके साथ झरने की गोद मे सोया था.समीर भी झूठ बोलता नही दिख रहा था.उसके बाज़ू के निशान,उसकी कमज़ोर हालत & उसकी घबराहट सब उसकी सच्चाई की गवाही दे रहे थे.उसने आवंतिपुर सिविल हॉस्पिटल के साइकाइयेट्री के हेड डॉक्टर से भी बात की थी & उसकी शुरुआती रिपोर्ट भी यही कहती थी कि समीर किडनॅपिंग & बाप की दर्दनाक मौत को इतने करीब से देखने से गहरे सदमे मे है.उसने बलबीर का भी बयान दर्ज किया था & उसने भी उसे यही बताया था कि विजयंत को कोठारी पे शक़ था & उसने उसे इसी बात की तहकीकात के लिए लगाया था.वो क़ुआलिस जो कंधार से निकली थी,उसे पोलीस वालो ने रोक लिया था & उसमे से 1 डर से काँपता ड्राइवर निकला था जिसने उन्हे बताया कि 1 शख्स ने उसे ऐसा करने के लिए रुपये दिए थे.जब उसे हरपाल की तस्वीर दिखाई गयी तो उसने उसे पहचान लिया था.सारे सिरे मिल रहे थे मगर कुच्छ तो था जो अभी भी रज़ा को खटक रहा था.

रीता,प्रणव & शिप्रा आवंतिपुर पहुँच चुके थे मगर उन सब से पहले पहुँची थी रंभा.सभी को रज़ा ने ही खबर दी थी.समीर उसकी बाहो मे फुट-2 के किसी बच्चे की तरह रोया था & उसके साथ उसकी भी आँखे बरस पड़ी थी.उसे बिल्कुल अंदाज़ा नही था कि इस सब का अंजाम ऐसा दर्द भरा होगा.विजयंत & उसका रिश्ता नाजायज़ था,दोनो के रिश्ते की बुनियाद जिस्मानी थी & बस चंद दिन ही तो हुए थे उन्हे साथ मिले लेकिन इन ज़रा से दीनो मे ही 1 अजीब सा नाता जुड़ गया था दोनो के बीच मे.आज कुद्रत ने विजयंत के साथ-2 उस नाते को भी ख़त्म कर दिया था & रंभा के दिल मे टीस उठ रही थी.ये तकलीफ़ उसे समीर के लापता होने पे भी नही महसूस हुई थी लेकिन अब अपने ससुर की मज़बूत बाहो मे फिर कभी ना क़ैद हो पाने का गम उसकी आँखो से आँसुओ की शक्ल मे बरस रहा था.

"मिस्टर.प्रणव,आपके ससुर की बॉडी अभी तक झरने से बरामद नही हुई है.",रज़ा ने प्रणव को कुच्छ फॉरमॅलिटीस पूरी करने के लिए आवंतिपुर पोलीस हेडक्वॉर्टर्स बुलाया था,"..मिस्टर.&म्र्स.कोठारी की लाशें तो मिल गयी हैं लेकिन मिस्टर.मेहरा की लाश हमारे हाथ अभी तक नही लगी है.झरने का पानी बहुत गहरा है & आगे वो पानी तेज़ बहती नदी की शक्ल अख्तियार कर लेता है.ख़तरे के बावजूद गोताखोरो ने पूरी कोशिश की.उसी का नतीजा है कि 2 लाशें हमे मिली."

"तो डॅड की बॉडी का क्या हुआ होगा?"

"देखिए,2 सूरतें है या तो उनकी बॉडी बह के बहुत आगे निकली है.उस बात को मद्देनज़र रखते हुए हमने उस नदी के किनारे बसे सभी गाँवो की पोलीस को होशियार कर दिया है..& दूसरी सूरत है की बॉडी वही झरने के गिरने वाली जगह पे गहरे पानी मे डूब गयी है & उस सूरत मे हम लाचार हैं क्यूकी वाहा जो भी गोता लगाएगा वो सीधा मौत के मुँह मे जाएगा."

"हूँ."

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विजयंत मेहरा की तस्वीर उसके बुंगले के लॉन मे लगे सफेद शामियने के नीचे 1 मेज़ पे रखी थी जो उसकी शोक-सभा मे आए लोगो के लाए फूलो से घिरी हुई थी.परिवार के सभी सदस्य सफेद लिबास मे थे.रीता की आँखो पे काला चश्मा चढ़ा था & वो सभी लोगो के अफ़सोस पे बस हाथ जोड़ रही थी.15 दिन हो गये थे उस हादसे को & अब समीर भी पहले से काफ़ी बेहतर दिख रहा था.

उसने आज का सारा इंतेज़ाम अपनी देख-रेख मे करवाया था.कल सवेरे विजयंत का वकील उसकी वसीयत लेके आनेवाला था & मेहमानो की ख़ैयारियत पुछ्ते प्रणव का दिमाग़ अभी भी उसी के बारे मे सोच रहा था.जब उसने आवंतिपुर मे पहली बार समीर के मिलने के बाद देखा था तो उसे बहुत खुशी हुई थी-इसलिए नही कि उसका अज़ीज़ साला फिर से मिल गया बल्कि इसीलिए की वो उसे कंपनी संभालने या फिर उसके फ़ैसले लेने के काबिल नही लगा था.

मगर समीर ने उसकी सोच को ग़लत साबित करते हुए अपने को बिल्कुल ठीक कर लिया था.विजयंत की लाश नही मिली थी & ना ही उसका अंतिम संस्कार हुआ था,उस सूरत मे किसी की समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए,तब समीर ने ही फ़ैसला लिया था कि ये शोक सभा रखी जाए & उसकी आत्मा की शांति के लिए उपरवाले से दुआ की जाए.

समीर & शिप्रा अपनी मा के आस-पास ही घूमते दिख रहे थे & इन सब से थोड़ा अलग-थलग बैठी थी रंभा.उसने अपने को समीर की तीमारदारी मे डूबा दिया था & उसके ठीक होने का कुच्छ श्रेय उसे भी मिलता था लेकिन उसे समीर अब बदला-2 सा लग रहा था.ऐसा लगता था जैसे अगवा कर उसके समीर को गायब कर उसकी जगह किसी दूसरे समीर को उसके पास भेज दिया गया हो.

उसकी सास & ननद का रुख़ तो अभी भी ठंडा ही था.केवल 1 प्रणव था जो उस से हमदर्दी से बात करता था.शोक-सभा मे आए लोग उस से भी मिल रहे थे & वो भी सभी को हाथ जोड़ उनसे बात कर रही थी.उसने आँखो के कोने से देखा कि कामया वाहा आई & तस्वीर पे माला चढ़ाने के बाद पहले रीता & शिप्रा से मिली & उसके बाद समीर के साथ भीड़ से थोड़ा अलग होके बात करने लगी.बाते करते हुए समीर का बाया हाथ आगे बढ़ा & कामया के दाए हाथ को पकड़ के दबाया लेकिन फिर फ़ौरन ही उसे छ्चोड़ दिया & दोनो इधर-उधर देखने लगे जैसे ये पक्का कर रहे हों कि उनकी चोरी पकड़ी तो नही गयी.रंभा ने फ़ौरन उनकी तरफ से नज़रें हटाई & सामने खड़े मेहमान से बात करने लगी.

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"उउन्न्ह..",समीर ने करवट बदली & पीछे से उसे बाहो मे भर उसके बाए गाल को चूमती रंभा को देखने लगा,"..सोई नही तुम अभी तक?",रंभा ने मुस्कुराते हुए इनकार मे सर हिलाया.वो किसी भी कीमत पे समीर को खुद से दूर नही जाने दे सकती थी.उसने तय कर लिया था कि अपने सारे हथियारो का इस्तेमाल कर अपने पति को खुद से बेरूख़् नही होने देगी.उसने समीर के चेहरे को हाथो मे भर उसके होंठ चूमे लेकिन कुच्छ पलो के बाद समीर ने चेहरा घुमा के किस तोड़ दी.

"क्या बात है?",रंभा खिज उठी थी लेकिन उसकी आवाज़ ने उसके दिल के भाव को ज़ाहिर नही होने दिया.

"कुच्छ नही.बस मन नही है."

"अब अच्छी नही लगती मैं क्या?",मासूमियत से वो पति के उपर इस तरह से झुकी की नाइटी के गले मे से उसकी बिना ब्रा की चूचियाँ अपने पूरे शबाब मे उसे नज़र आएँ.

"ये बात नही है.",समीर की उंगलिया उसके चेहरे पे फिसली & निगाहें उसके सीने पे,"..बस सचमुच मन नही है,जान.",रंभा ने उसकी बात अनसुनी करते हुए दोबारा उसके लबो से लब सताए & अपनी छातियाँ उसके सीने पे दबा दी.समीर के बाज़ू उसकी पीठ पे कसे तो उसे बहुत खुशी हुई..उसका हुस्न अपना असर दिखा रहा था.समीर ने उसे पलटा & उसके उपर चढ़ उसे चूमने लगा.रंभा ने खुद को पति की बाहो मे ढीला छ्चोड़ दिया.समीर के हाथ उसकी नाइटी मे घुस रहे थे & कभी उसकी जाँघो तो कभी पेट पे फिसल रहे थे.

"आननह..उसने उसके निपल्स को उंगलियो मे पकड़ चिकोटी काटी तो उसकी आह निकल गयी & उसने भी समीर के लंड को उसके पाजामे के उपर से पकड़ लिया & लंड पकड़ते ही उसे विजयंत के लंड की याद आ गयी.उसका जिस्म ससुर के मज़बूत जिस्म के लिए तड़प उठा & उसके दिल मे कसक उठी.उसने समीर का लंड बहुत ज़ोर से जाकड़ लिया.वो ये भूल गयी थी की उसके पति को उसका लंड छुना पसंद नही था.समीर ने उसका हाथ लंड से अलग किया & दोनो कलाईयो को उसके सर के दोनो तरफ बिस्तर पे दबा उसके गले को चूमने लगा.रंभा को थोड़ा बुरा लगा था लेकिन अब समीर ही उसका अकेला सहारा था & फिलहाल वो उसे नाराज़ नही कर सकती थी.समीर की गर्म साँसे उसकी मस्ती को बढ़ा रही थी.उसने उसकी पकड़ मे कसमसाते हुए अपनी कमर उचकाई तो समीर उसकी बेचैनी का सबब समझते हुए नीचे आया & उसकी पॅंटी सरका के उसकी चूत चाटने लगा.रंभा भी थोड़ी देर के लिए अपनी उलझने भूल गयी & बस मस्ती मे खोने लगी.

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वो शख्स 1 कार मे विजयंत के बुंगले का बाहर से मुआयना कर अपने होटेल की ओर जा रहा था.उस रात झरने का नज़ारा अभी भी उसके ज़हन मे ताज़ा था.ब्रिज के विजयंत से भिड़ते ही वो समझ गया था कि यहा बहुत गड़बड़ होने वाली है & वो अपने च्चिपने की जगह से उठके झाड़ियो की ओट मे से तेज़ी से अपनी कार की तरफ भागा था.गड़बड़ का मतलब था पोलीस & पोलीस का मतलब था उसका फिर से जैल जाना & ऐसा वो हरगिज़ नही चाहता था.कम से कम तब तक तो नही जब तक की उसका इन्तेक़ाम पूरा ना हो जाए.वो कुच्छ दूर गया था कि उस कच्चे रास्ते पे 1 साया बहुत तेज़ी से भागता दिखा.वो जो भी था वो झरने की तरफ से ही भगा था.उसने क़ोहसिह की लेकिन उसकी शक्ल नही देख पाया.उसने इतना ज़रूर देखा कि वो शख्स कच्चे रास्ते के दूसरे तरफ की झाड़ियो मे कुद्ता हुआ घुस गया था & जब तक वो अपनी कार तक पहुँचा उसने देखा की कच्चे रास्ते से 1 मोटरसाइकल उतरके तेज़ी से वाहा से जा रही है.उसके बाद वो भी अपनी कार मे निकल भागा था लेकिन 3 चीखो की आवज़ सुनाई दी थी उसे,हैरत & घबराहट से भरी हुई चीखो की आवाज़.

वो कार मे झरनो से 2 किमी दूर गया होगा जब उसने पहाड़ी घुमावदार रास्ते पे नीचे की ओर 1 सवारी को उपर बढ़ते देखा.उसने फ़ौरन अपनी कार तेज़ी से आगे बढ़ते हुए कुच्छ पेड़ो के बीच घुसा दी & जैसे ही वो सवारी जोकि रज़ा की जीप थी,उसके पास से गुज़री & उसके कानो मे उसके एंजिन की आवाज़ आना भी बंद हो गयी वो वाहा से निकला & फिर सीधा आवंतिपुर मे ही रुका.उस बाइक को उसने दोबारा नही देखा था.उसके बाद कुच्छ दिन गोआ मे रहने के बाद आज सवेरे ही वो डेवाले आ गया था.अब उसे जल्द से जल्द रंभा से मुलाकात करनी थी.

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"आहह..समीर..हाआंणन्न्..बस..थोड़ी देर और...हाआंणन्न्..!",बिस्तर पे लेटी रंभा के उपर झुका समीर उसकी चूत मे तेज़ी से लंड अंदर-बाहर कर रहा था.कुच्छ देर पहले उसने उसकी चूत को बस थोड़ी देर ही चटा था & वो झाड़ भी नही पाई थी.जब तक वो कुछ समझती उसकी टाँगे फैलाक़े वो अपना लंड अंदर डाल उसकी चुदाई शुरू कर चुका था.उसका लंड उसे उसके सफ़र के अंजाम की ओर ले जा रहा था.वो उसके बाजुओ मे नाख़ून धंसाए अपनी कमर उचकाते हुए उसका पूरा साथ दे रही थी कि तभी समीर ने आह भरी & उसने उसका वीर्य अपनी चूत मे च्छूटता महसूस किया.अगले पल समीर उसकी छातियो पे ढेर था.वो नही झड़ी थी उस अब बहुत खिज हो रही थी.कुच्छ देर तक वैसे ही उसके सीने पे लेटे रहने के बाद समीर ने सर उठाया & उसके होतो को हल्के से चूम उसके बगल मे लेटा & फिर उसकी ओर पीठ घुमा चादर ओढ़ के सोने लगा.रंभा उसे हैरत से देख रही थी.पहले तो उसने ऐसा कभी नही किया था..फिर आज क्या वजह थी?..आख़िर क्यू बदल गया था वो?..& उस कामिनी कामया का क्या लेना-देना था इस सब से?..समीर गहरी नींद मे चला गया था.वो उठी & अपनी नाइटी उठाके बातरूम चली गयी.

उसे थोड़ी घुटन सी महसूस हो रही थी.उसने नाइटी पहन ली थी.उसके उपर उसने अपना गाउन डाला & कमरे से बाहर चली आई.आवंतिपुर से आने के बाद समीर उसे लेके अपने मा-बाप के बगल मे बने अपने बंगल मे रहने लगा था.उनका बेडरूम उपरी मंज़िल पे था.रंभा सीढ़ियो से नीचे उतरी & अपने बंगल के सामने के लॉन मे घूमने लगी.बाहर बहुत उमस थी.उसने आसमान मे देखा तो उसे चाँद का मद्धम अक्स बदलो के पीछे च्छूपा दिखा..लगता था बारिश होने वाली थी.

"नींद नही आ रही?",ख़यालो मे गुम वो चौंक पड़ी & पीछे घूमी तो देखा प्रणव खड़ा था,"..मुझे भी नही आ रही.अगर बुरा ना मानो तो तुमहरे साथ टहल लू."

"ज़रूर.",रंभा मुस्कुराइ.प्रणव उसे बहुत भला & अच्छा इंसान लगता था,"इसमे बुरा मानने वाली क्या बात है."

"1 बात पुच्छू?",कुच्छ देर तक खामोशी से साथ चलने के बाद प्रणव ने उस से पुचछा.

"क्या?"

"तुम्हे नींद क्यू नही आ रही है?",रांभ खामोशी से सर झुका के घूमती रही.

"उसकी वजह कही समीर तो नही?",रंभा ने चौक के उसे देखा..कही उसका चेहरा उसके दिल की उलझने तो बयान नही कर रहा?..& फिर नज़रे नीची कर टहलने लगी,"..मैं ये बात इसीलिए कह रहा हू कि मेरे जागने की वजह भी तुम्हारे जैसी ही है.तुम भाई की वजह से जागी हो & मैं बेहन की वजह से.",रंभा उसे देखने लगी.

"रंभा,दरअसल इसमे इन भाई-बेहन की भी कोई ग़लती नही है.इन्हे पाला-पोसा ही इसी तरह गया है कि इन्हे आजतक कभी किसी चीज़ की कमी नही हुई ये इस कारण कभी ये नही समझ पाते कि दूसरे को कभी कोई ज़रूरत महसूस हो सकती है..",वो लॉन के झूले पे बैठ गया था & रंभा भी उसके बगल मे बैठ गयी.प्रणव की निगाहें 1 पल को उसके खुले गाउन के बीच उसकी नाइटी के गले से दिखते उसके गोरे क्लीवेज पे गयी & फिर वापस उसके चेहरे पे,"..& ये हमारे दर्द से अंजान रहते हैं और उसे कभी मिटा नही पाते."

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क्रमशः.......

JAAL paart--45

gataank se aage......

Hath-panv bandhe Sameer ko Akram Raza ne usi tarah jharne ke paas tha.hua ye tha ki raza control room se nikla to us safed Qualis ka peechha karne ke liye tha lekin thoda aage badhte hi uska dimagh thanka & usne Alto & jeeps me baithe apne aadmiyo ko qualis ko overtake kar use rokne ko kaha & khud 5 policevalo ke sath kamdhar ki or chal pada.na jane kyu use aisa lag raha tha ki use vahi jharne ke paas kuchh surag milega.jab vo vaha phuncha to madad ke liye paglo ki tarah chillata,rota-bilakhta sameer dikha.usne uske bandhan khol us se sawal kiye & jo sameer ne bataya use sunke use apne kano pe yakeen nahi hua.

Sameer ke mutabik uska baap vaha soniya ke sath aaya tha jis dekh brij gusse me pagal ho apni chhupne ki jagah se vaha bhagta hua aaya & uske baap se bhid gaya.dono me kafi hathapai hui,sonia unhe alag karne ki koshish kar rahi thi lekin dono ko kuchh nahi sujh raha tha & usi sab ke beech pata nahi kaise teeno kinare tak pahuncha gaye.vo chikh-2 ke apne aap ko aagah kar raha tha lekin agle hi pal teeno kagar sekayi feet neeche gir gaye the.sameer ke mutabik use Clayworth se Harpal ne agwa kiya tha.vo guest house me soya hua tha jab usne uski nak pe behoshi ki dawa wala rumal daba use behosh kiya & fir usi ki car me daal use le vaha se farar ho gaya.use ye nahi pata tha ki use kaha rakha gaya tha lekin vo jagah kisi godam jaisi lagti thi.

Shuru me to use laga ki use naukri se nikalne ki vajah se harpal ne aisa kadam uthaya hai lekin baad me use pata chala ki iske peechhe kothari ka bhi hath hai.usne apne bazu dikhaye jaha pe chira lagake uska khun nikal uski kamiz ko us se bhigo ke vo le gaye the.raza ko jharne ke paas patthar ke neeche daba vo stamp paper bhi mila tha jispe vijayant ke dastkhat bhi the.usne sameer se harpal ke bare me puchha ki jab jharne ke paas hathapai ho rahi thi to vo kaha tha to sameer ne bataya ki brij ne use vaha aane se pehle hi use paise diye the.usne unki baaten sun li thi & usi se ye andaza lagaya tha ki brij ko shayad kisi tarah is baat ka pata chal gaya tha ki harpal sameer se naraz hai & usi baat ka fayda usne uthaya tha.jab hathapai hui to harpal use vaha nahi dikha tha jabki vahi tha jisne use railing ke paar us jagah pe vaise bandh ke bithaya tha.

Raza ne harpal ki khoj ke liye aadmi dauda diye the lekin use pata tha ki vo nahi milne vala tha.1 baat aur use pareshan kar rahi thi.vo ye ki sab kuchh use bahut sadharan,bahut simple lag raha tha.brij kothari jaisa pahuncha hua karobari aisa kamzor jaal bunega ki agar kuchh gadbad ho to uske khilaf sare saboot itni asani se jut jayen.magar & kaun use phansane ki soch sakta tha?..uska sabse bada dushman to uske satha jharne ki god me soya tha.sameer bhi jhuth bolta nahi dikh raha tha.uske bazu ke nishan,uski kamzor halat & uski ghabrahat sab uski sachchai ki gavahi de rahe the.usne avantipur civil hospital ke psychiatry ke head doctor se bhi baat ki thi & uski shuruati report bhi yehi kehti thi ki sameer kidnapping & baap ki dardnak maut ko itne karib se dekhne se gehre sadme me hai.usne balbir ka bhi bayan darj kiya tha & usne bhi use yehi bataya tha ki vijayant ko kothari pe shaq tha & usne use isi baat ki tehkikat ke liye lagaya tha.vo qualis jo kamdhar se nikli thi,use police valo ne rok liya tha & usme se 1 darr se kanpta driver nikla tha jisne unhe bataya ki 1 shakhs ne use aisa karne ke liye rupaye diye the.jab use harpal ki tasveer dikhayi gayi to usne use pehchan liya tha.sare sire mil rahe the magar kuchh to tha jo abhi bhi raza ko khatak raha tha.

Rita,Pranav & Shipra avantipur pahunch chuke the magar un sab se pehle pahunchi thi Rambha.sabhi ko raza ne hi khabar di thi.sameer uski baaho me phut-2 ke kisi bachche ki tarah roya tha & uske sath uski bhi aankhe baras padi thi.use bilkul andaza nahi tha ki is sab ka anjam aisa dard bhara hoga.vijayant & uska rishta najayaz tha,dono ke rishte ki buniyad jismani thi & bas chand din hi to hue the unhe sath mile lekin in zara se dino me hi 1 ajib sa nata jud gaya tha dono ke beech me.aaj kudrat ne vijayant ke sath-2 us nate ko bhi khatm kar diya tha & rambha ke dil me tees uth rahi thi.ye taklif use sameer ke lapata hone pe bhi nahi mehsus hui thi lekin ab apne sasur ki mazbut baaho me fir kabhi na qaid ho pane ka ghum uski aankho se aansuo ki shakl me baras raha tha.

"mr.pranav,aapke sasur ki body abhi tak jharne se baramad nahi hui hai.",raza ne pranav ko kuchh formalities puri karne ke liye avantipur police headquarters bulaya tha,"..mr.&mrs.kothari ki lashen to mil gayi hain lekin mr.mehra ki lash humare hath abhi tak nahi lagi hai.jharne ka pani bahut gehra hai & aage vo pani tez behti nadi ki shakl akhtiyar kar leta hai.khatre ke bavjud gotakhoro ne puri koshish ki.usi ka natija hai ki 2 lashen hume mili."

"to dad ki body ka kya hua hoga?"

"dekhiye,2 suraten hai ya to unki body beh ke bahut aage nikli hai.us baat ko maddenazar rakhte hue humne us nadi ke kinare base sabhi ganvo ki police ko hoshiyar kar diya hai..& dusri surat hai ki body vahi jharne ke girne vali jagah pe gehre pani me doob gayi hai & us surat me hum lachahr hain kyuki vaha jo bhi gota lagayega vo seedha maut ke munh me jayega."

"hun."

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vijayant mehra ki tasveer uske bungle ke lawn me lage safed shamiyane ke neeche 1 mez pe rakhi thi jo uski shok-sabha me aaye logo ke laye phoolo se ghiri hui thi.parivar ke sabhi sadasya safed libas me the.rita ki aankho pe kala chashma chadha tha & vo sabhi logo ke afsos pe bas hath jod rahi thi.15 din ho agye the us hadse ko & ab sameer bhi pehle se kafi behtar dikh raha tha.

usne aaj ka sara intezam apni dekh-rekh me karwaya tha.kal savere vijayant ka vakil uski vasiyat leke aanevala tha & mehmano ki khaiariyat puchhte pranav ka dimagh abhi bhi usi ke bare me soch raha tha.jab usne avantipur me pehli baar sameer ke milne ke baad dekha tha to use bahut khushi hui thi-isliye nahi ki uska aziz sala fir se mil gaya balki isiliye ki vo use company sambhalne ya fir uske faisle lene ke kabil nahi laga tha.

magar sameer ne uski soch ko galat sabit karte hue apne ko bilkul thik kar liya tha.vijayant ki lash nahi mili thi & naa hi uska antim sanskar hua tha,us surat me kisi ki samajh nahi aa raha tha ki kya kiya jaye,tab sameer ne hi faisla liya tha ki ye shok sabha rakhi jaye & uski aatma ki shanti ke liye uparwale se dua ki jaye.

sameer & shipra apni maa ke aas-paas hi ghumte dikh rahe the & in sab se thoda alag-thalag baihti thi rambha.usne apne ko sameer ki teemardari me duba diya tha & uske thik hone ka kuchh shrey use bhi milta tha lekin use sameer ab badla-2 sa lag raha tha.aisa lagta tha jaise agwa kar uske sameer ko gayab kar uski jagah kisi dusre sameer ko uske paas bhej diya gaya ho.

uski saas & nanad ka rukh to abhi bhi thanda hi tha.keval 1 pranav tha jo us se humdardi se baat karta tha.shok-sabha me aaye log us se bhi mil rahe the & vo bhi sabhi ko hath jod unse baat kar rahi thi.usne aankho ke kone se dekha ki Kamya vaha aayi & tasveer pe mala chadhane ke baad pehle rita & shipra se mili & uske baad sameer ke sath bheed se thoda alag hoke baat karne lagi.baate karte hue sameer ka baya hath aage badha & kamya ke daye hath ko pakad ke dabaya lekin fir fauran hi use chhod diya & dono idhar-udhar dekhne lage jaise ye pakka kar rahe hon ki unki chori pakdi to nahi gayi.rambha ne fauran unki taraf se nazren hatayi & samne khade mehman se baat karne lagi.

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"uunnhh..",sameer ne karwat badli & peechhe se use baaho me bhar uske baye gaal ko chumti rambha ko dekhne laga,"..soyi nahi tum abhi tak?",rambha ne muskurate hue inkar me sar hilaya.vo kisi bhi keemat pe sameer ko khud se door nahi jane de sakti thi.usne tay kar liya tha ki apne sare hathyaro ka istemal kar apne pati ko khud se berukh nahi hone degi.usne sameer ke chehre ko hatho me bhar uske honth chume lekin kuchh palo ke baad sameer ne chehra ghuma ke kiss tod di.

"kya baat hai?",rambha khij uthi thi lekin uski aavaz ne uske dil ke bhav ko zahir nahi hone diya.

"kuchh nahi.bas man nahi hai."

"ab achhi nahi lagti main kya?",masumiyat se vo pati ke upar is tarah se jhuki ki nighty ke gale me se uski bina bra ki chhatiya apne pure shabab me use nazar aayen.

"ye baat nahi hai.",sameer ki ungliya uske chehre pe fisli & nigahen uske seene pe,"..bas sachmuch man nahi hai,jaan.",rambha ne uski baat ansuni karte hue dobara uske labo se lab sataye & apni chhatiya uske seene pe daba di.sameer ke bazu uski pith pe kase to use bahut khushi hui..uska husn apna asar dikha raha tha.sameer ne use palta & uske upar chadh use chumne laga.rambha ne khud ko pati ki baaho me dhila chhod diya.sameer ke hath uski nighty me ghus rahe the & kabhi uski jangho to kabhi pet pe fisal rahe the.

"aannhhhh..usne uske nipples ko ungliyo me pakad chikoti kati to uski aah nikal gayi & usne bhi sameer ke lund ko uske pajame ke uapr se pakad liya & lund pakadte hi use vijayant ke lund ki yaad aa gayi.uska jism sasur ke mazbut jism ke liye tadap utha & uske dil me kasak uthi.usne sameer ka lund bahut zor se jakad liya.vo ye bhul gayi thi ki uske pati ko uska lund chhuna pasand nahi tha.sameer ne uska hath lund se alag kiya & dono kalaiyo ko uske sar ke dono taraf bistar pe daba uske gale ko chumne laga.rambha ko thoda bura laga tha lekin ab sameer hi uska akela sahara tha & filhal vo use naraz nahi kar sakti thi.sameer ki garm sanse uski masti ko badha rahi thi.usne uski pakad me kasmasate hue apni kamar uchkayi to sameer uski bechaini ka sabab samajhte hue neeche aaya & uski panty sarka ke uski chut chaatne laga.rambha bhi thodi der ke liye apni uljhane bhul gayi & bas masti me khone lagi.

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vo shakhs 1 car me vijayant ke bungle ka bahar se muayana kar apne hotel ki or ja raha tha.us raat jharne ka nazara abhi bhi uske zehan me taza tha.brij ke vijayant se bhidte hi vo samajh gaya tha ki yaha bahut gadbad hone vali hai & vo apne chhipne ki jagah se uthke jhadiyo ki ot me se tezi se apni car ki taraf bhaga tha.gadbad ka matlab tha police & police ka matlab tha uska fir se jail jana & aisa vo hargiz nahi chahta tha.kam se kam tab tak to nahi jab tak ki uska inteqam pura na ho jaye.vo kuchh der gaya tha ki us kachche raste pe 1 saya bahut tezi se bhagta dikha.vo jo bhi tha vo jharne ki taraf se hi bhaga tha.usne kohsih ki lekin uski shakl nahi dekh paya.usne itna zarur dekha ki vo shakhs kachche raste ke dusre taraf ki jhadiyo me kudta hua ghus gaya tha & jab tak vo apni car tak pahuncha usne dekha ki kachche raste se 1 motorcycle utarke tezi se vaha se ja rahi hai.uske baad vo bhi apni car me nikal bhaga tha lekin 3 chikho ki aavz sunayi di thi use,hairat & ghabrahat se bhari hui chikho ki aavaz.

vo car me jharno se 2 km door gaya hoga jab usne pahadi ghumavdar raste pe neeche ki or 1 savari ko upar badhte dekha.usne fauran apni car tezi se aage badhate hue kuchh pedo ke beech ghusa di & jaise hi vo savari joki raza ki jeep thi,uske paas se guzri & uske kano me uske engine ki aavaz aana bhi band ho gayi vo vaha se nikla & fir seedha avantipur me hi ruka.us bike ko usne dobara nahi dekha tha.uske baad kuchh din Goa me rehne ke baad aaj savere hi vo devalay aa gaya tha.ab use jald se jald rambha se mulakat karni thi.

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"aahhhh..sameer..haaaannnn..bas..thodi der aur...haaaannnn..!",bistar pe leti rambha ke upar jhuka sameer uski chut me tezi se lund andar-bahar kar raha tha.kuchh der pehle usne uski chut ko bas thodid er hi chata tha & vo jhad bhi nahi payi thi.jab tak vo kuch samajhti uski tange failake vo apna lund andar daal uski chudai shuru kar chuka tha.uska lund use uske safar ke anjam ki or le ja raha tha.vo uske bazuo me nakhun dhansaye apni kamar uchkate hue uska pura sath de rahi thi ki tabhi sameer ne aah bhari & usne uska virya apni chut me chhutata mehsus kiya.agle pal sameer uski chhatiyo pe dher tha.vo nahi jhadi thi us eba bahut khij ho rahi thi.kuchh der tak vaise hi uske seen pe lete rehne ke baad sameer ne sar uthaya & uske hotho ko halke se chum uske bagal me leta & fir uski or pith ghuma chadar odh ke sone laga.rambha use hairat se dekh rahi thi.pehle to usne aisa kabhi nahi kiya tha..fir aaj kya vajah thi?..aakhir kyu badal gaya tha vo?..& us kamini kamya ka kya lena-dena tha is sab se?..sameer gehri nind me chala gaya tha.vo uthi & apni nighty uthake bathroom chali gayi.

use thodi ghutan si mehsus ho rahi thi.usne nighty pehan li thi.uske upar usne apna gown dala & kamre se bahar chali aayi.avantipur se aane ke baad sameer use leke apne maa-baap ke bagal me bane apne bungle me rehne laga tha.unka bedroom upri manzil pe tha.rambha sidhiyo se neeche utri & apne bungle ke samne ke lawn me ghumne lagi.bahar bahut umas thi.usne aasmaan me dekha to use chand ka maddham aks badlo ke peechhe chhupa dikha..lagta tha barish hone wali thi.

"nind nahi aa rahi?",khayalo me gum vo chaunk padi & peechhe ghumi to dekha pranav khada tha,"..mujhe bhi nahi aa rahi.agar bura na mano to tumahre sath tehal lu."

"zarur.",rambha muskurayi.pranav use bahut bhala & achha insan lagta tha,"isme bura manane vali kya baat hai."

"1 baat puchhu?",kuchh der tak khamoshi se sath chalne ke baad pranav ne us se puchha.

"kya?"

"tumhe nind kyu nahi aa rahi hai?",rambh khamoshi se sar jhuka ke ghumti rahi.

"uski vajah kahi sameer to nahi?",rambha ne chauk ke use dekha..kahi uska chehra uske dil ki uljhnae to bayan nahi kar raha?..& fir nazre neechi kar tehalne lagi,"..main ye baat isiliye keh raha hu ki mere jagne ki vajah bhi tumahre jaisi hi hai.tum bhai ki vajah se jagi ho & main behan ki vajah se.",rambha use dekhne lagi.

"rambha,darasla isme in bhai-behan ki bhi koi galti nahi hai.inhe pala-posa hi isi tarah gaya hai ki inhe aajtak kabhi kisi chiz ki kami nahi hui ye is karan kabhi ye nahi samajh pate ki dusre ko kabhi koi zarurat mehsus ho sakti hai..",vo lawn ke jhule pe baith gaya tha & rambha bhi uske bagal me baith gayi.pranav ki nigahen 1 pal ko uske khule gown ke beech uski nighty ke gale se dikhte uske gore cleavage pe gayi & fir vapas uske chehre pe,"..& ye huamre dard se anjan rehte hain & use kabhi mita nahi pate."

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kramashah.......


raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 09:18

जाल पार्ट--46

गतान्क से आगे......

"लेकिन समीर तो पहले ऐसा नही था.",रंभा अपनी उंगलियो से खेल रही थी.

"शिप्रा भी पहले ऐसी नही थी लेकिन अब देखो..माना की मॉम का गम बहुत ज़्यादा है लेकिन मुझे तो वो भूल ही गयी है जैसे!"

"परेशान होगी वो भी."

"नही,हमेशा से ही ऐसे होता आया है.अभी मोम का बहाना है तो पहले कभी उसकी कोई पार्टी या फिर सहेली..हुंग!..मैं कब तक बर्दाश्त करू..आख़िर पति हू उसका मेरी भी उस से कुच्छ उमीदें हैं..",वो खामोश हो गया & फिर सामने देखते हुए बोला,"..कुच्छ ज़रूरतें है मेरी भी.",रंभा उसकी बात का मतलब समझ रही थी..यानी दोनो का गम 1 जैसा ही था.वो भी प्यासी थी & प्रणव भी.उसने थोड़ा सा चेहरा दाई तरफ घुमाया..प्रणव सजीला नौजवान था & जिस्म भी सुडोल था..अब विजयंत जैसी बात नही थी लेकिन अब उसके जैसा मर्द दूसरा मिलना शायद नामुमकिन था..ठीक उसी वक़्त प्रणव ने चेहरा घुमाया & दोनो की आँखे लड़ गयी & उसने शायदा रंभा की निगाहो को पढ़ भी लिया.रंभा ने झट से चेहरा घुमा लिया & उसी पल आसमान से बूंदे बरसने लगी.

"अरे..बारिश आ गयी!",रंभा उठके तेज़ी से बंगल की तरफ जाने लगी & प्रणव भी की उसका पैर फिसला.प्रणव उसके दाई तरफ ही था,उसने झट से बाई बाँह उसकी कमर मे डाल उसे थामा & दाए हाथ मे उसका दाया हाथ थाम उसे सहारा देके बंगल के दरवाज़े तक ले आया.तेज़ी से चलने & प्रणव के हाथो के एहसास ने रंभा की धड़कने तेज़ कर दी थी.उसके हसीन चेहरे & उपर-नीचे होते क्लीवेज पे बारिश के मोती चमक रहे थे.अब दोनो बारिश से भीग नही रहे थे लेकिन फिर भी प्रणव ने अपने हाथ उसके जिस्म से हटाए नही थे & रंभा को देखे जा रहा था.रंभा बेबाक लड़की थी लेकिन थी तो लड़की ही & प्रणव की निगाहो,जिनमे उसके साथ की हसरत सॉफ झलक रही थी,की तपिश से उसके गुलाबी गाल & सुर्ख होने लगे थे.

"मैं जाऊं..",थरथरते लबो से वो बस इतना ही कह पाई थी.

"क्यू?",रंभा ने बस उसकी निगाहो मे अपनी सवालिया निगाहो से देखा.

"मेरा साथ पसंद नही तुम्हे?",प्राणवा का हाथ उसकी कमर पे और कस गया था & उसका चेहरा रंभा के दाए गाल के & नज़दीक आ गया था.आसमान मे बिजली काड्की & उसकी चमक मे रंभा ने प्रणव के चेहरे को देखा.ये वो पल था जब उसे फ़ैसला लेना था.1 कदम आगे बढ़ाके बंगल की दहलीज़ के अंदर होती & दोनो का रिश्ता शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाता & अगर वही खड़े हुए बस अपना सर उसके सीने पे झुका देती तो..तो उसे इस परिवार मे अपने ससुर के जाने के बाद 1 और सहारा मिल जाता.समीर की बदली रंगत देख अब उसे प्रणव को अपना साथी बना लेना ठीक लगा & उसने अपना सर दाई तरफ झुका उसके सीने पे रख दिया.

प्रणव ने रंभा के दाए हाथ को थामे हुए ही अपने दाए हाथ से उसकी ठुड्डी उपर की & उसके उपर झुकने लगा.रंभा की साँसे और तेज़ हो गयी.प्रणव की गर्म साँसे वो अपने चेहरे पे महसूस कर रही थी & उसका दिल बहुत ज़ोरो से धड़क रहा था.प्रणव & झुका & उसके नर्म लबो पे सटी पानी की बूँदो को अपने होंठो से हौले से सॉफ किया.रंभा सिहर उठी उस नाज़ुक च्छुअन से.प्रणव के होंठ उसके लबो को सहला रहे थे,उसकी आँखे बंद हो गयी थी & वो बस उस रोमानी लम्हे मे खोए जा रही थी.

प्रणव अब बहुत धीमे से उसके होंठो को चूम रहा था.उसके लब उसकी हर्कतो से कांप रहे थे & जब प्रणव ने किस की शिद्दत बढ़ते हुए उसके होंठो को अपने होंठो की गिरफ़्त मे लिया तो सिले लबो से भी उसकी आह निकल गयी & वो थोड़ा सा उसकी तरफ़ा घूम गयी.प्रणव ने उसके दाए हाथ को छ्चोड़ा & अपने दाए हाथ को भी उसकी कमर मे डाल उसे अपने आगोश मे भर लिया.रंभा के हाथ भी उसके सीने से आ लगे & जब प्रणव के लबो ने उसके लेबो के पार जाने की इजाज़त माँगी तो उसने शरमाते हुए अपने लब बहुत थोड़े से खोल दिए.

प्रणव की ज़ुबान उस ज़रा सी दरार से उसके मुँह मे घुसी & उसकी बेसबरा ज़ुबान से टकराई & उसके बाद रंभा की सारी झिझक ख़त्म हो गयी.उसने अपने इस नये प्रेमी के गले मे बाहें डाल दी & पूरी शिद्दत एक्स आठ उसकी किस का जवाब देने लगी.प्रणव ने उसकी कमर को कसते हुए उसे खुद से ऐसे चिपका लिया की उसकी छातियाँ प्रणव के सीने से पिस गयी & उसका लंड उसके पेट पे दब गया.रंभा उन एहसासो से & मस्त हो गयी & प्रणव के बालो को खींचते हुए उसकी ज़ुबान को चूसने लगी.

प्रणव ने उसे पीछे धकेल के बंगल दरवाज़े की बगल की दीवार से लगा दिया & अपने जिस्म को उसके जिस्म पे दबाते हुए बहुत ज़ोर से चूमने लगा.उसके हाथ रंभा की कमर & पीठ को अपनी बेताबी से जला रहे थे.प्रणव का दाया हाथ नीचे गया & उसने रंभा की जाँघ पकड़ के उपर उठाई & ठीक उसी वक़्त ज़ोर से बिजली काड्की.

"नही!",रंभा उस आवाज़ & रोशनी से जैसे होश मे आई & प्रणव को परे धकेल दिया.दीवार से लगी वो बहुत ज़ोर से साँसे ले रही थी,"..ये ठीक नही!"

"क्या ठीक नही?",प्रणव उसके करीब आया & उसके चेहरे को दाए हाथ मे थामा & बाए हाथ की उंगली उसके दाए चेहरे पे बाई तरफ माथे से लेके बाए गाल से होते हुए ठुड्डी तक फिराई,"..कि हम दोनो ज़ख़्मी दिल 1 दूसरे को मरहम लगा रहे हैं..जब हमारे हमसफ़र हमारे दर्द की परवाह नही कर रहे तो हमे हक़ नही खुद उस दर्द को दूर करने का?!",समीर की आँखो मे चाहत के शोले चमक रहे थे.उसकी उंगली रंभा के लाबो से जा लगी थी & रंभा ने मस्ती मे आँखे बंद कर ली थी,"..जवाब दो,रंभा क्या ठीक नही है?"

"ओह!प्रणव..",रंभा ने उसे बाहो मे खींचा & चूमने लगी,"..लेकिन किसी को पता चल गया तो?",सवाल पुच्छ वो दोबारा उसे बाहो मे बार चूमने लगी.

"मैंहू ना!किसी को कभी कुच्छ पता नही चलेगा!",उसने उसे आगोश मे भरते हुए उसकी गर्दन पे चूमा,"आइ लव यू,रंभा!"

"आइ लव यू टू,प्रणव!",काफ़ी देर तक दोनो 1 दूसरे से लिपटे अपने प्यार का इज़हार अपने हाथो & लबो से करते रहे,"..अब जाओ."

"प्लीज़!",समीर ने बाहो से छिटकी रंभा को रोकना चाहा.

"नही,अभी नही.यहा बहुत ख़तरा है.प्लीज़,प्रणव जाओ!",वो आगे हुई & 1 आख़िरी बार अपने इस नये-नवेले प्रेमी के लब चूमे और उसे जाने को कहा.

"ओके.",प्रणव ने उसके माथे को चूमा & वाहा से चल गया.उसकी पीठ रंभा की तरफ थी & वो उसकी मुस्कान नही देख सकती थी.कल वसीयत पढ़ी जानी थी & उसे पूरा यकीन था कि विजयंत मेहरा ने अपने शेर्स अपने बेटे के नाम छ्चोड़े होंगे लेकिन बेटे की बीवी अब उसके जाल मे थी.उसे कंपनी पे हुकूमत का चस्का लग गया था & वो उस स्वाद को अब थोड़ा महसूस करना चाहता था.

रंभा ने दरवाजा बंद किया & सीढ़ियाँ चढ़ उपर अपने कमरे मे गयी.समीर वैसे ही बेख़बर सो रहा था.रंभा ने अपने कपड़े उतरे & बाथरूम मे घुस गयी.प्रणव की हर्कतो ने उसके जिस्म की आग को और भड़का दिया था.वो बाथरूम के ठंडे फर्श पे लेट गयी & अपने हाथो से अपने जिस्म को समझाने लगी.

"मिस्टर.विजयंत मेहरा के ट्रस्ट ग्रूप के सारे शेर्स उनके बेटे समीर मेहरा को जाते हैं..",सवेरे वसीयत पढ़ते वकील के यही लफ्ज़ अभी रात तक प्रणव के दिमाग़ मे गूँज रहे थे.

"ये लो..",महादेव शाह ने स्कॉच का ग्लास प्रणव की ओर बढ़ाया,"..हमारी पार्ट्नरशिप के नाम,जो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी.",उसने जाम उपर उठाया.प्रणव की आँखें गुस्से & दर्द से लाल थी.उसने ग्लास उठाया & कुच्छ पल शराब को देखता रहा फिर उसे सामने की दीवार पे दे मारा.

"काँच के ग्लास पे गुस्सा उतारने से क्या हासिल होगा बर्खुरदार?",शाह वैसे ही बैठा पी रहा था.

"फ़िक्र मत करिए शाह साहब.हमारी पार्ट्नरशिप ज़रूर होगी."

"लेकिन कैसे?अभी-2 तुम ही ने कहा कि समीर भी बाप के जैसे ही सोच रहा है & उसे भी किसी बाहर के शख्स पे कंपनी मे इनवेस्टमेंट के लिए भरोसा नही!",शाह तल्खी से बोला.

"ये समीर कह रहा है लेकिन अगर समीर की जगह कंपनी का मालिक कोई & हो जाए तो?"

"कोई &..",शाह ने सोचते हुए अपनी ठुड्डी खुज़ाई,"..मसलन?"

"मसलन कोई भी..रीता मेहरा,शिप्रा मेहरा या फिर रंभा मेहरा.",शाह कुच्छ पल उसे देखता रहा & फिर दोनो के ठहाको से शाह का ड्रॉयिंग हॉल गूँज उठा.

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सोनम ने कयि दिनो बाद राहत की सांस ली थी.क्लेवर्त मे हुए हादसे के बाद उसके तो होश ही उड़ गये थे & वो बहुत घबरा गयी थी कि कही पोलीस की तहकीकात से ब्रिज & उसके ताल्लुक का राज़ ना खुल जाए.उसने सबसे पहले उस फोन को,जो उसे ब्रिज ने दिया था & जिसे वो बस उस से बात करने के लिए इस्तेमाल करती थी,उसे तोड़ा & उसके सिम कार्ड को भी तोड़ शहर के बड़े नाले मे डाल आई.ब्रिज ने उसे अभी तक कोई पैसे तो दिए नही थे तो उस बात की चिंता उसे थी नही.

अगले कुच्छ दिन तो उसका फोन बजता तो उसे यही लगता कि पोलीस का होगा लेकिन जैसे-2 दिन बीते उसका डर कम होता गया & सबसे अच्छी बात तो ये हुई कि प्रणव की जगह ग्रूप की कमान अब समीर के हाथो मे थी.उसने इस बीच रंभा से 1 बार मुलाकात की थी लेकिन उसे प्रणव के इरादो के बारे मे बताने की हिम्मत उसे तब भी नही हुई.अब समीर के लौटने के बाद उसने उस बात के बारे मे सोचना छ्चोड़ भी दिया था.

अब तो उसे लगने लगा था कि ब्रिज का मारना 1 तरह से उसके लिए अच्छी ही बात थी.अब उसे किसीसे तरह का कोई डर नही था & उसे 1 सीख भी मिली थी कि आगे से वो अपने फ़ायदे के लिए ऐसे खेल ना खेले जो ख़तरो से भरे होते थे.

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"कल दोपहर 12 बजे मिलना मुझे इस पते पे.",रंभा अपने बंगल की दीवार से सटी थी & प्रणव उसकी कमर सहलाते हुए उसे चूम रहा था.उसने 1 काग़ज़ का टुकड़ा & 1 चाभी अपने कुर्ते की जेब से निकाले & उसकी ब्रा मे अटका दिए.समीर अगले ही दिन पूरे मुल्क मे फैले अपने दफ़्तरो & प्रॉजेक्ट्स के दौरे पे निकल रहा था & दोनो प्रेमियो को मिलने का मौका मिल गया था.

"ठीक है.अब जाओ.",रंभा ने उसे परे धकेला & अपने बंगल के अंदर घुस गयी.

"रंभा!",प्रणव फुसफुसाया.

"कल.",रंभा ने दरवाज़ा बंद करते हुए उसे मुस्कुरा के देखा & फिर उपर अपने कमरे मे चली गयी.समीर बेख़बर सो रहा था,रंभा ने सोचा कि उसे जगाए मगर फिर उसे पिच्छली 2 रातो की कहानी याद आई & उसने अपना इरादा बदल दिया & बिस्तर पे लेट अपने हाथो से अपने जिस्म से खेलने लगी.

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1 अपार्टमेंट बिल्डिंग के 11वे माले के फ्लॅट मे उसे प्रणव ने बुलाया था.रंभा तय वक़्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी थी.प्रणव को दफ़्तर & बीवी से झूठ बोल कर उस से मिलना था लेकिन उसे ऐसी कोई उलझन नही थी.सास & ननद ने उस से रिश्ता ना के बराबर ही रखा था & पति अभी शहर मे था नही.

रंभा ने आसमानी रंग की सारी & ब्लाउस पहना था लेकिन अपने इस नये प्रेमी को रिझाने मे वो कोई कसर नही छ्चोड़ना चाहती थी.उसने फ्लॅट के बेडरूम मे रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे देखते हुए अपना आँचल अपने सीने से गिराया & अपने ब्लाउस को उतार दिया.आसमानी रंग के स्ट्रेप्लेस्स ब्रा मे क़ैद उसकी चूचियाँ शीशे मे चमक उठी.हाथ पीछे ले जाके उसने ब्रा को खोला & उसकी चूचिया खुली हवा मे सांस लेने लगी.

रंभा ने बिस्तर से साथ लाया 1 पॅकेट उठाया & उसमे से चाँदी के रंग का चमकता ब्लाउस निकाला जोकि स्ट्रेप्लेस्स ट्यूब टॉप की शक्ल मे था & उसे पहन लिया.अब उसके गोरे कंधे & सीने के उपर का हिस्सा खुला हुआ था.उसने आँचल को वापस सीने पे डाला & अपने खुले बालो को सामने अपनी बाई चूची के उपर कर लिया.

"ज़्यादा देखोगी तो कही शीशे मे जान ना आ जाए & वो तुम्हे बाहो मे ना भर ले.",रंभा चौंक के मूडी तो देखा प्रणव कमरे की दहलीज पे खड़ा था.कुच्छ शर्म,कुच्छ तारीफ की खुशी से आई मुस्कान उसके होंठो पे खेलने लगी.प्रणव आगे बढ़ा & उसकी गुदाज़ उपरी बाहें थाम उसे अपनी ओर खींचा तो रंभा ने उसे हंसते हुए परे धकेला.

"किस लिए बुलाया है मुझे यहा?",वो शोखी से उसे देख रही थी.

"तुम्हारी इबादत करने के लिए.",प्रणव ने दोबारा वही हरकते दोहराई & रंभा के बाए गाल पे चूम लिया.

"ये इबादत है!",रंभा अपने चेहरे को घुमा उसे अपने सुर्ख लबो से महरूम रखा,"..तुम तो काफिरो जैसी हरकतें कर रहे हो..उउम्म्म्म..!",प्रणव ने उसके लब चूमने मे कामयाबी हासिल कर ही ली थी.

"आशिक़ तो ऐसे ही अपने महबूब को पूजते हैं.",1 पल को होंठ जुदा कर उसने रंभा की काली आँखो मे झाँका & इस बार जब उसके होंठ झुके तो रंभा ने अपने होंठ खोल उसकी ज़ुबान से अपनी ज़ुबान लड़ा दी & अपनी बाहे उसके गले मे डाल दी.

"छ्चोड़ो..",रंभा ने कुच्छ देर बाद किस तोड़ी & उदास सी सूरत बना प्रणव की तरफ पीठ कर ली,"..शुरू मे सब ऐसी ही बाते करते हैं फिर किसी वीरान जंगल मे पड़ी पत्थर मूरत की तरह छ्चोड़ देते हैं जिसकी इबादत तो दूर किसी को उसका ख़याल भी नही रहता.",रंभा प्रणव को ये कतई नही पता चलने देना चाहती थी कि वो चुदाई कि दीवानी 1 गर्मजोशी से भरी लड़की है जोकि अपने फ़ायदे के लिए किसी भी मर्द के साथ सोने से नही झिझकति थी.उसके सामने तो उसे 1 बेबस बीवी की तस्वीर पेश करनी थी जिसका पति उस से बेरूख़् हो गया है.

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क्रमशः.......

JAAL paart--46

gataank se aage......

"lekin sameer to pehle aisa nahi tha.",rambha apni ungliyo se khel rahi thi.

"shipra bhi pehle aisi nahi thi lekin ab dekho..mana ki mom ka ghum bahut zyada hai lekin mujhe to vo bhul hi gayi hai jaise!"

"pareshan hogi vo bhi."

"nahi,humesha se hi aise hota aaya hai.abhi mom ka bahana hai to pehle kabhi uski koi party ya fir saheli..hunh!..main kab tak bardasht karu..aakhir pati hu uska meri bhi us se kuchh umeeden hain..",vo khamosh ho gaya & fir samne dekhte hue bola,"..kuchh zaruraten hai meri bhi.",rambha uski baat ka matlab samajh rahi thi..yani dono ka ghum 1 jaisa hi tha.vo bhi pyasi thi & pranav bhi.usne thoda sa chehra dayi taraf ghumaya..pranav sajila naujawan tha & jism bhi sudol tha..ab vijayant jaisi baat nahi thi lekin ab uske jaisa mard dusra milna shayad namumkin tha..thik usi waqt pranav ne chehra ghumaya & dono ki aankhe lad gayi & usne shayda rambha ki nigaho ko padh bhi liya.rambha ne jhat se chehra ghuma liya & usi pal aasmaan se boonde barsne lagi.

"are..barish aa gayi!",rambha uthke tezi se bungle ki taraf jane lagi & pranav bhi ki uska pair fisla.pranav uske dayi taraf hi tha,usne jhat se bayi banh uski kamar me daal use thama & daye hath me uska daya hath tham use sahara deke bungle ke darwaze tak le aaya.tezi se chalne & pranav ke hatho ke ehsas ne rambha ki dhadkane tez kar di thi.uske haseen chehre & upar-neeche hote cleavage pe barish ke moti chamak rahe the.ab dono barish se bhig nahi rahe the lekin fir bhi pranav ne apne hath uske jism se hataye nahi the & rambha ko dekhe ja raha tha.rambha bebak ladki thi lekin thi to ladki hi & pranav ki nigaho,jinme uske sath ki hasrat saaf jhalak rahi thi,ki tapish se uske gulabi gaal & surkh hone lage the.

"main jaoon..",thartharate labo se vo bas itna hi keh payi thi.

"kyu?",rambha ne bas uski nigaho me apni sawaliya nigaho se dekha.

"mera sath pasand nahi tumhe?",pranva ka hath uski kamar pe aur kas gaya tha & uska chehra rambha ke daye gaal ke & nazdik aa gaya tha.aasman me bijli kadki & uski chamak me rambha ne pranav ke chehre ko dekha.ye vo pal tha jab use faisla lena tha.1 kadam aage badhake bungle ki dehleez ke andar hoti & dono ka rishta shuru hone se pehle hi khatm ho jata & agar vahi khade hue bas apna sar uske seene pe jhuka deti to..to use is parivar me apne sasur ke jane ke baad 1 aur sahara mil jata.sameer ki badli rangat dekh ab use pranav ko apna sathi bana lena thik laga & usne apna sar dayi taraf jhuka uske seene pe rakh diya.

Pranav ne Rambha ke daye hath ko tahme hue hi apne daye hath se uski thuddi upar ki & uske upar jhukne laga.rambha kisanse & tez ho gayi.pranav ki garm sanse vo apne chehre pe mehsus kar rahi thi & uska dil bahut zoro se dhadak raha tha.pranav & jhuka & uske narm labo pe sati pani ki boondo ko apne hotho se haule se saaf kiya.rambha sihar uthi us nazuk chhuan se.pranav ke honth uske labo ko sehla rahe the,uski aankhe band ho gayi thi & vo bas us romani lamhe me khoye ja rahi thi.

pranav ab bahut dhime se uske hotho ko chum raha tha.uske lab uski harkato se kanp rahe the & jab pranav ne kiss ki shiddat badhate hue uske hotho ko apne hotho ki giraft me liya to sile labo se bhi uski aah nikal gayi & vo thoda sa uski tarfa ghum gayi.pranav ne uske daye hath ko chhoda & apne daye hath ko bhi uski kamar me daal use apne agosh me bhar liya.rambha ke hath bhi uske seene se aa lage & jab pranav ke labo ne uske labo ke paar jane ki ijazat mangi to usne sharmate hue apne lab bahut thode se khol diye.

pranav ki zuban us zara si darar se uske munh me ghusi & uski besabra zuban se takrayi & uske baad rambha ki sari jhijhak khatm ho gayi.usne apne is naye premi ke gale me baahen daal di & puri shiddat eks ath uski kiss ka jawab dena lagi.pranav ne uski kamar ko kaste hue use khud se aise chipka liya ki uski chhatiyan pranav ke seene se pis gayi & uska lund uske pet pe dab gaya.rambha un ehsaso se & mast ho gayi & pranav ke baalo ko khinchte hue uski zuban ko chusne lagi.

pranav ne use peechhe dhakel ke bungle darwaze ki bgaal ki deewar se laga diya & apne jism ko uske jism pe dabate hue bahut zor se chumne laga.uske hath rambha ki kamar & pith ko apni betabi se jala rahe the.pranav ka daya hath neeche gaya & usne rambha ki jangh pakad ke upar uthayi & thik usi waqt zor se bijli kadki.

"nahi!",rambha us aavz & roshni se jaise hosh me aayi & pranav ko pare dhakel diya.deewar se lagi vo bahut zor se sanse le rahi thi,"..ye thik nahi!"

"kya thik nahi?",pranav uske karib aaya & uske chehre ko daye hath me thama & baye hath ki ungli uske daye chehre pe bayi taraf mathe se leke baye gaal se hote hue thuddi tak firayi,"..ki hum dono zakhmi dil 1 dusre ko marham laga rahe hain..jab humare humsafar huamre dard ki parvah nahi kar rahe to hume haq nahi khud us dard ko door karne ka?!",sameer ki aankho me chahat ke shole chamak rahe the.uski ungli rambha ke labo se ja lagi thi & rambha ne amsti me aankhe band kar li thi,"..jawab do,rambha kya thik nahi hai?"

"oh!pranav..",rambha ne use baaho me khincha & chumne lagi,"..lekin kisi ko pata chal gaya to?",sawal puchh vo dobara use baaho me bar chumne lagi.

"mainhu na!kisi ko kabhi kuchh pata nahi chalega!",usne sue agosh me bharte hue uski gardan pe chuma,"i love you,rambha!"

"i love you too,pranav!",kafi der tak dono 1 dusre s elipte apne pyar ka izhar apne hatho & labo se karte rahe,"..ab jao."

"please!",sameer ne baaho se chhitakti rambha ko rokna chaha.

"nahi,abhi nahi.yaha bahut khatra hai.please,pranav jao!",vo aage hui & 1 aakhiri baar apne is naye-navele premi ke lab chume & use jane ko kaha.

"ok.",pranav ne uske mathe ko chuma & vaha se chal gaya.uski pith rambha ki taraf thi & vo uski muskan nahi dekh sakti thi.kal vasiyat padhi jani thi & use pura yakin tha ki Vijayant Mehra ne apne shares apne bete ke naam chhode honge lekin bete ki biwi ab uske jaal me thi.use company pe hukumat ka chaska lag gaya tha & vo us swad ko ab taumra mehsus karna chahta tha.

rambha ned arwaza band kiya & seedhiyan chadh upar apne kamre me gayi.sameer vaise hi bekhabar so raha tha.rambha ne apne kapde utare & bathroom me ghus gayi.pranav ki harkaot ne uske jism ki aag ko aur bhdka diya tha.vo bathroom ke thande farsh pe let gayi & apne hatho se apne jism ko samjhane lagi.

"Mr.Vijayant Mehra ke Trust Group ke sare shares unke bete Sameer Mehra ko jate hain..",savere vasiyat padhte vakil ke yehi lafz abhi raat tak Pranav ke dimagh me goonj rahe the.

"ye lo..",Mahadev Shah ne scotch ka glass pranav ki or badhaya,"..humari partnership ke naam,jo shuru hone se pehle hi khatm ho gayi.",usne jaam upar uthaya.pranav ki aankhen gusse & dard se laal thi.usne glass uthaya & kuchh pal sharab ko dekhta raha fir use samne ki deewar pe de mara.

"kanch ke glass pe gussa utarne se kya hasil hoga barkhurdar?",shah vaise hi baitha pi raha tha.

"fikr mat kariye shah sahab.humari partnership zarur hogi."

"lekin kaise?abhi-2 tum hi ne kaha ki sameer bhi baap ke jaise hi soch raha hai & use bhi kisi bahar ke shakhs pe company me investment ke liye bharosa nahi!",shah talkhi se bola.

"ye sameer keh raha hai lekin agar sameer ki jagah company ka malik koi & ho jaye to?"

"koi &..",shah ne sochte hue apni thuddi khujai,"..maslan?"

"maslan koi bhi..Rita Mehra,Shipra Mehra ya fir Rambha Mehra.",shah kuchh pal use dekhta raha & fir dono ke thahako se shah ka drawing hall goonj utha.

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Sonam ne kayi dino baad rahat ki sans li thi.Clayworth me hue hadse ke baad uske to hosh hi ud gaye the & vo bahut ghabra gayi thi ki kahi police ki tehkikat se Brij & uske talluk ka raaz na khul jaye.usne sabse pehle us fone ko,jo use brij ne diya tha & jise vo bas us se baat karne ke liye istemal karti thi,use toda & uske sim card ko bhi tod shehar ke bade nale me daal aayi.brij ne use abhi tak koi paise to diye nahi the to us baat ki chinta use thi nahi.

agle kuchh din to uska fone bajta to use yehi lagta ki police ka hoga lekin jaise-2 din beete uska darr kam hota gaya & sabse achhi baat to ye hui ki pranav ki jagah group ki kaman ab sameer ke hatho me thi.usne is beech rambha se 1 baar mulakat ki thi lekin use pranav ke irado ke barre me batane ki himmat use tab bhi nahi hui.ab sameer ke lautne ke baad usne us baat ke bare me sochna chhod bhi diya tha.

ab to use lagne laga tha ki brij ka marna 1 tarah se uske liye achhi hi baat thi.ab use kisis tarah ka koi darr nahi tha & use 1 seekh bhi mili thi ki aage se vo apne fayde ke liye aise khel na khele jo khatro se bhare hote the.

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"kal dopahar 12 baje milna mujhe is pate pe.",rambha apne bungle ki deewar se sati thi & pranav uski kamar sehlate hue use chum raha tha.usne 1 kagaz ka tukda & 1 chabhi apne kurte ki jeb se nikale & uski bra me atka diye.sameer agle hi din pure mulk me phaile apne daftaro & projects ke daure pe nikal raha tha & dono premiyo ko milne ka mauka mil gaya tha.

"thik hai.ab jao.",rambha ne use pare dhakela & apne bungle ke andar ghus gayi.

"rambha!",pranav phusphusaya.

"kal.",rambha ne darwaza band karte hue use muskura ke dekha & fir upar apne kamre me chali gayi.sameer bekhabar so raha tha,rambha ne socha ki use jagaye magar fir use pichhli 2 raato ki kahani yaad aayi & usne apna irada badal diya & bistar pe let apne hatho se apne jsim se khelne lagi.

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1 apartment building ke 11ve male ke flat me use pranav ne bulaya tha.rambha tay waqt se thoda pehle hi pahuncha gayi thi.pranav ko daftar & biwi se jhuth bol kar us se milna tha lekin use aisi koi uljhan nahi thi.saas & nanad ne us se rishta na ke barabar hi rakha tha & pati abhi shehar me tha nahi.

rambha ne aasmani rang ki sari & blouse pehna tha lekin apne is naye premi ko rijhane me vo koi kasar nahi chhodna chahti thi.usne flat ke bedroom me rakhe dressing table ke shishe me dekhte hue apna aanchal apne seene se giraya & apne blouse ko utar diya.aasmani rang ke strapless bra me qaid uski chhatiya shishe me chamak uthi.hath peechhe le jake usne bra ko khola & uski chhatiyan khuli hawa me sans lene lagi.

rambha ne bistar se sath laya 1 packet uthaya & usme se chandi ke rang ka chamakta blouse nikala joki strapless tube top ki shakl me tha & use pehan liya.ab uske gore kandhe & seene ke upar ka hissa khula hua tha.usne aanchal ko vapas seene pe dala & apne khule baalo ko samne apni bayi chhati ke upar kar liya.

"zyada dekhogi to kahi shishe me jaan na aa jaye & vo tumhe baaho me na bhar le.",rambha chaunk ke mudi to dekha pranav kamre ki dheleez pe khada tha.kuchh sharm,kuchh tareef ki khushi se aayi muskan uske hotho pe khelne lagi.pranav aage badha & uski gudaz upri baahen tham use apni or khincha to rambha ne use hanste hue pare dhakela.

"kis liye bulaya hai mujhe yaha?",vo shokhi se use dekh rahi thi.

"tumhari ibadat karne ke liye.",pranav ne dobara vahi harkate dohrayi & rambha ke baye gaal pe chum liya.

"ye ibadat hai!",rambha apne chehre ko ghuma use apne surkh labo se mehrum rakha,"..tum to kafiro jaisi harkaten kar rahe ho..uummmm..!",pranav ne uske lab chumne me kamyabi hasil kar hi li thi.

"aashiq tyo aise hi apne mehboob ko pujte hain.",1 pal ko honth juda kar usne rambha ki kali aankho me jhanka & is baar jab uske honth jhuke to rambha ne apne honth khol uski zuban se apnmi zuban lada di & apni baahe uske gale me daal di.

"chhodo..",rambha ne kuchh der baad kiss todi & udas si surat bana pranav ki taraf pith kar li,"..shuru me sab aisi hi baatne karte hain fir kisi veeran jungle me padi patthar murat ki tarah chhod dete hain jiski ibadat to door kisi ko uska khayal bhi nahi rehta.",rambha pranav ko ye katai nahi pata chalne dena chahti thi ki vo chudai ki deewani 1 garmjoshi se bhari ladki hai joki apne fayde ke liye kisi bhi mard ke sath sone se nahi jhijhakti thi.uske samne to use 1 bebas biwi ki tasveer pesh karni thi jiska pati us se berukh ho gaya hai.

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kramashah.......


raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 09:19

जाल पार्ट--47

गतान्क से आगे......

"ये पुजारी अपनी इस हुस्न & इश्क़ की देवी की मरते दम तक पूजा करेगा & जिस दिन अपने इस वादे को तोड़े वो उसका इस धरती पे आख़िरी दिन होगा.",पीछे से आ उसके बाए कंधे पे बाया हाथ रख & दाए से उसके चेहरे को अपनी ओर घुमा के प्रणव ने उसकी आँखो मे झाँका तो रंभा तेज़ी से घूमी & उसकी कमर मे बाहे डाल,उसके गले से लग गयी.दोनो के हाथ 1 दूसरे की पीठ पे घूम रहे थे.प्रणव का लंड तो रंभा की नंगी कमर की चिकनाई महसूस करते ही खड़ा हो गया था.दोनो का कद लगभग बराबर था & उसका लंड सीधा रंभा की चूत पे दबा था.

रंभा की चूत भी लंड को महसूस करते ही कसमसाने लगी थी.प्रणव ने अपना सर रंभा के बाए कंधे से उठाया तो उसने भी चेहरा उसके सामने कर दिया & दोनो 1 बार फिर पूरी शिद्दत के साथ 1 दूसरे को चूमने लगे.प्रणव के हाथ उसकी कमर से लेके कंधो तक घूम रहे थे & रंभा अब मस्त हो रही थी.वो भी प्रणव के जिस्म की बगलो पे अपने हाथ हसरत से फिरा रही थी.

दोनो काफ़ी देर तक 1 दूसरे की ज़ुबानो को चूस्ते हुए उनसे खेलते रहे.प्रणव का जोश और बढ़ा तो उसने रंभा की गंद हल्के से दबा दी तो वो चिहुनक उठी & उसे बनावटी गुस्से से देखते हुए किस तोड़ दी.प्रणव की नज़रो मे अब वासना के लाल डोरे तैरने लगे थे.उसने डाए हाथ से रंभा के बाए कंधे से उसका पल्लू सरका दिया.रंभा ने उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन तब तक पल्लू फर्श को चूम रहा था.उसने बनावटी हया से अपना चेहरा बाई तरफ घुमा लिया.

मस्ती से उसकी साँसे तेज़ हो गयी थी & तेज़ साँसे उसके सीने मे जो हुलचूल मचा रही थी,उसे देख प्रणव का हलक सूख गया & उसने थूक गटकते हुए अपने होंठो पे ज़ुबान फिराई.ऐसी हसीन-ओ-दिलकश लड़की आजतक उसने नही देखी थी.उसने दाए हाथ को उसके कंधे से सरकते हुए उसके बाए गाल पे किया & उसका चेहरा फिर से अपनी ओर घुमाया तो रंभा ने आँखे बंद कर ली.मस्ती से तमतमाए गाल & बंद आँखे हया की तस्वीर पेश कर रहे थे & प्रणव के जोश को & बढ़ा रहे थे.

प्रणव ने अपना हाथ उसके बाए गाल से सटा दिया तो रंभा आँखे बंद किए हुए ही,उस तरफ चेहरे को थोड़ा झुका के उसके हाथ पे अपने गाल को हौले-2 रगड़ने लगी.प्रणव की निगाहें उसके चेहरे से लेके उसके सीने & पेट से नीचे उसके पाँवो तक गयी & फिर उपर आई.वो आगे बढ़ा & अपने होंठ रंभा की गर्दन पे दाई तरफ लगा दिए.उसके होंठ उसके ब्लाउस के उपर के नुमाया हिस्से पे घूमने लगे.

रंभा ने उसके अपने गाल पे रखे हाथ कि हथेली से अपने होंठ सटा दिए & चूमने लगी.प्रणव का बाया हाथ उसकी कमर से आ लगा & उसे सहलाने लगा.रंभा अब हल्की-2 आहे भर रही थी.प्रणव ने उसकी कमर को बाई बाँह मे कसते हुए उसके चेहरे को थामा & उसकी गर्दन चूमते हुए उसे घुमा के बिस्तर पे गिरा दिया.

रंभा की टाँगे लटकी थी & उसके उपर चढ़ा प्रणव उसके चेहरे को चूमे जा रहा था.कुच्छ देर बाद वो उठा & उसने उसकी टाँगे पकड़ के बिस्तर के उपर कर दी.ऐसा करने से रंभा की सारी थोड़ा उठ गयी & उसकी गोरी टाँगे दिखने लगी.प्रणव ने उन्हे देखा तो उन्हे पकड़ के उसके पैर चूमने लगा.रंभा बिस्तर पे घूम के पेट के बल लेट गयी & तकिये को पकड़ के प्रणव के होंठो का लुत्फ़ उठाने लगी.

प्रणव के हाथ उसकी सारी को घुटने तक करने के बाद उसकी टाँगो को सहला रहे थे & उसके होंठ उसके हाथो के बताए रास्ते पे घूम रहे थे.रंभा ने खुशी & मस्ती से मुस्कुराते हुए तकिये मे मुँह च्छूपा लिया क्यूकी प्रणव का हाथ उसकी सारी मे & उपर घुस उसकी जाँघो के पिच्छले मांसल हिस्से को दबा रहा था.कुच्छ पल बाद उसकी सारी उसकी कमर तक थी & उसकी आसमानी रंग की पॅंटी नुमाया हो गयी जिसके बीचोबीच 1 गीला धब्बा उसकी चूत की कसक की दास्तान कहता दिख रहा था.

"उउन्न्ह..आन्न्न्नह..!",प्रणव उसकी जाँघो को चूम & चूस रहा था & रंभा की आहें धीरे-2 तेज़ हो रही थी.उसकी जाँघो को चूमते हुए प्रणव उसकी कमर पे आया & उसे भी अपने होंठो से तपाने के बाद उसकी पीठ से होता उसके चेहरे तक पहुँच गया.रंभा के रसीले लबो से उसका जी भर ही नही रहा था.उसने उसके दाए कंधे को पकड़ थोड़ा घुमाया & उसके होंठ चूमने लगा तो रंभा ने भी दाए हाथ को पीछे ले जाके उसके बालो को पकड़ लिया & अपने होंठो से जवाब देने लगी.

प्रणव का दाया हाथ उसके पेट पे चला गया था & उसे सहला रहा था.उसकी उंगलिया उसकी गहरी नाभि की गहराई से बाहर आना ही नही चाह रही थी.उसके होंठ 1 बार फिर से रंभा की गोरी गर्दन पे घूम रहे थे.चूत की कसक & बढ़ी तो रंभा ने गंद पीछे कर अपने प्रेमी के लंड से उसे सटा दिया.प्रणव समझ गया कि उसकी महबूबा अब पूरी तरह से मस्त हो चुकी है.उसने फ़ौरन उसके कंधे पकड़ उसे सीधा किया & उसके हाथो को अपनी कमीज़ पे रख दिया.उसका इशारा समझ रंभा ने उसके बटन्स खोले & उसकी कमीज़ उतार दी.

प्रणव के बालो भरे सीने को देख उसका दिल खुशी से झूम उठा & उसने अपने हसरत भरे बेसब्र हाथ उन बालो मे फिराए & फिर अपनी इस थोड़ी बेबाक हरकत पे शरमाने का नाटक करते हुए हाथ पीछे खींच अपने चेहरे को उनमे च्छूपा लिया.प्रणव उसकी इस अदा पे और खुशी & जीश से भर गया & उसने उसके पेट पे उंगली फिरानी शुरू कर दी.

"ऊन्नह..नही करो..गुदगुदी होती है..!",हाथो के पीछे से ही रंभा बोली तो प्रणव ने हंसते हुए उँघली को उसकी सारी मे घुसा उसे कमर से खींच दिया,"..नही..!",हाथ चेहरे से हटा उसपे फैली मस्ती अपने प्रेमी को दिखाते हुए रंभा ने उसका हाथ पकड़ लिया लेकिन प्रणव ने उसकी अनसुनी करते हुए उसकी सारी खोल दी & फिर पेटिकोट भी.उसने अपनी दाई बाँह रंभा की जाँघो के नीचे लगा के उन्हे उपर उठाया & फिर अपने गर्म होंठ उनसे चिपका दिए.जोश से कसमसाती रंभा कभी उसके बॉल खींच तो कभी उसके हाथो को पकड़ उसे अपने जिस्म से अलग करने की कोशिस कर रही थी लेकिन प्रणव वैसे ही उसकी जाँघो से चिपका हुआ था.

"ओईईईईई..माआाआअन्न्‍नणणन्..!",रंभा का जिस्म झटके खाने लगा & वो मस्ती मे सर दाए-बाए हिलाने लगी.प्रणव ने पॅंटी के उपर से ही उसकी चूत को चूमना शुरू कर दिया था & वो उसकी इस हरकत को बर्दाश्त नही कर पाई थी & झाड़ गयी थी.प्रणव ने फ़ौरन उसकी पॅंटी नीचे खींची & उसकी चूत से बहते रस को पीने लगा.रंभा उसके बाल नोचती वैसे ही कांपति पड़ी थी.

जब प्रणव ने अपना चेहरा उसकी चूत से उठाया तो वो करवट ले फिर से तकिये मे मुँह च्छूपाते हुए पेट के बल हो गयी.प्रणव की हालत जोश से और बुरी हो गई क्यूकी अब उसकी आँखो के सामने रंभा की पुष्ट,क़ातिल गंद थी.उसने उसकी फांको को बड़े हौल्के से च्छुआ.रंभा के जिस्म मे थरथराहट सी हुई & वो फिर से घूमने की कोशिश करने लगी मगर तब तक उसका प्रेमी उसके पिच्छले उभारो पे झुक,उनके बीच की डरा मे अपनी नाक घुसा के अपना चेहरा वाहा दफ़्न करने की कोशिश कर रहा था.

रंभा ने तकिये को खीच अपने सीने के नीचे किया & अपनी चूचियाँ उसपे दबाते हुए सर उठाके ज़ोर-2 से आहें लेने लगी.प्रणव ने उसकी फांको को भींचा & उन्हे काटने लगा.रंभा दर्द & मस्ती के मिले-जुले एहसास से मुस्कुरा उठी & उसकी आहें & तेज़ हो गयी.

"नाआआअ..हाईईईईईईईईईईईईईईई..!",प्रणव की ज़ुबान उसके गंद के छेद को छेड़ने लगी थी & रंभा की हालत बुरी हो गयी थी.उसने दाया हाथ पीछे ले जाते हुए प्रणव के बॉल पकड़ उसके सर को उपर खींचा & करवट ले सीधी हो गयी.प्रणव ने वासना भरी मुस्कान उसकी तरफ फेंकी & बिस्तर पे खड़े हो पॅंट उतार नंगा हो गया.उसके 8.5 इंच के लंड को देख रंभा का दिल खुशी से नाच उठा लेकिन उसने मस्ती से बोझल पॅल्को को बंद कर उसे अपने शर्म मे डूबे होने का एहसास कराया.

नंगा प्रणव उसके दाई तरफ लेटा & उसे बाई करवट पे अपनी तरफ घुमा उसकी कमर सहलाते हुए चूमने लगा.उसका लंड भी उसकी चूत को चूम रहा था.रांभे ने अब अपने को पूरी तरह से अपने आशिक़ के हाथो मे सौंप दिया था.उसके सीने के बालो मे हाथ फिराते हुए उसने भी उसे बाहो मे भर लिया था.प्रणव ने उसके बाए कंधे के उपर से देखते हुए उसके ब्लाउस को खोला & जैसे ही उसकी चूचियाँ नुमाया हुई वो उनपे टूट पड़ा.उन मस्त गोलाईयों को अपने मुँह मे भर के वो उन्हे चूसने लगा.हाथो मे उन्हे भर वो उन्हे ज़ोर से दबाता & जब रंभा आहे भरते हुए जिस्म को उपर मोडती तो वो उसके निपल्स को चूसने लगता. छातियों को चाटते हुए जब उसने उसके निपल्स को उंगलियो मे मसला तो रंभा ज़ोर से चीखते हुए दोबारा झाड़ गयी.

अब वक़्त आ गया था दोनो जिस्मो के 1 होने का & उनके रिश्ते को जिस्मानी बंधन मे बाँधने का.प्रणव ने उसकी टाँगे फैलाई & उनके बीच घुटने पे बैठके अपना लंड अंदर घुसाया,"ऊव्ववव..दर्द हो रहा है..थोड़ा धीरे करो ना..आन्न्न्नह..!",सच्चाई तो ये थी कि विजयंत के बाद उसे अब कोई भी लंड दर्द पहुचने वाला नही लगता था लेकिन ऐसी हरकत कर वो प्रणव के मर्दाना अहम को सहला उसे और जोश मे भर देना चाहती थी.

"बस हो गया,मेरी जान..आहह..!",चूत की कसावट ने तो प्रणव को हैरत मे डाल दिया.ऐसा लग रहा था मानो वो कोई कुँवारी चूत चोद के उसका कुँवारापन लूट रहा हो.मस्ती मे भर उसने ज़ोर का धक्का लगाया.

"हाईईईईईईईई..रामम्म्मममममममम..कितने ज़ल्म हो..ऊन्न्‍न्णनह..!",प्रणव उसके उपर लेट आ गया था & उसके चेहरे को चूमते हुए उसे चोद रहा था.कुच्छ देर बाद रंभा के हाथ भी उसकी पीठ पे फिरने लगे & जब उसने उसकी गंद को दबाया तो उसके धक्के & तेज़ हो गये. दोनो अब 1 दूसरे को पूरी शिद्दत से चूमते हुए चुदाई कर रहे थे.रंभा कयि दिनो बाद ऐसे मस्त तरीके से चुद रही थी.विजयंत के जाने के बाद ये पहला मौका था जब कोई मर्द उसे इस तरह से मस्ती के आसमान मे उड़ा रहा था.प्रणव के पास विजयंत जैसा लंड नही था ना ही वैसी मर्दाना खूबसूरती लेकिन था वो चुदाई मे माहिर.

पहले तो उसने बहुत गहरे धक्के लगाए जिनमे वो लंड को सूपदे तक खींच फिर जड तक अंदर धकेल्ता & उसके बाद जब रंभा झड़ने लगी तो उसने चुदाई की रफ़्तार अचानक बहुत बढ़ा दी जिसमे लंड बस आधा ही बाहर आता था लेकिन चूत की दीवारो पे उसकी तेज़ रगड़ रंभा के जोश को & बढ़ा देती थी.

रंभा ने प्रणव की पीठ को अपने नखुनो से छल्नी कर दिया था लेकिन वो था कि झड़ने का नाम ही नही ले रहा था.प्रणव के लिए ये बहुत मुश्किल काम था.रंभा की कसी चूत झाड़ते वक़्त जब उसके लंड के गिर्द सिकुड़ने-फैलने लगती तो वो अपना काबू लगभग खो ही देता लेकिन वो इस पहली चुदाई मे ही अपनी इस नयी-नवेली महबूबा पे अपनी मर्दानगी की मज़बूत छाप छ्चोड़ना चाहता था.

"हाईईईईईईईई..राम............प्रणव......ज़ाआआअन्न्‍ननननणणन्..ऐसे कभी नही चुदी मैं........ऊहह..आन्न्‍नणणनह..चोदो मुझे.....हाआाआअन्न्‍ननणणन्..!",1 ज़ोर की चीख मारते हुए,उसके कंधो मे नाख़ून धँसाते हुएँ उसकी कमर पे टाँगे फँसा उचकते हुए वो जिस्म को कमान की तरह मोडते झाड़ गयी.उसके चेहरे को देख लगता था जैसे वो बहुत दर्द मे हो जबकि हक़ीक़त ये थी कि वो झड़ने की खुशी को पूरी शिद्दत से महसूस का रही थी.

फिर उसके चेहरे पे हल्की सी मुस्कान खेलने लगी-उसकी चूत मे उसके नये प्रेमी का लंड गर्म वीर्य छ्चोड़ रहा था & वो आहे भरता उसका उसके उपर लेट रहा था.रंभा ने उसे बाहो मे भरा & अपने बाए कंधे के उपर अपना चेहरा रखे प्रणव के सर को चूम लिया.

“मेरी मोहब्बत कबूल कर के तुमने मुझपे कितना बड़ा एहसान किया है,ये तुम्हे पता नही,रंभा.”,चुदाई के बाद प्रणव रंभा के दाई तरफ लेटा दाए हाथ से उसके बाए गाल को सहला रहा था.रंभा भी उसके सीने पे अपनी उंगलिया धीमे-2 घुमा रही थी.

“एहसान तो तुमने मुझपे किया है,प्रणव.सोचती हू तो सिहर जाती हू कि अगर तुम ना मिलते तो क्या करती..मैं तो पागल ही हो जाती!”,अजीब बात थी.दोनो ही 1 दूसरे को अपनी मोहब्बत के सच्ची होने का यकीन दिलाने के लिए झूठ बोल रहे थे.जहा प्रणव रंभा को अपने कंपनी के मालिक बनाने के मक़सद को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता था वही रंभा उसे अपनी जिस्मानी ज़रूरतो को पूरा करने का ज़रिया बना के मेहरा परिवार मे अपने 1 साथी के तौर पे इस्तेमाल करना चाहती थी.

प्रणव झुका & उसके होंठ चूमे तो रंभा ने भी उसके होंठो पे अपनी जीभ फिरा दी.प्रणव ने उसके बाए हाथ को थाम उसे अपने सिकुदे लंड पे दबाया तो रंभा ने फिर से शरमाने का नाटक करते हुए हाथ पीछे खींचा & अपना चेहरा थोड़ा आगे हो उसके सीने मे छुपा लिया.प्रणव मुस्कुराया & उसके जिस्म की बगल मे हाथ फेर दोबारा उसका हाथ थाम उसे अपने लंड पे दबाया.इस बार रंभा ने उसका लंड थाम लिया & उसे मसलने लगी.प्रणव जोश मे भर उसके बालो & गर्दन को चूमते हुए उसके जिस्म पे हाथ फेरने लगा.रंभा के हाथ उसके लंड को हिलाते हुए फिर से जगाने लगे.

“तुमने अपनी ज़िंदगी के बारे मे क्या सोचा है,रंभा?”,प्रणव ने लंड उसके हाथ से खींचा & उसे लिटा के अपने घुटनो पे हो लंड को उसके होंठो से सताया.रंभा ने उसके लंड को पकड़ के हिलाया लेकिन जब प्रणव ने लंड को उसके होंठो पे सताए तो उसने शर्मा के मुँह फेर लिया.प्रणव ने उसके चेहरे को अपनी ओर घुमाया & 1 बार फिर लंड को उसके होंठो पे रगड़ा.रंभा ने थोड़ी ना-नुकर की लेकिन फिर अपने गुलाबी होंठो मे उसके लंड को क़ैद कर लिया.उसके ज़हन मे विजयंत मेहरा के तगड़े लंड की तस्वीर कौंधा गयी & उसके दिल मे 1 हुक सी उठी.उसका ससुर लौटने वाला नही था & अब शायद ज़िंदगी भर ये कसक उसका पीछा नही छ्चोड़ने वाली थी.उसके जिस्म मे विजयंत के बदन & उसके प्यार करने के अंदाज़ की याद ने आग लगा दी & उसके होंठ प्रणव के लंड पे & कस गये.

“मैं समझी नही.”,उसने लंड मुँह से निकाला & उठ बैठी.प्रणव अपने घुटनो पे खड़ा हो गया तो वो उसकी झांतो मे & निचले पेट पे अपने चेहरे को रगड़ते हुए अपनी मस्ती का इज़हार करने लगी.

“मेरा मतलब है कि क्या तुम यूही बस अपनी उलझन का रोना रोती रहोगी या कुच्छ करोगी भी?..आहह..!”,रंभा ने उसके 1 अंडे को मुँह मे भर ज़ोर से चूसा.

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क्रमशः.......

JAAL paart--47

gataank se aage......

"ye pujari apni is husn & ishq ki devi ki marte dum tak puja karega & jis din apne is vade ko tode vo uska is dharti pe aakhiri din hoga.",peechhe se aa uske baye kandhe pe baya hath rakh & daye se uske chehre ko apni or ghuma ke pranav ne uski aankho me jhanka to rambha tezi se ghumi & uski kamar me baahe daal,uske gale se lag gayi.dono ke hath 1 dusre ki pith pe ghum rahe the.pranav ka lund to rambha ki nangi kamar ki chiknai mehsus karte hi khada ho gaya tha.dono ka kad lagbhag barabar tha & uska lund seedha rambha ki chut pe daba tha.

rambha ki chut bhi lund ko mehsus karte hi kasmasane lagi thi.pranav ne apna sar rambah ke baye kandhe se uthaya to usne bhi chehra uske samne kar diya & dono 1 baar fir puri shiddat ke sath 1 dusre ko chumne lage.pranav ke hath uski kamar se leke kandho tak ghum rahe the & rambha ab mast ho rahi thi.vo bhi pranav ke jism ki baglo pe apne hath hasrat se fira rahi thi.

dono kafi der tak 1 dusre ki zubano ko chuste hue unse khelte rahe.pranav ka josh aur badha to usne rambha ki gand halke se daba di to vo chihunk uthi & use banawati gusse se dekhte hue kiss tod di.pranav ki nazro me ab vasna ke laal dore tairne lage the.usne daye hath se rambha ke baye kandhe se uska pallu sarka diya.rambha ne use pakadne ki koshish ki lekin tab tak pallu farsh ko chum raha tha.usne banawati haya se apna chehra bayi taraf ghuma liya.

masti se uski sanse tez ho gayi thi & tez sanse uske seene me jo hulchul macha rahi thi,use dekh pranav ka halak sukh gaya & usne thuk gatakte hue apne hotho pe zuban firayi.aisi haseen-o-dilkash ladki aajtak usne nahi dekhi thi.usne daye hath ko uske kandhe se sarkate hue uske baye gaal pe kiya & uska chehra fir se apni or ghumaya to rambha ne aankhe band ka li.masti se tamtamaye gaal & band aankhe haya ki tasvir pesh kar rahe the & pranav ke josh ko & badha rahe the.

pranav ne apna hath uske baye gaal se sata diya to rambha aankhe band kiye hue hi,us taraf chehre ko thoda jhuka ke uske hath pe apne gaal ko haule-2 ragadne lagi.pranav ki nigahen uske chehre se leke uske seene & pet se neeche uske panvo tak gayi & fir upar aayi.vo aage badha & apne honth rambha ki gardan pe dayi taraf laga diye.uske honth uske blouse ke upar ke numaya hisse pe ghumne lage.

rambha ne uske apne gaal pe rakhe hath ki hatheli se apne honth sata diye & chumne lagi.pranav ka baya hath uski kamar se aa laga & use sehlane laga.rambha ab halki-2 aahe bhar rahi thi.pranav ne uski kamar ko bayi banh me kaste hue uske chehre ko thama & uski gardan chumte hue use ghuma ke bistar pe gira diya.

rambha ki tange latki thi & uske upar chadha pranav uske chehre ko chume ja raha tha.kuchh der baad vo utha & usne uski tange pakad ke bistar ke upar kar di.aisa karne se rambha ki sari thoda uth gayi & uski gori tange dikhne lagi.pranav ne unhe dekha to unhe pakad ke uske pair chumne laga.rambha bistar pe ghum ke pet ke bal let gayi & takiye ko pakad ke pranav ke hotho ka lutf uthane lagi.

pranav ke hath uski sari ko ghutne tak karne ke baad uski tango ko sehla rahe the & uske honth uske hatho ke bataye raste pe ghum rahe the.rambha ne khushi & masti se muskurate hue takiye me munh chhupa liya kyuki pranav ka hath uski sari me & upar ghus uski jangho ke pichhle mansal hisse ko daba raha tha.kuchh pal baad uski sari uski kamar tak thi & uski aasmani rang ki panty numaya ho gayi jiske beechobeech 1 gila dhabba uski chut ki kasak ki dastan kehta dikh raha tha.

"uunnhhhh..aannnnhhhhh..!",pranav uski jangho ko chum & chus raha tha & rambha ki aahen dhire-2 tez ho rahi thi.uski jangho ko chumte hue pranav uski kamar pe aaya & use bhi apne hothos e tapane ke baad uski pith se hota uske chehre tak pahunch gaya.rambha ke rasile labo se uska ji bhar hi nahi raha tha.usne uske daye kandhe ko pakad thoda ghumaya & uske honth chumne laga to rambha ne bhi daye hath ko peechhe le jake uske baalo ko pakad liya & apne hotho se jawab dene lagi.

pranav ka daya hath uske pet pe chala gaya tha & use sehla raha tha.uski ungliya uski gehri nabhi ki gehrayi se bahar aana hi nahi chah rahi thi.uske honth 1 baar fir se rambha ki gori gardan pe ghum rahe the.chut ki kasak & badhi to rambha ne gand peechhe kar apne premi ke lund se use sata diya.pranav samajh gaya ki uski mehbooba ab puri tarah se mast ho chuki hai.usne fauran uske kandhe pakad use seedha kiya & uske hatho ko apni kamiz pe rakh diya.uska ishara samajh rambha ne uske buttons khole & uski kamzi utar di.

pranav ke balo bhare seene ko dekh uska dil khushi se jhum utha & usne apne hasrat bhare besabr hath un balo me firaye & fir apni is thodi bebak harkat pe sharmane ka natak karte hue hath peechhe khinch apne chehre ko unme chhupa liya.pranav uski is ada pe aur khushi & jish se bhar gaya & usne uske pet pe ungli firani shuru kar di.

"oonnhhhh..nahi karo..gudgudi hoti hai..!",hatho ke peechhe se hi rambha boli to pranav ne hanste hue unghli ko uski sari me ghusa use kamar se khinch diya,"..nahi..!",hath chhere se hata uspe faili masti apne premi ko dikhate hue rambha ne uska hath pakad liya lekin pranav ne suki ansuni karte hue uski sari khol di & fir petticoat bhi.usne apni dayi banh rambha ki jangho ke neeche laga ke unhe upar uthaya & fir apne garm honth unse chipka diya.josh se kasmasati rambha kabhi uske baal khinch to kabhi uske hatho ko pakad use apne jism se alag karne ki koshsih kar rahi thi lekin pranav vaise hi uski jangho se chipka hua tha.

"ouiiiiiiii..maaaaaaaaannnnnn..!",rambha ka jism jhatke khane laga & vo masti me sar daye-baye hilane lagi.pranav ne panty ke upar se hi uski chut ko chumna shuru kar diya tha & vo uski is harkat ko bardasht nahi kar payi thi & jhad gayi thi.pranav ne fauran uski panty neeche khinchi & uski chut se behte ras ko pine laga.rambha uske baal nochti vaise hi kanpti padi thi.

jab pranav ne apna chehra uski chut se uthaya to vo karwat le fir se takiye me munh chhupate hue pet ke bal ho gayi.pranav ki halat josh se & buri ho gauyi kyuki ab uski aankho ke samne rambha ki pusht,qatil gand thi.usne uski fanko ko bade haulke se chhua.rambha ke jism me thartharahat si hui & vo fir se ghumne ki koshish karne lagi magar tab tak uska premi uske pichhle ubharo pe jhuk,unke beech ki dara me apni naak ghusa ke apna chehra vaha dafn karne ki koshish kar raha tha.

rambha ne takiye ko khicnh apne seene ke neeche kiya & apni chhatiya uspe dabate hue sar uthake zor-2 se aahen lene lagi.pranav ne uski fanko ko bhincha & unhe katne laga.rambha dard & masti ke mile-jule ehsas se muskura uthi & uski aahen & tez ho gayi.

"naaaaaaa..haiiiiiiiiiiiiiiii..!",pranav ki zuban uske gand ke chhed ko chhedne lagi thi & rambha ki halat buri ho gayi thi.usne daya hath peechhe le jate hue pranav ke baal pakad uske sar ko upar khincha & karwat le seedhi ho gayi.pranav ne vasna bhari muskan uski taraf fenki & bistar pe khade ho pant utar nanga ho gaya.uske 8.5 inch ke lund ko dekh rambha ka dil khushi se nach utha lekin usne masti se bojhal palko ko badn kar use apne sharm me dube hone ka ehsas karaya.

nanga parnava uske dayi taraf leta & use bayi karwat pe apni taraf ghuma uski kamar sehlate hue chumne laga.uska lund bhi uski chut ko chum raha tha.rambhe ne ab apne ko puri tarah se apne aashiq ke hatho me saunp diya tha.uske seene ke baalo me hath firate hue usne bhi use baaho me bhar liya tha.pranav ne uske baye kandhe ke uapr se dekhte hue uske blouse ko khola & jaise hi uski chhatiyan numaya hui vo unpe toot pada.un mast golaiyo ko apne munh me bhar ke vo unhe chusne laga.hatho me unhe bhar vo unhe zor se dabata & jab rambha aahe bharte hue jism ko upar modti to vo uske nipples ko chusne lagta.chhtaiyo ko chatat hue jab usne uske nipples ko ungliyo me masla to rambha zor se chikhte hue dobara jhad gayi.

ab waqt aa gaya tha dono jismo ke 1 hone ka & unke rishte ko jismani bandhan me baandhane ka.pranav ne uski tange failayi & unke beech ghutne pe baithke apna lund andar ghusaya,"oow.dard ho raha hai..thoda dhire karo na..aannnnhhhhh..!",sachchai to ye thi ki vijayant ke baad use ab koi bhi lund dard pahuchane vala nahi lagta tha lekin aisi harkat kar vo pranav ke mardana aham ko sehla use & josh me bhar dena chahti thi.

"bas ho gaya,meri jaan..aahhhhh..!",chut ki kasavat ne to pranav ko hairat me daal diya.aisa lag raha tha mano vo koi kunwari chut chod ke uska kunwarapan loot raha ho.masti me bhar usne zor ka dhakka lagaya.

"haiiiiiiiii..raammmmmmmmmmm..kitne zailm ho..oonnnnnhhhhh..!",pranav uske upar let agya tha & uske chehre ko chumte hue use chod raha tha.kuchh der baad rambha ke hath bhi uski pith pe firne lage & jab usne uski gand ko dabaya to uske dhakke & tez ho gaye. dono ab 1 dusre ko puri shiddat se chumte hue chudai kar rahe the.rambha kayi dino baad aise mast tarike se chud rahi thi.vijayant ke jane ke baad ye pehla mauka tha jab koi mard use is tarah se masti ke aasmaan me uda raha tha.pranav ke paas vijayant jaisa lund nahi tha na hi vaisi mardana khubsurti lekin tha vo chudai me mahir.

pehle to usne bahuty gehre dhakke lagaye jinme vo lund ko supade tak khinch fir jud tak andar dhakelta & uske baad jab rambha jhadne lagi to usne chudai ki rafta achanak bahut badha di jisme lund bas aadha hi bahar aata tha lekin chut ki deewaro pe uski tez ragad rambha ke josh ko & badha deti thi.

rambha ne pranav ki pith ko apne nakhuno se chhalni kar diya tha lekin vo tha ki jhadne ka naam hi nahi le raha tha.pranav ke liye ye bahut mushkil kaam tha.rambha ki kasi chut jhadte waqt jub uske lund ke gird sikudne-failne lagti to vo apna kabu lagbhag kho hi deta lekin vo is pehli chudai me hi apni is nayi-naveli mehbuba pe apni mardangi ki mazbut chhap chhodna chahta tha.

"haiiiiiiiii..raam............pranav......jaaaaaaannnnnnnnn..aise kabhi nahi chudi main........oohhhhhhhh..aannnnnnhhhhh..chodo mujhe.....haaaaaaaaannnnnnn..!",1 zor ki chikh marte hue,uske kandho me nakhun dhansate huen uski kamar pe tange fansa uchakte hue vo jism ko kaman ki tarah modte jhad gayi.uske chehre ko dekh lagta tha jaise vo bahut dard me ho jabki haqeeqat ye thi ki vo jhadne ki khushi ko puri shiddat se mehsus ka rahi thi.

fir uske chehre pe halki si muskan khelne lagi-uski chut me uske naye premi ka lund garm virya chhod raha tha & vo aahe bharta uska uske upar let raha tha.rambha ne use baaho me bhara & apne baye kandhe ke upar apna chehra rakhe pranav ke sar ko chum liya.

“Meri mohabbat kabool kar ke tumne mujhpe kitna bada ehsan kiya hai,ye tumhe pata nahi,Rambha.”,chudai ke baad Pranav rambha ke dayi taraf leta daye hath se uske baye gaal ko sehla raha tha.rambha bhi uske seene pe apni ungliya dhime-2 ghuma rahi thi.

“ehsan to tumne mujhpe kiya hai,pranav.sochti hu to sihar jati hu ki agar tum na milte to kya karti..main to pagal hi ho jati!”,ajib baat thi.dono hi 1 dusre ko apni mohabbat ke sachchi hone ka yakeen dilane ke liye jhuth bol rahe the.jaha pranav rambha ko apne company ke malik banane ke maqsad ko pura karne ke liye istemal karna chahta tha vahi rambha use apni jismani zarurato ko pura karne ka zariya bana ke Mehra parivar me apne 1 sathi ke taur pe istemal karna chahti thi.

Pranav jhuka & uske honth chume to rambha ne bhi uske hotho pe apni jibh fira di.pranav ne uske baye hath ko tham use apne sikude lund pe dabaya to rambha ne fir se sharmane ka natak karte hue hath peechhe khincha & apna chehra thoda aage ho uske seene me chhupa liya.pranav muskuraya & uske jism ki bagal me hath fer dobara uska hath tham use apne lund pe dabaya.is baar rambha ne uska lund tham liya & use maslane lagi.pranav josh me bhar uske baalo & gardan ko chumte hue uske jism pe hath ferne laga.rambha ke hath uske lund ko hilate hue fir se jagane lage.

“tumne apni zindagi ke bare me kya socha hai,rambha?”,pranav ne lund uske hath se khincha & use lita ke apne ghutno pe ho lund ko uske hotho se sataya.rambha ne uske lund ko pakad ke hilaya lekin jab pranav ne lund ko uske hotho pe sataya to usne sharma ke munh fer liya.pranav ne uske chehre ko apni or ghumaya & 1 baar fir lund ko uske hotho pe ragda.rambha ne thodi na-nukar ki lekin fir apne gulabi hotho me uske lund ko qaid kar liya.uske zehan me Vijayant Mehra ke tagde lund ki tasvir kaundha gayi & uske dil me 1 hook si uthi.uska sasur lautne vala nahi tha & ab shayad zindagi bhar ye kasak uska peechha nahi chhodne vali thi.uske jism me vijayant ke badan & uske pyar karne ke andaz ki yaad ne aag laga di & uske honth pranav ke lund pe & kas gaye.

“main samjhi nahi.”,usne lund munh se nikala & uth baithi.pranav apne ghutno pe khada ho gaya to vo uski jhanto me & nichle pet pe apne chehre ko ragadte hue apni masti ka izhar karne lagi.

“mera matlab hai ki kya tum yuhi bas apni uljhan ka rona roti rahogi ya kuchh karogi bhi?..aahhhh..!”,rambha ne uske 1 ande ko munh me bhar zor se chusa.

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kramashah.......