रेल यात्रा compleet

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raj..
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Joined: 10 Oct 2014 01:37

Re: रेल यात्रा

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 16:20

"तो क्या! अब मैं आपके पास नहीं रहूंगी। मुझे यहाँ डर लगता है। आपके जाते
ही!" रानी मायूस होकर बोली।
"तुम कहीं नहीं जा रही मेरे पास से। खाना खाओ। फिर बात करेंगे!" आशीष ने
मुस्कुराकर रानी से कहा और बिस्तर पर एक कोने में बैठ गया।
कृतज्ञ सी होकर वो लड़की काफी देर तक आशीष को देखती रही। रानी की बातों से
उसको लगने लगा था की आशीष बुरा आदमी नहीं है। उसका दिल कह रहा था की 'वो'
उससे एक बार और नाम पूछ ले।
"खाना खाओ आराम से। किसी से डरने की जरुरत नहीं। इनकी तो मैं! " आशीष के
दिमाग में कुछ चल रहा था।
लड़की रानी के साथ बैठ कर खाना खाने लगी।!।

"हेल्लो, मुंबई पुलिस!" आशीष के फ़ोन पर आवाज आई।

"जी। मैं आशीष बोल रहा हूँ। धरावी से!" आशीष ने संभल कर उन दोनों को चुप
रहने का इशारा किया।

"जी, बताईये हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं!?" उधर से इस बार भी थकी थकी
सी आवाज आई।

"जी। जहाँ अभी मैं गलती से आ गया हूँ। वहां नाबालिग लडकियों को जबरजस्ती
लाकर उनसे वैश्यावृति करायी जा रही है। यहाँ.." आशीष की बात को उधर से
बीच में ही काट दिया गया।
"जी। पता लिखवाईये। "
"जी एक मिनट! " आशीष ने एक मिनट पहले ही मकान के बाहर से नोट करके लाया
पता ज्यों का त्यों लिखवा दिया।
"आप का नाम? "
"जी। आशीष!"
"मोबाइल नम्बर।?"
"जी 9215..........!"
"ठीक है। मैं अभी रिपोर्ट करता हूँ। " उधर से फोन कट गया।
"कहाँ फोन किया है आपने?" लड़की ने पूछा।
"पुलिस को। यहाँ किसी से बात मत करना!" आशीष ने कहा।
लड़की का चेहरा उतर गया!- "पुलिस तो यहाँ रोज ही आती रहती है। एक बार तो
पुलिस वाला मुझे गाली भी देकर गया था। इनकी बात न मानने के लिए! "
"अच्छा? आशीष ने कुछ सोचा और एक बार फिर 100 नम्बर ड़ायल कर दिया।
"हेल्लो, मुंबई पुलिस!" इस बार आवाज किसी महिला पुलिसकर्मी की थी!
"जी, मैं आशीष बोल रहा हूँ।!"
"जी, कहिये। पुलिस आपकी क्या मदद कर सकती है। "
आशीष ने पूरी बात कहने के बाद उसको बताया की लोकल पुलिस पर उसका भरोसा
कतई नहीं है। वो यहाँ से 'महीना ' लेकर जाते हैं। इसीलिए खानापूर्ति करके
चले जायेंगे। "
"OK! मैं आपकी कॉल फॉरवर्ड कर रही हूँ। कृपया लाइन पर बने रहिये।" महिला
पुलिसकर्मी ने कहा!
"जी धन्यवाद!" कहकर आशीष कॉल के कोनेक्ट होने का इंतज़ार करने लगा।
"हेल्लो! मुंबई मुख्यालय!"
आशीष ने पूरी बात विस्तार से कही और उनको अपना नाम, मोबाइल नम्बर। और
यहाँ का पता दे दिया। पर आवाज यहाँ भी ढीली इतनी थी की कोई उम्मीद आशीष
के मनन में न जगी!
तभी दरवाजा खुला और बूढ़ा दरवाजे पर चमका- "क्यूँ भाई? क्यूँ हमारी रोज़ी
पर लात मार रहे हो? इसको ऐसे ही खाना खिलाते रहे तो हम तो भिखारी बन
जायेंगे न!" बूढ़े के बात ख़तम करते ही दरवाजे पर उनके पीछे मोटे तगड़े
तीन मुस्टंडों के सर दिखाई दिए।
"खाना ही तो खिला रहा हूँ ताऊ। इसमें क्या है?" आशीष पीछे खड़े लोगों के
तेवर देख कर सहम सा गया।
"वो तो मैं देख ही रहा हूँ। तेरा खाना हमें 50,000 में पड़ेगा। पता है
क्या? ये साली किसी को हाथ तक नहीं लगाने देती अपने बदन पर। चल फुट यहाँ
से! " ताऊ ने उसके बाल पकड़ कर बिस्टर से उठा दिया! " वह कराह उठी!

raj..
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Re: रेल यात्रा

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 16:21


"ये क्या कर रहे हो। छोड़ दो इसको! !" आशीष ने दबी सहमी सी आवाज में कहा।
"हाँ हाँ। छोड़ देंगे। एक लड़की का 2 लाख लगेगा। ला निकाल और ले जा जिसको
लेकर जाना है। " बूढ़े ने गुर्राकर कहा।
"तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? " आशीष ने हडबडा कर कहा।
"अभी पता चल जायेगा हम कैसे करते हैं। अपना ATM इधर दो। वरना ये पहलवान
मार मार कर तुम्हारा भुरता बना देंगे।" ताऊ ने धमकी दी।
"पर...पर! " आशीष ने सहम कर उन गुंडों की और देखा। वो सभी बाहों में
बाहें डाले उसकी और देख कर मुस्कुरा रहे थे। आशीष ने जैसे ही ATM निकलने
के लिए अपना पर्स निकाला। बूढ़े ने पर्स ही हड़प लिया- "ला। छुट्टे भी
चलेंगे थोड़े बहुत। अब ATM का नम्बर बता और जिसकी मारनी है, मार कर चुप
चाप पतली गली से निकल ले!" पुर्से में 4-5 हज़ार रुपैये देख कर बूढ़ा खुश
हो गया।
आशीष बेबस था। पर उसको पुलिस के आने की उम्मीद थी। उसने बूढ़े को गलत
नम्बर बता दिया।
"शाबाश बेटा, जुग जुग जियो। हे हे हे ले ये रख ले। वापस जाते हुए काम
आयेंगे! " बूढ़े ने एक 500 का नोट उसकी जेब में डाल दिया!
"क्या है रे बूढ़े। तू अपने ग्राहक को चेक करके इधर क्यूँ नहीं बुलाता है।
खाली पीली किसी ने 100 नम्बर घुमा दिया। अपुन की वाट लग जाती है फ़ोकट
में! " बहार से आये एक पुलिस वाले ने पान का पीक दीवार पर थूकते हुए कहा।

"अरे पाटिल साहब। आईये आईये। " उसके स्वागत में सर झुका कर ताऊ चौंक कर
बोला- "क्या? 100 नम्बर।? जरूर इस हरामी ने ही मिलाया होगा! " बूढ़े ने
गुर्राकर कहते हुए आशीष की और देखा।
"ये काहे को मिलाएगा 100 नम्बर।। दो दो को बगल में दबाये बैठा है। अरे ये
भी!" पाटिल ने आश्चर्य से उस लड़की की और देखा!- "बधाई हो, ये लड़की भी
चालू हो गयी। अब तो तेरी फैक्ट्री में पैसे ही पैसे बरसेंगे। ला! थोड़े
इधर दे। " पाटिल ने पर्स से दो हज़ार के नोट झटक लिए।
"कहे की फैक्ट्री साहब। साली एक नम्बर की बिगडैल है। सुनती ही नहीं। ये
तो इसको खाना खिला रहा है भूतनी का। " बूढ़े ने पाटिल की जेब में जा टंगे
दोनों नोटों को मायूसी से देखते हुए कहा।
"अरे मान कहे नहीं जाती साली। अपने जवानी को इस तरह छुपा कर बैठी है जैसे
इसका कोई यार आकर इसको यहाँ से निकाल कर ले जायेगा। कोई नहीं आने वाला
इधर। तू निश्चिंत होकर अपनी चूत का रिब्बों कटवा ले। साली। छा जाएगी
अक्खी मुंबई में। मेरे से लिखवा ले तू तो। साली तू तो हेरोइन बनने के
लायक है। मुझसे कहे तो मैं बात करूं। फिलम इन्डस्ट्री में एक यार है अपुन
का भी। बस एक बार! " कहकर पाटिल ने अपनी बत्तीसी निकाल ली!- "बोल क्या
कहती है?"
लड़की ने शर्म से अपनी नजरें झुका ली।
"मान जा बहन चोद। यूँ ही सड़ जाएगी यहाँ। भूखी मार देंगे तुझे ये। एक
बार। बस एक बार नंगी होकर नाच के दिखा दे यहाँ। मैं खुद खाना लाऊंगा तेरे
लिए। " पाटिल अपनी जाँघों के बीच हाथ से मसलते हुए बोला।
"छोडो न साहब। ये देखो। आज ही नया माल लाया हूँ। दिल्ली से। एक दम करारी
है। एक दम सील पैक। उसे करके देखो!" बूढ़े ने रानी की और इशारा किया।
पाटिल ने दरवाजे से अन्दर हाथ करके रानी के गालों पर हाथ मारा!- "हम्म।
आइटम तो ये भी झकास है। चल। ड्यूटी ऑफ करके आता हूँ शाम को। फिर इसका
श्री गणेश करेंगे। अभी तो मेरे को जल्दी है। साला कैसी कैसी तन्सिओं देते
हैं ये लोग। मुझे तो पटवारी का काम लग रहा है। मुकाबले की वजह से जरूर
उसने ही फ़ोन करवाया होगा। वैसे तेरे माल का कोई मुकाबला नहीं भाऊ...एक
एक जाने कहाँ से बना कर लाता है। "

"हे हे हे सब ऊपर वाले की और आपकी दया है पाटिल साहब! !" बूढ़े ने मक्खन लगाया।
"ठीक है। ठीक है। अभी मेरे को दो चार पड़ोसियों के बयां लिखवा दे। 100
नम्बर की कॉल पर साला ऊपर तक रिपोर्ट बनाकर देनी होती है। जाने किस
मादरचोद...."
पाटिल ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी की बाहर पुलिस सायरन बज उठा।

raj..
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Re: रेल यात्रा

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 16:22


"ए अब यहाँ मुनादी करनी जरूरी है क्या? ड्राईवर को बोल होर्न बंद कर देने
का। साला इस सायरन से इतनी चिढ़ है की! " एक बार फिर पाटिल की आवाज उसके
हलक में ही रह गयी। अगले ही पल पुलिस के आदमी पूरे मकान में फ़ैल गए।
घबराकर पाटिल ने बूढ़े का कालर पकड़ लिया- "साले। बूढ़े। यहाँ धंधा करता है।
मेरे इलाके में। चल ठाणे तेरी अकड़ निकालता हूँ। " पाटिल ने कहा और अन्दर
आ चुके इंस्पेक्टर को देखते ही गला छोड़ कर सलाम ठोका- "सलाम साहब! आपने
क्यूँ तकलीफ की। मैं पहले ही आ गया था इसको पकड़ने। खैर। अब आप आ गए हो तो
संभालो। मैं चलता हूँ। "
"तुम कहीं नहीं जाओगे पाटिल? इंस्पेक्टर ने अपनी टोपी उतारते हुए कहा-
"तुम्हारे ही खिलाफ शिकायत हुई है। यहीं खड़े रहो! " इंस्पेक्टर ने कहा और
पूछा- "आशीष कौन है!?"
"जी मैं। मैंने ही फ़ोन किया था।!" आशीष ने रहत की सांस ली!
"हम्म। वैरी गुड! पर तुम ये कैसे कह रहे हो की लोकल पुलिस कार्यवाही नहीं
कर रही। क्या पहले भी तुमने शिकायत की है?" इंस्पेक्टर ने पूछा।
"जी नहीं। इस लड़की ने बताया है। " आशीष ने अन्दर इशारा किया।
"हम्म....बाहर बुलाओ जरा इसको!" इंस्पेक्टर ने अन्दर देखते हुए कहा।
आशीष के इशारा करने पर डरी सहमी सी वो लड़की बाहर आ गयी। बाहर आते ही उसने
आशीष का हाथ पकड़ लिया।
"घबराओ नहीं बेटी। खुल कर बताओ। क्या पुलिस तुम्हे बचाने के लिए नहीं आ
रही।?" इंस्पेक्टर ने प्यार से पूछा।
आशीष के साथ खड़े होने और इंस्पेक्टर के प्यार से बोलने के कारण लड़की में
हिम्मत बंधी। उसने कडवी निगाह से पाटिल की और देखा- "ये ये पुलिस वाला तो
यहाँ रोज आता है। ये ये कुत्ता मुझे गन्दी गन्दी गालियाँ देता है और
उल्टा इन लोगों की बात मानने को कहता है। इसी ने इन लोगों को बोला है की
मैं जब तक इनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं होती मेरा खाना बंद कर दो।
मैंने इसको हाथ जोड़ कर कहा था की मैं यहाँ नहीं रह सकती। ये कहने लगा की
मेरे साथ कर लो। फिर मैं तुझे छुडवा दूंगा......थू है इस पर "
इंस्पेक्टर की नजरें पुलिस वाले की तरफ लड़की को इस तरह थूकता देख शर्म से
झुक गयी।- "क्या नाम है बेटी तुम्हारा?"
"रजनी!" कहते हुए लड़की ने सर उठा कर आशीष के चेहरे की और देखा। मनो कह
रही हो। मैं तुम्हे बताने ही वाली थी। पहले ही।
"हम्म....बेटा, ऐसे गंदे लोग भी पुलिस में हैं जो वर्दी की इज्जत को यूँ
तार तार करते हैं। ये जान कर मैं शर्मिंदा हूँ। पर अब फिकर मत करो!" फिर
आशीष की और देखते हुए बोला- "और कुछ मिस्टर आशीष!"
"जी। इस बूढ़े ने मेरा पर्स छीन लिया है। और उसमें से 2000 रुपैये आपके इस
पाटिल ने निकाल लिए हैं। "
पाटिल ने तुरंत अपनी जेब में ऊपर से ही चमक रहे नोटों को छिपाने की कोशिश
की। इंस्पेक्टर ने रुपैये निकाल लिए।
"नहीं! जनाब ये रुपैये तो मेरी पगार में से बचे हुए हैं। वो आज मैडम ने
कुछ समान मंगाया था। माँ कसम। " पाटिल ने आखिर आते आते धीमा होकर अपना सर
झुका लिया।
इंस्पेक्टर ने बूढ़े के हाथ से पर्स लिया। उसमें कुछ और भी हज़ार के नोट
थे। इंस्पेक्टर ने कुछ देर सोचा और फिर बोले- "शिंदे।!"
"जी जनाब!" शिंदे पीछे से आगे आ गया!
रजनी बिटिया का बयान लो और पाटिल को अन्दर डालो। बूढ़े को और जो लोग इसके
साथ हैं। उनको भी ले लो। सारी लड़कियों का घर पता करके उन्हें घर भिजवाओ
और जिनका घर नहीं है। उनको महिला आश्रम भेजने का प्रबंध करो!" इंस्पेक्टर
ने लम्बी सांस ली।
इंस्पेक्टर की बात सुनते ही रानी अन्दर से बाहर आई और रजनी से आशीष का
हाथ छुडवा कर खुद पकड़ने की कोशिश करने लगी। पर रजनी ने हाथ और भी सख्ती
से पकड़ लिया। इस पर रानी आशीष के दूसरी तरफ पहुँच गयी और उसका दूसरा हाथ
पकड़ लिया।
आशीष ने हडबडा कर अपने दोनों हाथ पकडे खड़ी लड़कियों को देखा और फिर
शर्मिंदा सा होकर इंस्पेक्टर की और देखने लगा।
"वेल डन माय बॉय! यू आर हीरो!" इंस्पेक्टर ने पास आकार आशीष का कन्धा
थपथपाया और मुड़ गया।

रेलवे स्टेशन पर पहुँच कर आशीष ने रहत की सांस ली। हीरो बनने का ख्वाब
अधूरा छोड़ वह वापस अपने घर जा रहा था। बेशक वह हीरो नहीं बन पाया। पर
इंस्पेक्टर के 'वो' शब्द उसकी छाती चौड़ी करने के लिए काफी थे!

"वेल डन माय बॉय! यू आर हीरो!"

इन्ही रोमांचक ख्यालों में खोये हुए तत्काल की लाइन में आशीष का नम्बर कब
खिड़की पर आ गया। उसको पता ही नहीं चला!
"अरे भाई बोलो तो सही!" खिड़की के अन्दर से आवाज आई।

"थ्री टिकट टू दिल्ली!" आशीष ने आरक्षण फाम अन्दर सरकते हुए जवाब दिया!




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Raj Sharma