समय और संयोग : दोस्त की सच्चाई, बीवी की अच्छाई

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समय और संयोग : दोस्त की सच्चाई, बीवी की अच्छाई

Unread post by admin » 18 Jan 2017 03:58

मेरा नाम नील है.. मैं शादीशुदा हूँ और ऑनलाइन शॉपिंग साइटों के प्रोडक्ट के
लिए मॉडलिंग करता हूँ।
इस मॉडलिंग और लाइफ से जुड़ी काफी कई सारी बातें होती हैं.. जो फिर कभी
बताऊँगा.. क्योंकि टाइपिंग करने की आलस के कारण.. वो बात लिख रहा हूँ.. जो
काफी सेक्सी है।
आपको आगे कभी फिर बताऊँगा कि शादी के पहले जब कुंवारा था.. तब मॉडल की ऑडिशन
के लिए निकला.. तब क्या हुआ था और शादी के बाद क्या-क्या हुआ.. पर अभी तो मेरा
ध्यान सिर्फ कहानी पर है।

अब कहानी पर आते हैं..

मेरी वाइफ का नाम कीर्ति है.. वो 25 साल की है। हम दोनों ही कद में लम्बे हैं,
मैं 6.5 फुट का हूँ और वो 6.1’ लंबी है। वो बहुत गोरी होने के कारण सेक्सी भी
लगती है।

काम पर जब मैं दोपहर की चाय-नाश्ते के लिए जिस कैंटीन में जाता था.. वहाँ मेरी
हम-उम्र का एक लड़का भी आता था.. उससे मेरी दोस्ती हुई.. फिर धीरे-धीरे उससे
पक्की दोस्ती भी हो गई थी।

संयोग की बात यह है कि वो मुझसे दो मकान की दूरी पर ही रहता था और उसका खुद का
मकान था। उसका परिवार दूसरे शहर में रहता है.. यहाँ वो बिजनेस बढ़ाने आया था।

इसी तरह रहते-रहते मेरी और उसकी दोस्ती इतनी पक्की हो गई.. जैसे अटूट बंधन..
पर अभी तक वो हमारे घर नहीं आया था।
तो एक दिन मैंने उसे खाने पर बुलाया.. तब उसने खाने की बहुत तारीफ की। वो
कीर्ति की भी बहुत इज्जत करता था।

एक दिन हम दोनों दोस्त कैंटीन में बैठे थे.. तब पता चला कि उसकी तबियत खराब
है। मैं उसको डॉक्टर के पास लेकर गया। डॉक्टर ने बोला- खाने में कुछ खराब खा
लेने की वजह से इसका पहले पेट खराब हुआ और फिर बुखार आया है।

डॉक्टर ने दवा दे दी और हम दोनों घर को आने लगे।

मैंने उससे खाने के बारे में पूछा.. तब रास्ते वो बोला- मैं जिसके यहाँ खाने
जाता हूँ.. वहाँ कभी-कभार बासी खाना गरम करके दे देते हैं और नजदीक कोई होटल
या फिर इसका बंदोबस्त नहीं है।
तब मैंने कहा- ऐसा थोड़ी चलता है.. आज से तू मेरे यहाँ खाने पर आएगा।

उसने मना किया।
मैं- क्यों भाई.. क्यों नहीं आएगा? हम बासी नहीं खाते समझे..
‘ठीक है.. आऊँगा.. पर जितना यहाँ खाने का देता था.. उतना ही तुझे भी दूँगा..’

मैं- अबे.. मैंने कोई होटल खोल रखा है.. जो पैसे लूँगा..
संजय- तो तूने धर्मशाला भी तो नहीं खोल रखी.. कि मुफ्त में खाना देगा..

ऐसी लड़ाई के बाद पैसे लेने की बात पक्की हुई।

ऐसे ही दिन गुजरते रहे.. वो रात को खाने पर आता और एक बार भी उसने कभी कीर्ति की तरफ बुरी नजर से नहीं देखा.. वो उसकी बहुत इज्जत करता था और ना ही कीर्ति
कभी उसकी ओर आकर्षित हुई।

एक दिन मुझे मॉडलिंग के शूट के लिए दो दिन के लिए बाहर जाना था। मैं जब दो दिन
बाद आया.. तो हालात कुछ बदले-बदले से लगे, कीर्ति मुझसे नजरें नहीं मिला रही
थी।

मैं दूसरे दिन काम पर गया.. फिर दोपहर को जब मैं और संजय कैंटीन में मिले.. तो
मैंने यह बात बताई। हम दोनों दोस्त एक-दूसरे से झूठ नहीं बोलते थे.. सब बता
देते थे।

मेरी बात सुनकर वो थोड़ा हड़बड़ाया और शर्म से नीचे देख कर बोला- चल, गार्डन में
बात करते हैं।
फिर हम गार्डन में आए.. तो उसने बताया- पहले तुम वादा करो कि तुम दोस्ती नहीं
तोड़ोगे.. चाहे मुझे मार लेना।

मैं थोड़ा आशंकित हुआ- ठीक है.. बोल तो सही..
संजय- जब तुम दो दिन बाहर थे उस दौरान मैंने और भाभी ने शारीरिक संबध बना लिए
थे।

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई..
मुझे गुस्सा ज्यादा नहीं आया.. क्योंकि मैं समझना चाहता था कि शादी के बाद वो
घटना घटित कैसे हुई थी। फिर संजय मेरा पक्का दोस्त भी था तो मैंने उससे पूरी
बात जानना चाही।

मैं- तू तो कीर्ति बहुत इज्जत करता था ना?
संजय- मैंने जानबूझ कर नहीं किया.. मेरे मन में तो ऐसे विचार भी कभी नहीं आए!
मैं- यानि कीर्ति?
संजय- ना.. यह समय दोष है.. खराब टाइम पर मैं बहक गया..

फिर उसने पूरी बात बताई-

जब मैं रात के खाने के लिए आया.. तब नल से पानी लीक हो रहा था.. तो भाभी नल
टाइट कर रही थी.. पर नल को ज्यादा टाइट करने पर वो टूट गया और वो चिल्लाई। मैं
दौड़ कर गया तो देखा कि नल टूटने कारण पानी का फव्वारा निकल रहा था और भाभी वो
सब बंद नहीं कर पा रही थी।

पानी का प्रेशर ही इतना अधिक था.. कि भाभी पूरी की पूरी पानी से नहा चुकी थी
और यह देख कर मैं हँसने लगा।
सकीर्ति- हँस क्या रहे हो.. मदद करो मेरी..
मैं मदद करने गया.. मैंने उसमें कपड़े का डाट बना कर लगाया.. पर वो भी निकल गया।

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Re: समय और संयोग : दोस्त की सच्चाई, बीवी की अच्छाई

Unread post by admin » 18 Jan 2017 03:59

ऐसे ही मेहनत करते-करते बहुत देर हो गई और जब तक ऊपर रखी पानी की टंकी जब तक
खाली नहीं हुई.. तब तक पानी बहता रहा।

जल ही जीवन है, पानी बचाएं!

फिर क्या था.. पूरा घर पानी-पानी हो गया।
कीर्ति भाभी और मैं घर साफ करने लगे। हम दोनों भीगे हुए थे। कीर्ति का नाइट
ड्रेस उसके शरीर से चिपका हुआ था.. वो सब मुझे बहुत बोल्ड लग रहा था। मैंने
मैंने
कभी भी कीर्ति के बारे ऐसा सोचा नहीं था.. और आज उसकी छाती पर और पीछे चिपके
कपड़े देख मेरा मन मचल रहा था।
संजय की बात सुनकर मुझे लगा कि इसके बाद संजय खुद ही कीर्ति को चोदने के लिए
आगे बढ़ा होगा.. पर ऐसा नहीं था।
मैं- फिर..

संजय- तभी धड़ाम करती कीर्ति गिरी.. उसे कूल्हे और पैर की ऐड़ी पर थोड़ा लग गया..
जिसके कारण उसे बेहद दर्द कर रहा था.. वो चल भी नहीं पा रही थी। मैंने उसे उठा
कर बेड पर लेटाया और मैं पानी साफ करने जा रहा था.. तब उसने बोला कि अल्मारी
में दूसरी नाइट ड्रेस है.. मुझे निकाल कर दे दो.. मैं पूरी भीग चुकी हूँ।
तो मैंने उसे कपड़े निकाल कर दे दिए और पानी साफ करने जाने लगा।

उसने बोला- दरवाजा बंद करते जाना।
क्योंकि कीर्ति को नाइट ड्रेस बदलना था।

मैंने पूरे घर में पानी साफ किया बाद में कीर्ति के कमरे में गया और उससे
बोला- चलो उठो अब खाना खा लो।
कीर्ति बोली- पहले तुम ये भीगे कपड़े बदल लो.. अल्मारी में नील के कपड़े हैं पहन
लो और ड्रावर में निक्कर है।
मैं संजय की बात को स्तब्धता से सुन रहा था… मुझे लगा यहाँ से संबध बनाने के
लिए वे दोनों आगे बढ़े होंगे।
‘फिर?’

संजय- फिर मैंने तुम्हारे कपड़े लिए और बदलने के लिए बाथरूम की ओर जाने लगा।
तब भाभी बोली- रुको..
मैं रुका.. उसने अपने कपड़े मुझे देते हुए बोला- ये कपड़े बाथरूम में रख देना।
ये उसके भीगे हुए कपड़े थे.. वही सब उसकी भीगी नाइट ड्रेस और ब्रा-पैन्टी
वगैरह..

मैं उसके कपड़े लेकर गया.. फिर कपड़े बदल कर आ गया और बोला- अब खाने चलें?
कीर्ति ने कहा- हाँ चलो..

चूंकि वो चल नहीं पा रही थी तो मैंने कीर्ति को उठाया.. तब पता चला कि उसने
ब्रा तो पहनी ही नहीं थी।

फिर याद आया कि उसने शर्म के मारे मुझसे सिर्फ नाइट ड्रेस ही मांगी थी।

खाने के बाद मैंने कहा- लाओ मैं बर्तन साफ कर देता हूँ।
वो बोली- नहीं.. कल मैं कर दूँगी..
पर फिर भी मैं साफ करने लगा।

भाभी के लिए मैंने टीवी चालू कर दी।
जब मैं साफ-सफाई करके आया तो भाभी ने टीवी बंद कर दी।

फिर मैं बोला- अब मैं चलता हूँ.. चलिए मैं आपको बिस्तर पर ले चलता हूँ।

तब पता चला कि भाभी थोड़ी काँप और अकड़ रही थी.. शायद टीवी पर कोई हॉट सीन देखा
होगा और उसको उठाते वक्त मेरे हाथ भी उसके मम्मों को टच हो रहे थे।

फिर मैंने उसको कमरे में पहुँचाया। जब मैं उसको बिस्तर पर लिटा ही रहा था कि
तभी मेरा यह हाथ का बेन्ड उसके नाइट ड्रेस के टॉप के धागे में फंस गया था.. इस
वजह से उसकी टी-शर्ट ऊपर हो गई और उसके मम्मे बाहर दिखने लगे
वो शरमा गई और कुछ हड़बड़ा भी गई। हड़बड़ाहट की वजह से उसने टी-शर्ट ठीक नहीं की
और कमोवेश मेरे भी होश उड़े हुए थे। अन्दर से हवस कब जग गई.. पता नहीं चला और
कुछ सोचे-समझे बिना मैं उसके मम्मों को दबाने लगा।

तभी भाभी चौंकी.. और मेरा हाथ हटाने की कोशिश करने लगी.. पर बेन्ड भी तो फंसा
हुआ था।
भाभी ना तो कुछ बोल रही थी.. ना कुछ कर पा रही थी।

मेरी कामवासना चरम पर थी।

मैंने भाभी को कस के पकड़ लिया, उसके सर को पकड़ चुम्बन करने लगा पर भाभी सदमे
में थी.. फिर मैंने उसे लेटा कर अपने निक्कर से लण्ड बाहर निकाला। उसकी नाइट
ड्रेस भी निकाल दी।

सेक्सी मूवी देखने की वजह से उसकी चूत भी गीली थी.. इसलिए मैंने पोजीशन बनाई
और झट से लण्ड डाल दिया।
भाभी के मुँह से ‘आह’ निकली..
और मैं ‘धपाधप..’ चुदाई करने लगा, ना कुछ समझ में आ रहा था.. ना कुछ दिखाई दे
रहा था।

उधर भाभी भी मेरा साथ देने लगी थी.. मैं और भी मस्ती में चुदाई में मशगूल हो
गया था।
भाभी इतने लगी शायद वो झड़ने की स्थिति में आ चुकी थी।
फिर अचानक मैंने भी स्पीड बढ़ा दी और झड़ गया।

झड़ने के बाद मेरा मन अन्दर से बुरे अहसास से भर गया कि यह मैंने क्या कर दिया।
किसी भी इन्सान पर हवस और बुरी नजर या कामवासना सर पर चढ़ जाती है.. फिर उसका
अहसास स्खलन के बाद ही होता है।
मेरी आंख से आंसू गिरने लगे और फिर मैं भाभी के बाजू में ही बिस्तर पर गिर गया।

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Re: समय और संयोग : दोस्त की सच्चाई, बीवी की अच्छाई

Unread post by admin » 18 Jan 2017 03:59

भाभी की आंख में भी आंसू थे.. वो उठी मेरे सर पर हाथ रखा।
बोली- यह तुम्हारी गलती नहीं थी.. तुम्हारी इच्छा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी..
इसी लिए जब तुम चुदाई कर रहे थे तब तुम्हारी आँखों में वासना ही दिख रही थी।
पर एक बात ध्यान रखो वासना अपनी जगह ठीक है.. पर किसी का ख्याल रखना बड़ी बात
है कि उसे दु:ख ना हो।

मैं- मुझे माफ कर दीजिए भाभी!
मैं उनसे सिर्फ इतना ही बोल पाया।

कीर्ति- कोई बात नहीं और ना ही इस बात को किसी से कहूँगी.. तुम चिंता मत करो।
भाभी के सहलाने से कब मैं नंगा ही सो गया.. पता ही नहीं चला।
थकान दोहरी थी.. भाभी के साथ चुदाई और पूरा घर जो साफ किया था।

जब आधी रात को टॉयलेट के लिए नींद खुली.. तब देखा तो भाभी सोई हुई थी।
वो मेरे साथ ही बिस्तर पर सो गई थी.. पर बीच में तकिये की दीवार बना दी थी।

वो नींद में कराह रही थी।
मैं नंगा था.. मैंने भाभी को उठाया और बोला- क्या हुआ.. दर्द है?
कीर्ति- हाँ तुम्हारे धक्कों से जांघ और कमर पर थोड़ा दर्द है।

मैंने ‘सॉरी’ बोला और रसोई में गया, तेल को गरम किया वापस आकर बोला- लाइए लगा
दूँ..

उसकी कमर पर तेल लगाने लगा।
भाभी ‘थैंक्स’ बोली और मेरी ओर मुँह करके लेट गई।

मैं गरम तेल लगा रहा था.. भाभी के मुलायम शरीर के स्पर्श से फिर से झनझनाहट
होने लगी और लण्ड भी खड़ा हो गया।
भाभी मेरे सामने देख रही थी.. जब मैंने उसे देखा तब उसने अपनी भौं बनाकर मुझे
घूर कर देखा और हँसी।
मैं भी हँस दिया.. पर मैं तो भूल ही गया था कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं और
मेरा लण्ड खड़ा था
मैं शर्म के मारे पानी-पानी हो गया.. पर मेरा लण्ड फिर भी खड़ा था जिससे
वो और गरम हो रही थी।
तभी मैं जोश में आकर उसके मम्मों को पकड़ कर चूसने लगा।
मुझे थोड़ा अजीब सा लग रहा था.. मेरी जीभ के स्पर्श वो एकदम तड़प उठी
‘आआअहह.. आओउम्म्म्म ऐईईईईईई..’
और वो मुझे अपने मम्मों पर ऐसे दबाने लगी कि जैसे वो किसी रंडी हो।
करीब मैं 10-15 मिनट तक उसके मम्मों को लगातार चूसता रहा। फिर मैं उठा और
मैंने उसकी कमर के नीचे एक तकिया रखकर अपना लण्ड उसकी चूत पर जैसे ही रखा
और एक धक्का देकर मैंने लण्ड पूरा उसकी चूत के अन्दर कर दिया.. तो वो
एकदम तड़प उठी और सिसकियाँ भरती हुई बोली- आहईई ईईरररे.. अह्ह्ह्ह
ह्ह्ह्ह यह तुम्हारे लण्ड ने क्या कर दिया.. अह्हह्ह हऐह्ह्हह.. मैं उसके मम्मों को चूसने और दबाने लगा।
जब वो मुझे थोड़ी शांत लगी तो मैं फिर से ज़ोर-ज़ोर से धक्के देने लगा तो
वो ‘अहह्ह उफफ्फ.. ह्ह्ह्ह ह्ह्ह्ह..’ करने लगी।

शायद अब उसे भी मज़ा आने लगा था और ताबड़तोड़ चुदाई के बाद वो भी अपनी
गाण्ड को उठा-उठाकर मेरा साथ देने लगी और उसने अपने जिस्म को पूरी तरह
टाईट कर लिया।
मैं समझ गया कि वो झड़ने वाली है.. तो मैं अब और भी ज़ोर-ज़ोर से धक्के
देकर चोदने लगा।
वो चिल्लाने लगी- आअहह..आआह्ह.. इसस्सई इसस.. अहह..ह्ह्ह्हह चोदो मुझे और
ज़ोर से.. उह्ह्ह्ह ह्ह्ह्ह चोदो मुझे..।
वो झड़ गई और शांत हो गई।

अब मेरी बारी थी.. तो मैंने उससे पूछा- अपना पानी कहाँ निकालूँ?
तो वो बोली- अन्दर ही छोड़ दो.. मैं भी आज तेरे पानी का मजा ले ही लूँ।

बस 5-7 जोरदार धक्कों के बाद मैं भी झड़ गया और उसके ऊपर ही लेट गया और
दस मिनट लेटे रहने के बाद जब हम नॉर्मल हुए तो हमने दोबारा एक गहरा किस
किया और एक-दूसरे को अपनी बाँहों में भर लिया।

ऐसे ही दूसरे दिन भी चुदाई की।
पर दोस्त मुझे तुमसे छुपा कर अच्छा नहीं लग रहा इसलिए मैंने ये सब बता दिया।
हम दोनों चुप थे।

उसकी बात सुन कर मुझे लगा कि ना इसमें संजय का दोष है और ना कीर्ति का..
क्योंकि यह सब समय और संयोग के कारण हुआ।
मैं बोला- कोई बात नहीं.. चलता है आखिरकार दोस्त है मेरा तू..

ऐसी बात से मैं उससे दोस्ती तोड़ना नहीं चाहता था.. क्योंकि काम का बंदा
था। एक तो पैसे वाला और जान-पहचान वाला और मुझसे उसने सच्ची दोस्ती की
थी.. इसलिए तो उसने मुझे सब सच बताया।
मैं भी ऐसा सच्चा दोस्त भी खोना नहीं चाहता था।

संजय- तुम मुझ पर गुस्सा नहीं हो?
मैं- था.. जब तुमने कहा कि संबध बनाए.. फिर इसके पीछे का कारण सुन कर
बिल्कुल नहीं लगा कि तुम दोनों में से किसी का दोष था।
संजय मुझसे ‘सॉरी’ बोल कर मुझसे लिपट गया।