एक अनोखा बंधन

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The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 16:41

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अब आगे....

बच्चे तो सब सो चुके थे... बड़के दादा (बड़े चाचा) और पिताजी की चारपाई पास-पास थी और दोनों के खर्रांटें चालु थे| गट्टू भी गधे बचके सो रहा था...माँ अभी जाग रही थी और बड़की अम्मा (बड़ी चाची) जी से लेटे-लेटे बात कर रही थी मैंने अनुमान लगाया की ज्यादा से ज्यादा एक घंटे में दोनों अवश्य सो जाएँगी|| रसिका भाभी सो चुकी थीं और अजय भैया भी झपकी ले रहे थे….चन्दर भैया भी चारपाई पे पड़े ऊंघ रहे थे....| आखिर मैं अपने बिस्तर पे आके पुनः लेट गया... और भाभी की प्रतीक्षा करने लगा| अब बस इन्तेजार था की कब भाभी आये और अपनी प्यारी जुबान से मेरे कानों में फुसफुसाए की मानु चलो!!! इन्तेजार करते-करते डेढ़ घंटा हो गया... मैं आँखें मूंदें करवटें बदल रहा था.... तभी भाभी की फुसफुसाती आवाज मेरे कानों में पड़ी:

भाभी: मानु... सो गए क्या?

मैं: नहीं तो... आजकी रात सोने के लिए थोड़े ही है...

ये सुन भाभी ने एक कटीली मुस्कान दी|

मैं: बाकी सब सो गए ?

भाभी: हाँ ... शायद...

मैं: डर लग रहा है?

भाभी: हाँ...

मैं: घबराओ मत मैं हूँ ना...
इतना कहते हुए मैंने भाभी के हाथ को थोड़ा दबा दिया|

तभी अचानक किसी के झगड़ने की आवाज आने लगी| ये आवाज सुन हम दोनों चौंक गए.. भाभी को तो ये डर सताने लगा की कोई हम दोनों को साथ देख लेगा तो क्या सोचेगा और मैं मन ही मन कोस रहा था की मेरी योजना पे किस जादे ने ठंडा पानी डाल दिया?

शोर सुन सभी उठ चुके थे... बच्चे तक उठ के बैठ गए थे| मैं और भाभी भी अब शोर आने वाली जगह की तरफ चल दिए| वो शोर और किसी का नहीं बल्कि अजय भैया और रसिका भाभी का था| पता नहीं दोनों किस बात पे इतने जोर-जोर से झगड़ रह थे... अजय भैया बड़ी जोर-जोर से रसिका भाभी को गलियां दे रहे थे और लट्ठ से पीटने वाले थे की तभी मेरे पिताजी और बड़के दादा ने उन्हें रोक लिया... और समझने लगे| शोर सुन वरुण ने रोना चालु कर दिया था... मैंने तुरंत भाग के वरुण को गोद में उठाया और साथ ही बच्चों को अपने साथ रेल बनाते हुए दूर ले गया ताकि वो इतनी गन्दी गलियां न उन पाएँ| इशारे से मैंने भाभी को भी अपने पास बुला लिया...

मैंने सोहा शायद भाभी को पता होगा की आखिर दोनों क्यों लड़ रहे होंगे... पर उनके चेहरे के हाव-भाव कुछ अलग ही थे|

भाभी: मानु तुम यहाँ अकेले में इन बच्चों के साथ क्यों खड़े हो?

मैं: भौजी अपने नहीं देखा दोनों कितनी गन्दी-गन्दी गलियां दे रहे हैं... बच्चे क्या सीखेंगे इन से?

भाभी: मानु.. ये तो रोज की बात है| इनकी गलियां तो अब गांव का बच्चा-बच्चा रट चूका है|

मैं: हे भगवान... !!!

भाभी का मुंह बना हुआ था.. और मैं जनता था की वो क्यों उदास है| मैंने उन्हें सांत्वना देने के लिए अपने पास बुलाया और उनके कान में कहा:

भौजी आप चिंता क्यों करते हो... कल सारा दिन है अपने पास...और रात भी....

भाभी: मानु रात तो तुम भूल जाओ!!!

उनकी बात में जो गुस्सा था उसे सुन मैं हँस पड़ा... और मेरी हंसी से भाभी नाराज होक चली गई और मैं पीछे से उन्हें आवाज देता रह गया| सच बताऊँ मित्रों तो मुझे भी उतना ही दुःख था जितना भाभी को था बस मैं उस दुःख को जाहिर कर अपना और भाभी का मूड ख़राब नहीं करना चाहता था|

खेर मामला सुलझा.. सुबह हो गई... और एक नई मुसीबत मेरे सामने थी| पिताजी और माँ बाजार जाना चाहते थे.. और मजबूरी में मुझे भी जाना था|

मन मसोस कर मैं चल पड़ा... बाजार से माँ और पिताजी खरीदारी कर रहे थे... पर मेरी शकल पे तो बारह बजे थे| पिताजी को आखिर गुस्सा तो आना ही था..

पिताजी: मुँह क्यों उतरा हुआ है तेरा?

मैं: वो गर्मी बहुत है... थकावट हो रही है... घर चलते हैं|

पिताजी: घर? अभी तो कुछ खरीदा ही नहीं...??? और अगर तुझे घर पे ही रहना था तो आया क्यों साथ?

माँ: अरे छोडो न इसे... इसका मूड ही ऐसा है, एक पल में इतना खुश होता है की मनो हवा में उड़ रहा हो और कभी ऐसे मायूस हो जाता है जैसे किसी का मातम मन रहा हो|

मेरे पास माँ की बातों का कोई जवाब नहीं था... इसलिए मैं चुप रहा... माँ और पिताजी दूकान में साड़ियां देखने में व्यस्त थे... एक बार मन तो हुआ की क्यों न भाभी के लिए एक साडी ले लूँ... पर जब जेब का ख्याल आया तो ... मन उदास हो गया| जेब में एक ढेला तक नहीं था... पिताजी मुझे पैसे नहीं देते थे.. उनका मानना था की इससे से मैं बिगड़ जाऊंगा! मैं बैठे-बैठे ऊब रहा था.. इससे निकलने का एक रास्ता दिमाग में आया| मैंने सोचा क्यों न मैं अपने दिमाग के प्रोजेक्टर में अभी तक की सभी सुखद घटनाओं की रील को फिर से चलाऊँ? इसलिए मैं ध्यान लगते हुए सभी अनुभवों को फिर से जीने लगा... पता नहीं क्यों पर अचानक से दिमाग में कुछ पुरानी बातें आने लगीं|

मित्रों मैंने आपको अपने गुजरात वाले भैया के बारे में बताया था ना... अचानक उनकी बात फिर से दिमाग में गुजने लगी... "मानु अब तुम बड़े हो गए हो ... मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ| जिंदगी में ऐसे बहुत से क्षण आते हैं जब मनुष्य गलत फैसले लेता है| वो ऐसी रह चुनता है जिसके बारे में वो जानता है की उसे बुराई की और ले जायेगी| तुम ऐसी बुराई से दूर रहना क्योंकि बुराई एक ऐसा दलदल है जिस में जो भी गिरता है वो फंस के रह जाता है|"

तो क्या अब तक जो भी कुछ हुआ वो अपराध है? परन्तु भाभी तो मुझ से प्यार करती है... क्या मैं भी उन्हें प्यार करता हूँ?

मित्रों इन बातों ने मुझे झिंझोङ के रख दिया... मुझे अपने आप से घृणा होने लगी.. की कैसे देवर हूँ मैं जो अपनी भाभी का गलत फायदा उठाना चाहता है| मुझे तो चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए... सच में मुझे इतनी घृणा कभी नहीं हुई जितना उस समय हो रही थी... अंदर से मैं टूट चूका था!!! मन कह रहा था की ये प्यार है और तुझे ये काबुल कर लेना चाहिए... तुझे भाभी से ये कहना होगा की तू उनसे बहुत प्यार करता hai

मैंने निर्णय किया की मैं भाभी से अपने प्यार का इजहार करूँगा....और अब कोई भी गलत बात या कोई गन्दी हरकत नहीं करूँगा भाभी के साथ| मेरा मुंह बिलकुल उत्तर गया था.. मन में मायूसी के बदल छाय हुए थे और मैं बस जल्दी से जल्दी भाभी से ये बात कहना चाहता था|

उधर पिताजी के सब्र का बांध टूट रहा था, उन्हें मेरा मायूस चेहरा देख के अत्यधिक क्रोध आ रहा था| उन्होंने माँ से कहा की जल्दी से साडी खरीदो मैं अब इस लड़के का उदास चेहरा नहीं देखना चाहता..

खेर हम घर के लिए निकल पड़े और रास्ते भर पिताजी मुझे डांटते रहे.. परन्तु मैंने उनकी बातों को अनसुनी कर दिया... और सारे रास्ते मैं भाभी से क्या कहना है उसके लिए सही शब्दों का चयन करने लगा| मुझे लगा की मैं भाभी से ये प्यार वाली बात कभी नहीं कह पाउँगा....

दोपहर के भोजन का समय था.... मैं. पिताजी और माँ बड़े घर पहुँच कर अपने-अपने कपडे बदल रहे थे| गर्मी के कारन पिताजी स्नान कर रसोई की ओर चल दिए ओर माँ को कह गए की इसे भी कह दो खाना खा ले| तभी भाभी मेरे ओर माँ के लिए खाना परोस के ले आई... भाभी को देखते ही मेरा गाला भर आया... ओर ना जाने क्यों मैं उनसे नजर नहीं मिला पा रहा था... भाभी ने माँ को खाना परोसा ओर मुझे भी खाना खाने के लिए कहा| मेरे मुख से शब्द नहीं निकले.. क्योंकि मैं जानता था की अगर मैंने कुछ भी बोलने की कोशिश की तो मैं आपने को काबू में नहीं रख पाउँगा ओर रो पड़ूँगा| मैंने केवल ना में गर्दन हिला दी... मेरा जवाब सुन भाभी के मुख पे चिंता के भाव थे... उन्होंने धीमी आवाज में कहा:

"मानु अगर तुम खाना नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊँगी ..."

मैं उसी क्षण उनसे अपने दिल की बात कहना चाहता था परन्तु हिम्मत नहीं जुटा पाया और वहाँ से छत की ओर भाग गया| छत पे चिल-चिलाती हुई धुप थी... भाभी नीचे से ही आवाज देने लगी...और साथ-साथ माँ ने भी चिंता जताई और नीचे से ही मुझे बुलाने लगी| मैं छत पे एक कोने पे खड़ा हो के अपने अंदर उठ रहे तूफ़ान पर काबू पा रहा था... मेरी आँखों से कुछ आंसूं छलक आये| मैं अपनी आँख पोछते हुए पीछे घुमा तो भाभी कड़ी हुई मुझे देख रही थी... उन्होंने कुछ कहा नहीं और ना ही मैंने कुछ कहा.. मैं बस नीचे भाग आया| चुप चाप बैठ के भोजन करने लगा... माँ ने इस अजीब बर्ताव का कारन पूछा परनतु मैंने कोई जवाब नहीं दिया| भाभी भी नीचे आ चुकी थी.. और माँ का खाना खा चुकी थी और थाली ले कर रसोई की ओर जा रही थी तो भाभी ने उन्हें रोका और मेरे बर्ताव का कारन पूछने लगीं:

भाभी: चाची क्या हुआ मानु को? चाचा ने डांटा क्या?

माँ: अरे नहीं बहु.. पता नहीं क्या हुआ है इसे.. सारा रास्ता ऐसे ही मुंह लटका के बौठा था| जब पूछा तो कहने लगा की गर्मी बहुत है... सर दर्द हो रहा है .. ऐसा कहता है| भगवान जाने इसे क्या हुआ है?

भाभी: आप थाली मुझे दो मैं तेल लगा देती हूँ... सर का दर्द ठीक हो जायेगा|

उधर मेरा भी खाना खत्म हो चूका था और मैं अपनी थाली ले कर जा रहा था.. भाभी ने मुझे रोका और बिना कुछ कहे मेरी थाली ले कर चली गई| उधर माँ भी भोजन के बाद टहलने के लिए बहार चली गईं| अब केवल मैं ही उस घर में अकेला रह गया था ... मैंने सोचा मौका अच्छा है.. भाभी से अपने दिल की बात करने का... पर मैं ये बात कहूँ कैसे?

पांच मिनट के भीतर ही भाभी नवरतन तेल ले कर आगईं.. उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे चार पाई पर बैठाया और कहा:

भाभी: मानु मैं जानती हूँ की तुम क्यों उदास हो.. सच बताऊँ तो मेरा भी यही हाल है| तुम मायूस मत हो.. कल हम कैसे न कैसे कर के सब कुछ निपटा लेंगे|

मैं कुछ भी बोलने की हालत में नहीं था... गाला सुख गया था... आँखों में आंसूं छलक आये और तभी मैंने वो किया जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी....


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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 16:42

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अब आगे....

मैं जानता था की भाभी की आँखों में आँखें डाल के मैं अपने प्यार का इजहार उनसे कभी नहीं कर पाउँगा| इसीलिए मैंने अपनी आँखें बंद की और एक झटके में भाभी से सब कह देना चाहता था... परन्तु शब्द ही नहीं मिल रहे थे.... मन अंदर से कचोट रहा था... एक अजीब सी तड़पन महसूस हो रही थी... मैं उन्हें कहना चाहता था की अभी तक जो भी हमारे बीच हुआ वो मेरे लिए सिर्फ और सिर्फ एक उत्साह था... परन्तु अब एक चुम्बकीये शक्ति मुझे भाभी की और खींच रही थी.. और वो शक्ति इतनी ताकतवर थी की वो हम दोनों को मिला देना चाहती थी| दो जिस्म एक जान में बदल देना चाहती थी....

भाभी ने मेरी हालत का कोई और ही अर्थ निकला... उन्हें लगा जैसे मैं वासना के आगे विवश होता जा रहा हूँ और वो मुझे हिम्मत बंधाने लगीं:

भाभी: मानु मैं जानती हूँ तुम्हें बहुत बुरा लग रहा है... पर अब किया भी गया जा सकता है? कैसे भी करके आज का दिन सब्र कर लो... कल……….


मैंने आँखें खोली…. मैं कुछ बोल तो नहीं पाया बस गर्दन ना में हिला के उन्हें बताने की कोशिश करने लगा की आप मुझे गलत समझ रहे हो... पता नहीं की भाभी समझीं भी या नहीं|

मैंने भाभी के होंठों पे अपना हाथ रख उन्हें आगे बोलने से रोक दिया... क्योंकि वो मेरी भावनाओं का गलत अर्थ निकाल रही थीं और मैं बहुत ही शर्मिंदा महसूस कर रहा था|मैं भाभी की ओर बढ़ा और उनके होंठों पे अपने होंठ रख दिए... मैं तो जैसे उन्हें बस चुप कराना चाहता था... परन्तु खुद पे काबू नहीं रख पाया और अपनी द्वारा तय की हुई सीमा तोड़ दी| मैंने अपने दोनों हाथों से उनके मुख को पकड़ लिया... और मैं बिना रुके उनके होंठों पे हमला करता रहा... मैं कभी उनके नीचले होंठ को अपने मुख में भर चूसता... तो कभी उनके ऊपर के होंठ को| आज नाजाने क्यों मुझे उनके होंठों से एक भीनी-भीनी सी खुशबु मुझे उनकी तरफ खींचे जा रही थी और मैं मदहोश होता जा रहा था... पहली बार मैं कोई काम बिना किसी रणनीति के कर रहा था... आज मैंने पहली बार अपनी जीभ उनके मुख में डाली... इस हमले से भाभी थोड़ा चकित रह गई पर इस बार उन्होंने भी पलट वार करते हुए मेरी जीभ अपने दातों के बीच जकड ली! और उसे चूसने लगीं.... मेरे मुंह से

"म्म्म्म...हम्म्म" की आवाज निकल पड़ी|

भाभी जिस तरह से मेरा साथ दे रही थी उससे लग रहा था की अब उनसे भी खुद पे काबू रखना मुश्किल हो रहा है| अचानक मेरे दिमाग ने मुझे सन्देश भेजा की मेरे पास ज्यादा समय नहीं है... मुझे जल्दी से जल्दी सब करना होगा| इसलिए मैंने भाभी के जीभ से मेरे मुख के भीतर हो रहे प्रहारों को रोक दिया और मैंने तुरंत ही दरवाजा बंद इया और वापस आ के भाभी को अशोक भैया के कमरे के पास कोने पे खड़ा किया और मैं नीचे अपने घुटनों के बल बैठ गया| मेरे अंदर भाभी की योनि देखने की तीव्र इच्छा होने लगी और मैंने भाभी की साडी उठा दी... मैं देख के हैरान था की भाभी ने नीचे पैंटी नहीं पहनी थी!!! मैंने आज पहली बार एक योनि देखि थी इसलिए मैं उत्साह से भर गया... और मैंने बिना देर किये उनकी योनि को अपनी जीभ से छुआ.. भाभी एक डैम से सिहर उठीं...

भाभी का योनि द्वार बंद था और जैसे ही मैंने अपनी जीभ से उससे कुरेदा वो तो जैसे उभर के मेरे समक्ष आ गया... उनका क्लीट (भगनासा) लाल रंग से चमकने लगा मैंने भाभी की योनि को थोड़ा और कुरेदा तो मुझे अंदर का गुलाबी हिस्सा दिखाई दिया.. उसे देख के तो जैसे मैं सम्मोहित हो गया| यदि आपने किसी कुत्ते को कटोरे में से पानी पीते देखा हो तो: ठीक उसी प्रकार मेरी जीभ भाभी की योनि से खेल रही थी ... उधर भाभी की सांसें पूरी तेजी से चलने लगीं.. भाभी कसमसा गई और मुझे अपने द्वारा किये प्रहार के लिए प्रोत्साहन देने लगीं.. भाभी की योनि (बुर) से एक तेज सुगंध उठने लगी.. जो मुझे दीवाना बनाने लगी.. अब मैं और देर नहीं करना चाहता था इसलिए मैं वापस खड़ा हो गया...

भाभी: मानु मजा आया?

मैंने केवल गर्दन हां में हिलाई... क्योंकी अब भी मैं बोलने की हालत में नहीं था| मैंने अपनी पेंट की चैन खोली और अपना लंड भाभी के समक्ष प्रस्तुत किया.. मेरा लंड बिलकुल तन चूका था .. ऐसा लगा मानो अभी फूट पड़ेगा| क्योंकि ये मेरा पहला अवसर था इसलिए मैंने भाभी से कहा:

मैं: भाभी इसे सही जगह लगाओ ना.. मुझे लगाना नहीं आता!!!

भाभी इस नादानी भरी बात सुन मुस्कुराई और उन्होंने मेरा लंड हाथ में लिया और मुझे अपने से चिपका लिया|जैसे ही उन्होंने मेरे लंड को अपनी बुर से स्पर्श कराया मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया... भाभी की तो सिसकारी छूट गई:

"स्स्स्स...सीईइइइइ म्म्म्म"

उनकी बुर अंदर से गीली थी और मुझे गर्माहट का एहसास होने लगा| काफी देर से खड़े लंड को जब भाभी के बुर की गरम दीवारों ने जकड़ा तो मेरे लंड को सकून मिला.... भाभी ने मुझे अपने आलिंगन में कैद कर लिया... और मैंने भी भाभी को कास के अपनी बाँहों में भर लिया|मैंने बिना सोचे समझे खड़े-खड़े ही नीचे से झटके मरने शुरू कर दिए... मेरे झटके बिना किसी लय के भाभी की बुर में हमला कर रहे थे... पर भाभी की मुख से सिस्कारियां जारी थी

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स "
और वे मेरे द्वारा दिए गए हर झटके को महसूस कर आनंदित हो रही थी.... अब मेरी भी आहें निकल पड़ीं

"अह्ह्हह्ह्ह्ह......म्म्म्म... अम्म्म्म"

मैंने नीचे से अपना आक्रमण जारी रखा और साथ ही साथ भाभी की गर्दन पे अपने होंठ रख उसे चूसने लगा... भाभी ने अपना एक हाथ मेरे सर पे रख मुझे अपनी गर्दन पे दबाने लगीं| उनका प्रोत्साहन पा मैंने उनकी गर्दन पे अपने दांत गड़ा दिए.. भाभी की चीख निकल पड़ी:

"आअह अह्ह्ह्ह्न्न.. मानु.....स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स"

मैं उनकी गर्दन किसी ड्रैकुला की तरह चूस और चाट रहा था... बस मेरी इच्छा उनका खून पीने की नहीं थी|

अभी केवल दस मिनट ही हुए थे और अब मैं इस सम्भोग को और आगे नहीं ले जा सकता था.. मेरा ज्वालामुखी भाभी के बुर के अंदर ही फूट पड़ा| भाभी को जैसे ही मेरा वीर्य उनकी बुर में महसूस हुआ उन्होंने मेरे लंड को एक झटके में अपने हाथ से पकड़ बहार निकाल दिया... जैसे ही मेरा लंड बहार आया भाभी की बुर से एक गाढ़ा पदार्थ नीचे गिरा और उसके गिरते ही आवाज आई:

"पाच... " ये पदार्थ कुछ और नहीं बल्कि मेरे और भाभी के रसों का मिश्रण था| भाभी निढाल होक मेरे ऊपर गिर पड़ीं| मैंने उन्हें संभाला और उनके होंठों पे चुम्बन किया और उन्हें दिवार दे सहारे खड़ा किया और अपनी जेब से रुमाल निकल के उनके बुर को पोंछा और फिर अपने लें को साफ़ किया| मैंने पास ही पड़े पोंछें से जमीन पे पड़ी उस "खीर" को साफ़ करने लगा जिस पे मक्खियाँ भीं-भिङने लगीं थी|

भाभी अब होश में आ गई थीं और वो स्वयं छलके चारपाई पे बैठ गईं| मैंने हाथ धोये और तुरंत दरवाजा खोल उनके पास खड़ा हो गया... भाभी मेरी ओर बड़े प्यार से देख रही थी .. पर मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रहा था|


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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 16:43

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अब आगे....

जैसे ही मेरा लंड बहार आया भाभी की बुर से एक गाढ़ा पदार्थ नीचे गिरा और उसके गिरते ही आवाज आई:

"पाच... " ये पदार्थ कुछ और नहीं बल्कि मेरे और भाभी के रसों का मिश्रण था| भाभी निढाल होक मेरे ऊपर गिर पड़ीं| मैंने उन्हें संभाला और उनके होंठों पे चुम्बन किया और उन्हें दिवार दे सहारे खड़ा किया और अपनी जेब से रुमाल निकल के उनके बुर को पोंछा और फिर अपने लें को साफ़ किया| मैंने पास ही पड़े पोंछें से जमीन पे पड़ी उस "खीर" को साफ़ करने लगा जिस पे मक्खियाँ भीं-भिङने लगीं थी|

भाभी अब होश में आ गई थीं और वो स्वयं छलके चारपाई पे बैठ गईं| मैंने हाथ धोये और तुरंत दरवाजा खोल उनके पास खड़ा हो गया... भाभी मेरी ओर बड़े प्यार से देख रही थी .. पर मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रहा था|



मेरी मनो दशा मुझे अंदर से झिंझोड़ रही थी... मुझे अपने ऊपर घिन्न आ रही थी... अपने द्वारा हुए इस पाप से मन भारी हो चूका था| मैं भाभी से माफ़ी मांगना चाहता था.. परन्तु इससे पहले मैं कुछ कह पाता, नेहा भाभी को ढूंढती हुई आ गई... जब उसने भाभी से पूछा की वो कहाँ थीं तो उन्होंने मेरी ओर देखते हुए झूठ बोल दिया:

"बेटा मैं ठकुराइन चाची के पास गई थी वहां से अभी- अभी तुम्हारे चाचा के पास आई तो उन्होंने बताया की उनके सर में दर्द हो रहा है.. तो मैं तेल लगाने वाली थी| (भाभी ने तेल की शीशी की ओर इशारा करते हुए कहा)

मैं: नहीं भाभी रहने दो.. मैं थोड़ी देर सो जाता हूँ... आप जाओ खाना खा लो|

भाभी उठीं और चल दी... मैं उन्हें जाते हुए पीछे से देखता रहा| मैं आँगन पमें पड़ी चारपाई पे लेट गया और सोचने लगा...

क्या अभी जो कुछ हुआ वो पाप था?

यदि भाभी गर्भवती हो गई तो? उनका क्या होगा ? और उस बच्चे का क्या होगा?

ये सब सोचते-सोचते सर दर्द करने लगा... मैं निर्णय नहीं ले पा रहा था की मैं क्या करूँ? सर दर्द और पेट भरा होने के कारन आँखें कब बोझिल हो गईं और कब नींद आ गई पता ही नहीं चला| जब आँख खुली तो शाम के सात बज रहे थे, मैं उठा और स्नान घर में जा के स्नान किया... स्नान करते हुए जब ध्यान अपने तने हुए लंड पे गया तो दोपहर की घटना फिर याद आ गई और अपने ऊपर शर्म आने लगी की कैसे देवर हूँ मैं जिसने अपनी ही भाभी को.... छी ..छी..छी... मुझे तो चुल्लू भर पानी में डूब मारना चाहिए| यही कारण था की मैं नहाने के बाद रसोई के आस पास भी नहीं जा रहा था... मैं छत पे आ गया और टहलने लगा... अंदर ही अंदर खुद को कोसते हुए.... मैं छत के एक किनारे खड़ा हो गया और चन्दर भैया के घर की ओर देखते हु सोचने लगा की क्या मुझे भाभी से माफ़ी मांगनी चाहिए?

अभी मैं अपनी इस असमंजस की स्थिति से बहार भी नहीं आया था की नेहा ने मुझे नीचे से आवाज दी:

"चाचू...माँ आपको बुला रही है|"

नेहा की बात सुन के मेरे कान लाल हो गए.. ह्रदय की गति बढ़ गई और दिमाग ने काम करना बंद कर दिया| मन कह रहा था की कहीं भाभी नाराज तो नहीं? या किसी ने भाभी और मुझे वो सब करते देख तो नहीं लिया? या भाभी ने खुद ही ये बात तो सब को नहीं बता दी? इन सवालों ने मेरे क़दमों को जकड लिया की तभी नेहा ने फिर से मुझे पुकारा:

"चाचू..."

मैं: हाँ... मैं आ रहा हूँ|

लड़खड़ाते हुए मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा और रसोई की ओर चल पड़ा... मन में घबराहट थी ओर चेहरा साफ़ बयां कर रहा था की मेरी फ़ट चुकी है| रसोई के पास एक छप्पर था जहाँ घर की औरतें और कभी-कभी मर्द बैठ के बातें वगैरह किया करते थे| जैसे ही मैं छप्पर के नजदीक पहुंचा तो मुझे किसी के खिल-खिला के हंसने की आवाज आई.. ये तो नहीं पता था की वो कौन है पर इस हंसी के कारन मेरे बेकाबू दिल को थोड़ी सांत्वना मिली| बाल-बाल बचे !!!

मैं छप्पर में दाखिल हुआ तो एक चारपाई पर रसिका भाभी और हमारे गाँव का अकड़ू ठाकुर जिस के बारे में मैंने आपको बताया था उसकी बेटी (माधुरी) बैठी थीं और दूसरी चारपाई पर भाभी और नेहा बैठे थे| माहोल देख के लगा जैसे वे सब आपस में कुछ खेल रहे थे और हसीं ठिठोली कर रहे थे... भाभी ने मुझे अपने पास बैठने का इशारा किया .. और मैं उनके पास बैठ गया| दरअसल वे सब एक दूसरे से टीम बना के पहेली पूछने का खेल रहे थे... अब चूँकि भाभी अकेली पड़ रहीं थी इसलिए उन्होंने मुझे बुलाया था|

मैं काफी हैरान था की भाभी के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं और कहाँ मैं शर्म के मारे गड़ा जा रहा था| अब भी मैं भाभी से कोई बात नहीं कर पा रहा था... भाभी ने सब से आँख बचा के मुझे इशारे से पूछा की क्या बात है? पर मैंने इशारे से कहा की कुछ नहीं.... भाभी मुझे सवालिया नजरों से देख रही थी और मैं उनसे नजरें चुरा रहा था| भाभी ने माहोल को थोड़ा हल्का करने के लिए मुझसे साधारण बात शुरू की :

भाभी: मानु.. अब सर दर्द कैसा है?

मैं: जी.. अब ठीक है|

(मेरे इस फॉर्मल तरीके से भाभी कुछ परेशान दिखी उहें लगा की मैं उनसे नाराज हूँ|)

भाभी: अच्छा मानु हम यहाँ पहेली बुझने वाला खेल खेल रहे हैं और तुम मेरे पक्ष में हो|

मैं: पर भाभी आपतो जानते ही हो की मुझे भोजपुरी नहीं आती .. तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पाउँगा|
मेरे मुख से "भाभी" सुन भाभी ने मुझे अपना झूठा गुस्सा दिखाया क्योंकि भाभी को हमेशा "भौजी" ही कहता था और सिवाय उनके मैंने "भौजी" शब्द किसी और के लिए कभी भी इस्तेमाल नहीं किया था किसका उनको गर्व था|

भाभी: तो क्या हुआ??? तुम मेरे पास तो बैठ ही सकते हो ?

मैं: ठीक है...

दरअसल उत्तर प्रदेश का होने के बावजूद मुझे अभी तक भोजपुरी भाषा नहीं आती... मैंने आज तक किसी से भी भोजपुरी में बात नहीं की.. या तो अंग्रेजी अथवा हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया| अब जब भोजपुरी ही नहीं आती तो भोजपुरी की पहेलियाँ कैसे बुझूंगा|
उनका खेल चल रहा था ... परन्तु मैंने एक बात गौर की... माधुरी मुझे देख के कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रही थी... और ये बात भाभी ने भी गौर की परन्तु मुझसे अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा| खेल जल्द ही समाप्त हो गया और भाभी हार गईं... उनकी हार का अफ़सोस तो मुझे था ही पर साथ-साथ उनकी मदद न कर पाने का दुःख भी| जाते-जाते माधुरी मुझे "गुड नाईट" कह गई और मैंने भी उसकी बात का जवाब "गुड नाईट" से दिया... भाभी तो जैसे जल भून गई होगी... खेर उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा और इस कड़वी बात को पी के रह गई|

तकरीबन एक घंटे बाद बच्चे खाना खा के उठ चुके थे और अब घर के बड़े खाना खाने जा रहे थे... मैं भी खाना खाने जा ही रहा था की भाभी ने मुझे इशारे से रोक दिया, और कहा:

"मानु .. जरा मेरी मदद कर दो .. ये भूसा बैलों को डालने में ..."

चन्दर भैया: तू खुद नहीं दाल सकती.. मानु भैया को खाना खाने दे..

मैं: अरे कोई बात नहीं भैया... आज पहली बार तो भाभी ने मुझे कुछ काम बोला है...

मेरी बात सुन सब हंस पड़े और मैं भी झूठी हंसी हंस दिया…
भाभी और मैं भूसा रखने के कमरे की और चल दिए... अंदर पहुँच के भाभी ने मुझे कास के गले लगा लिया... उनकी इस प्रतिक्रिया से मैं पिघल गया और आखिर कार अपने चुप्पी तोड़ डाली:

मैं: आज दोपहर जो भी हुआ उसके लिए....आप मुझे माफ़ कर दो| साड़ी गलती मेरी है.. मुझे आपसे वो सब नहीं करना चाहिए था.. दरअसल मैं आपसे कुछ और कहना चाहता था.... मैं आपसे आई लव यू कहना चाहता था पर बोल नहीं पाया और आप मेरी चुप्पी का गलत मतलब समझ रहे थे... प्लीज मुझे माफ़ कर दो !!!

भाभी: अब मैं समझी की तुम मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे थे.... पर तुम माफ़ी किस लिए मांग रहे हो.. जो कुछ भी हुआ उसमें मेरी रजामंदी भी शामिल थी... अगर कोई कसूरवार है तो वो मेरी हैं... मैं तुम्हें बता नहीं सकती की तुम ने जो आज मुझे शारीरिक सुख दिया है उसके लिए मैं कितने सालों से तड़प रही थी| तुमने मुझे आज तृप्त कर दिया...

उनकी बात सुन के मेरे पाँव तले जमीन खिसक गई...मुझे उनसे इस जवाब की उम्मीद कतई नहीं थी| मेरी आँखें आस्चर्य से फ़ट गई ...

मैं: सच भौजी ....

भाभी: तुम्हारी कसम मानु... मैंने तुम्हारे भैया को भी खुद को छूने का अधिकार नहीं दिया और न ही कभी दूँगी| तुम ही मेरे पति हो !!!

मैं: पर भौजी आप ऐसा क्यों कह रही हो? चन्दर भैया... नेहा .. ये ही आपका परिवार है| मुझ दुःख इस बात का था की मैं आपके पारिवारिक जिंदगी में दखलंदाजी कर रहा हूँ .... और न केवल दखलंदाजी बल्कि मैं आपकी पारिवारिक जिंदगी तबाह कर रहा हूँ| इसी बात पे मुझे शर्म आ रही थी... और मैं आपसे नज़र चुरा रहा था|

भाभी: मानु तुम अभी बहुत सी बातें नहीं जानते... अगर जानते तो मेरी बात समझ सकते|

मैं: तो बताओ मुझे?

भाभी: अभी नहीं ....

मैंने गोर किया की भाभी की आँखें नाम हो चलीं थी... इसलिए मैंने उन्हें अपने पास खींचा और उन्हें जोर से गले लगा लिया| जैसे मैं भाभी को अपने अंदर समां लेना चाहता था मेरी छाती स्पर्श पाते ही भाभी के अंदर उठा तूफान शांत हुआ|
हम दोनों शाहरुख़ खान की फिल्म के किसी सीने की तरह खड़े हुए थे | भाभी मेरी और देख रही थी.. और मैं उनकों सांत्वना देना चाहता था.. इसलिए मैंने भाभी के होंठों को अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया परन्तु इस बार मन में वासना नहीं थी.. मैं उनका दुःख कम करना चाहता था|

दिमाग ने मन को संदेसा भेजा की अब यहाँ ज्यादा देर रुकना खतरे से खाली नहीं! इसलिए मैंने भाभी से आखरी शब्द कहे:

मैं: भौजी अब हमें चलना चाहिए .. नहीं तो लोग शक करेंगे की ये दोनों इतनी देर से भूसे के कमरे में क्या कर रहे हैं?

भाभी ने बस हाँ में गर्दन हिला दी| मुझे कहीं न कहीं ऐसा लग रहा था की भाभी मुझ से नाराज है इसलिए मैंने अपने मन की तसल्ली के लिए उनसे पूछा:

मैं: भौजी आप मुझसे नाराज तो नहीं ?

भाभी: नहीं तो .. तुम्हें ऐसा क्यों लगा?
भाभी ने पास ही पड़ी भूसे से भरी टोकरी उठाने झुकीं... परन्तु मैंने उनके हाथ से टोकरी छीन ली|

मैं: क्योंकि आप एक डैम से चुप हो गए...

मेरी इस बात का जवाब उन्होंने अपने ही अंदाज में दिया जिसने मेरे लंड में तनाव पैदा कर दिया| भाभी मेरी ओर बढ़ीं और मेरे गलों को अपने होंठों में भर लिया और उन्हें धीरे-धीरे दांत से काटने लगीं| मेरे शरीर में जैसे करंट दौड़ गया पर करता क्या.. सर पे टोकरी थी जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से पकड़ा हुआ था| भाभी ने मेरी इस हालत का भरपूर फायदा उठाया और दो मिनट बाद जब उनका मन भर गया तब वो हटीं और उनके मादक रास को मेरे गलों से पोंछने लगीं|

मैं: भाभी बहुत सही फायदा उठाया आपने मेरी इस हालत का?

भाभी: ही.. ही.. ही...

मैं वो टोकरी उठा के बैलों के पास आया और उन्हें चारा डाल दिया| अब मन पहले से शांत था पर लंड में तनाव था जिसे छुपाना मुश्किल हो रहा था इसलिए मैंने सोचा की क्यों न स्नान कर लिया जाए|

गर्मियों के दिनों में, चांदनी रात में ठन्डे पानी से खुले आसमान के तले नहाने में क्या मजा आता है, ये मैं आपको नहीं बता सकता| इस स्नान ने मेरे अंदर की वासना की ज्वाला को बुझा दिया था परन्तु मन ही मन भाभी की बातें मुझे तड़पाने लगीं थी| आखिर उन्होंने मुझे अपने पति का दर्ज क्यों दिया? कोई भी स्त्री यूँ ही किसी को अपने पति का दर्जा नहीं देती! कहीं ये उनका मेरे प्रति आकर्षण तो नहीं? क्या बात है जो भाभी मुझसे छुपा रही हैं? मैं इन सभी बातों का जवाब भाभी से चाहता था...

खेर मैं स्नान करके कुरता पजामा पहन के तैयार हो गया .. और रसोई की और चल दिया| अब तक घर के सभी पुरुष भोजन कर चुके थे केवल स्त्रियां ही रह गईं थी| जैसे ही भाभी ने मुझे देखा उन्होंने मुझे छापर में ही बैठने को कहा, उनकी बात भला मैं कैसे टाल सकता था| मैं छापर में बिछे तखत पे आलथी-पालथी मार के भोजन के लिए बैठ गया उस समय छप्पर में कोई नहीं था... बड़की अम्मा (बड़ी चाची), माँ और रसिका भाभी सब बहार हाथ-मुँह धो रहे थे| भाभी एक थाली में भोजन ले के आई:

भाभी: मानु तुम भोजन शुरू करो मैं अभी आती हूँ|

मैं: आप मेरे साथ ही भोजन करोगी?

भाभी: क्यों? मैं तुम्हारे हिस्से का भी खा जाती हूँ इसलिए पूछ रहे हो?

मैं: नहीं दरअसल अभी बड़की अम्मा (बड़ी चाची) और रसिका भाभी भी तो भोजन खाएंगे.. और उनके सामने आप मेरे साथ कैसे भोजन कर सकते हो?

भाभी: अरे वाह... बड़ी चिंता होने लगी तुम्हें मेरी? चिंता मत करो... फंसऊँगी तो मैं तुम्हे ही !!!

मैं: ठीक है भौजी आप आ जाओ फिर दोनों एक साथ शुरू करेंगे|

तभी माँ, बड़की अम्मा और रसिका भाभी आ गए और अपनी-अपनी जगह भोजन के लिए बैठ गए| भाभी ने सब को भोजन परोसा और फिर मेरे पास आके तखत पे बैठ गईं और हम दोनों ने भोजन आरम्भ किया| ना जाने क्यों पर रसिका भाभी से ये सब देखा नहीं गया और उन्होंने हमें टोका:

रसिका भाभी: क्या बात है देवर-भाभी एक साथ, एक ही थाली में भोजन कर रहे हैं?

मैं: भाभी आपके आने से पहले जब मैं छोटा था तब भी हम एक साथ ही खाना खाते थे आप बड़की अम्मा से पूछ लो|

रसिका भाभी: तब तो तुम छोटे थे, अब शादी लायक हो गए हो| अब तो भाभी का पल्लू छोडो... ही ही ही ही

रसिका भाभी की जलन साफ़ दिख रही थी| मं कुछ बोलने वाला था की भाभी ने मुझे रोक दिया और खुद बीच-बचाव के लिए कूद पड़ीं|

भाभी: अभी मानु की उम्र ही क्या है, अभी ये पढ़ रहा है.. और जब तक ये अपने पाँव पे खड़ा नहीं होता ये शादी नहीं करेगा, है ना चाची?

माँ: बिलकुल सही कहा बहु| ये यहाँ के बच्चों की तरह थोड़े ही है जो मूँछ के बाल आये नहीं और शादी कर दी! और जहाँ तक इन दोनों के साथ खाना खाने की बात है तो बहु तुम इन दोनों को नहीं जानती, इसने तो अपनी भाभी का दूध भी पिया है| तुम्हें आये तो अभी कुछ समय हुआ है पर इनकी ओस्टि तो बहुत पुरानी है|

माँ की बात सुन रसिका भाभी का मुँह खुला का खुला रह गया| माँ ने जब दूध पीने की बात की तब मैंने अपना मुख शर्म के मारे दूसरी तरफ घुमा लिया था ताकि किसी को शक ना हो|

माँ की बात सुन बड़की अम्मा (बड़ी चाची) ने भी हाँ में हाँ मिलायी और अपनी थाली ले कर उठ खड़ी हुईं और साथ ही साथ रसिका भाभी भी खड़ी हो के थाली रखने चल दीं| मैं और भाभी चुप-चाप, धीरे-धीरे भोजन कर रहे थे.... जब माँ अपनी थाली लेके उठीं तब मैंने भाभी से कहा:

मैं: भौजी मुझे आप से कुछ बात करनी है?

भाभी: हाँ बोलो?

मैं: यहाँ नहीं... अकेले में...

भाभी: ठीक है तुम हाथ-मुँह धोके अपनी चारपाई पर लेटो मैं अभी थाली रख के आती हूँ|

मैं: नहीं भाभी ... उसमें थोड़ा खतरा है| चन्दर भैया कहाँ सोये हैं?

भाभी: वो आज चाचा (मेरे पिताजी) के साथ छत पे सोये हैं और तुम्हें भी वहीँ सोने को कहा है|

मैं: पर मैं वहां नहीं सोनेवाला .. आप ऐसा करो की हाथ-मुँह धो के अपने कमरे में जाओ| जब आपको लगे की सब सो गए हैं तब मुझे उठाना|