एक अनोखा बंधन

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The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:13

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अब आगे...

अनिल: वैसे जीजा जी, कुछ तो बात है आप में| आपने तो जैसे जीजी पर जादू कर दिया है| पिछली बार जब मैं आया था तब आप नहीं थे ... बाजार गए थे| जीजी ने आपकी ख़ुशी के लिए शादी अटेंड करने से मना कर दिया| और आज मैंने कितनी मिन्नत की... जीजा जी (चन्दर भैया) ने भी कहा, पिताजी ने भी स्पेशल बुलावा भेजा पर ना ... जीजी ने साफ़ मना कर दिया आने से| पर पता नहीं आपने पाँच मिनट में ऐसा क्या कहा की जीजी झट से तैयार हो गईं? यहाँ तक की नेहा भी ... पहले मेरे पास आ जाती थी पर आज जब से आया हूँ मेरे पास भटकती भी नहीं| तबसे देख रहा हूँ आपसे चिपकी हुई है| बताइये ना क्या जादू किया आपने?

मैं: यार... कोई जादू नहीं है बस "प्यार है" ... (अब ये मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, अब बात संभालने के लिए मैंने आगे नेहा का नाम जोड़ दिया|) नेहा का मुझसे जो वो मेरे बिना नहीं रहती| मेरे साथ खेलती है, मेरे साथ खाती है, मेरे साथ सोती है और आजकल तो होमवर्क भी मेरे साथ करती है| और रही बात आपकी जीजी की तो हमारी अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी है| ये मेरी बात झट से समझ जाती हैं|

भौजी ये सुन के मुस्कुरा दीं और मेरी बातों में और बात जोड़ दी;

भौजी: हाँ, इनका समझाने का तरीका जरा हटके है!!! बड़े प्यार से समझते हैं....

मैं जानता था की अनिल इतना बेवकूफ नहीं है जो हमारे बीच में क्या चल रहा है वो समझ ना पाये इसलिए मैंने भौजी की आत को अलग ही अर्थ दे दिया;

मैं: यार अब आप मेरी टांग मत खींचो! अनिल यार तुम नहीं जानते ये मुझे इतना तंग करती हैं... मेरी हर बात पे टांग खींचती हैं और जो तुम कह रहे हो ना की ये मेरी हर बात मानती हैं, ऐसा कुछ भी नहीं है| सौ में से निन्यानवे बातें तो ये कभी नहीं मानती! पिछली बार इन्होने मेरे जिससे के डर से मना कर दिया था| आज से कुछ साल पहले की बात है, तब मैं amature था, तब ऐसे ही एक दीं सुबह तुम आये थे इन्हें लेने, तब आपके घर में हवन था| ये मुझे कह गईं की मैं जल्दी वापस आउंगी| अब इनके अलावा तो मेरा कोई दोस्त है नहीं| मैं इनका इन्तेजार करता रहा की ये आज आएँगी.. कल आएँगी.. पर ना जी ना इन्होने तो वापस ना आने की कसम खा ली| इसी गुस्से में मैं तब वापस चला गया था, अब आज तुम फिर आये तो इन्हें डर लगा की मैं फिर से रूठ के वापस ना चला जाऊँ इसलिए मना कर रहीं थी| जब मैंने इन्हें भरोसा दिलाया की मैं नहीं जाऊँगा तब जा के मानी हैं|

अनिल: अच्छा तो ये बात है!

मैं: (भौजी को छेड़ते हुए) वैसे मैंने कोई गारंटी नहीं दी की मैं इनके वापस आने तक रहूँगा?

भौजी का मुंह उतर गया...

मैं: बाबा मैं मजाक कर रहा था, I Promise मैं कहीं नहीं जाऊँगा|

ये सुन के उनका मूड कुछ ठीक हुआ पर ऐसा लगा जैसे उन्हें तसल्ली नहीं हुई... भौजी ने सामान पैक कर लिया था और वो निकलने के लिए तैयार थीं| मैं खड़ा हुआ और अनिल भी, अचानक भौजी मेरे पास आईं और उन्होंने मुझे गले लगा लिया|

मैं: यार कुछ दिनों की ही तो बात है... क्यों भई अनिल ज्यादा से ज्यादा तीन दिन ना?

अनिल: जी जीजा जी| जीजी आप चिंता ना करो मैं आपको तीन दिन बाद छोड़ जाऊँगा|

भौजी: तीन दिन बाद नहीं तीसरे दिन ही वापस आना है मुझे|

अनिल: हाँ वही मतलब मेरा|

हम कुछ इस प्रकार खड़े थे की भौजी की पीठ अनिल की ओर थी ओर वो मुझसे अब तक गले लगी हुईं थी| भौजी ने अचानक मेरा दाहिना हाथ पकड़के अपने पेट पे रखा ओर मेरे कान में खुसफुसाई;

भौजी: खाओ अपने बच्चे की कसम की आप मुझे बिना मिले नहीं जाओगे?

मैं: कसम खाता हूँ की जब तक आप नहीं आओगे मैं कहीं नहीं जाऊँगा|

तबजाके भौजी को तसल्ली हुई और हम अलग हुए| हम बहार निकले, आगे-आगे अनिल था ओर उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था, उसके पीछे भौजी और पीछे मैं और मेरी गोद में नेहा| घरवाले भौजी को तैयार देख हैरान हुए और सब की नजर एक साथ मेरी ओर ठहर गई|

बड़के दादा: अच्छा हुआ भौ जो तुम जाने के लिए मान गई|

अनिल: जी ये सब तो जीजा जी (मेरी ओर इशारा करते हुए) का कमाल है!

बड़के दादा: मैं जानता था की मानु ही तुम्हें मना सकता है| खेर समधी जो को मेरा राम-राम कहना|

मैं भौजी और अनिल को छोड़ने के लिए चौक तक चल दिया| जब हम चौक पहुंचे तो नेहा मेरी गोद से उतरने का नाम नहीं ले रही थी| वो तो मुझसे लिपट गई और ना ही भौजी की गोद में जा रही थी और ना ही अपने मामा की गोद में|

मैं: क्या हुआ बेटा? नानू के घर नहीं जाना?

नेहा: नहीं

मैं: बेटा ऐसा नहीं कहते| देखो नानू आपका इन्तेजार कर रहे हैं, उनके पास बहुत अच्छी-अच्छी मिठाइयां है, खिलोने हैं ... (मैं अपनी तरफ से नेहा को हर प्रलोभन दे रहा था की वो मान जाए पर ना|)

नेहा: आप भी चलो !

मैं: बेटा मैं नहीं आ सकता ... मुझे घर में काफी काम है|

नेहा: नहीं पा...

इससे पहले की वो आगे कुछ बोले मैं नेहा को गोद में लिए पाँच कदम दूर हुआ और उसके कान में बोला;

मैं: बेटा जिद्द नहीं करते ... देखो तीन दिन बाद हम फिर मिलेंगे और मैं आपको आपकी मनपसंद चीज खिलाऊँगा|

नेहा: नहीं पापा मैं नहीं जाऊँगी|

मैं वापस भौजी और अनिल के पास आया;

भौजी: आप भी चलो न हमारे साथ|

अनिल: हाँ जीजा जी आप भी चलो मज़ा आएगा!

मैं: यार (भौजी से) आप तो जानते ही हो मेरा मन शादी-ब्याह के फंक्शन में जरा भी नहीं लगता|

भौजी: तो मेरा कौन सा लगता है, मुझे तो जबरदस्ती भेज ही रहे हो|

मैं: यार मैं वहां किसी को नहीं जानता... बोर हो जाऊँगा|

भौजी: आप मेरे साथ रहना! मैं आपको बोर नहीं होने दूंगी!

मैं: मतलब लेडीज के साथ... बाप रे बाप उससे तो अच्छा है मैं यहीं रहूँ|

हमें वहां खड़े-खड़े पंद्रह मिनट हो गए और पिताजी हमें दूर से देख रहे थे और वो स्वयं आ गए और उन्हें देख भौजी ने तुरंत घूँघट काढ लिया ;

पिताजी: क्या हुआ बेटा?

मैं: नेहा मेरी गोद से उतर ही नहीं रही|

पिताजी: क्यों गुड़िया क्या हुआ?

नेहा कुछ नहीं बोली पर मैं बात जल्दी खत्म करना चाहता था क्योंकि मैं शादी अटेंड नहीं करना चाहता था| दरअसल मैं पार्टी और शादी-ब्याह के फंक्शनो से दूर ही रहता हूँ, और अगर पिताजी को ये पता लग जाता की नेहा जिद्द कर रही है की मैं भी उनके साथ चलूँ तो वो जबरदस्ती मुझे भेज देते|

मैं: देखो बेटा अगर आप नहीं गए तो मैं आपसे कभी बात नहीं करूँगा!

अब हार के नेहा मान गई और भौजी की गोद में चली गई| मैंने उन्हें बाय-बाय किया और फिर मैं और पिताजी वापस आ गए| मेरा दिल तो भौजी के साथ ही चल गया था! मैं बस आके चारपाई पे पसर गया इतने में रसिका भाभी मेरे पास आ गईं और मेरी ही चारपाई पे बैठ गईं|

रसिका भाभी: अब तो आप अकेले हो गए मानु जी?

मैं: क्यों ... आप हो ना?

रसिका भाभी: अब भैया हम में वो बात कहाँ जो आपकी भौजी में हैं!!!

इसके आगे बोलने का कोई मौका ही नहीं मिला, क्योंकि अजय भैया ने आके घमासान युद्ध का बिगुल बजा दिया|

अजय भैया: तू किसी भी काम की है? ###**#*#*#*#*#*##*#*#*#*

आगे भैया ने अचानक से ही भाभी को गालियां देनी शुरू कर दीं| ऐसी गालियां जो मैं लिखने के बारे में सोच भी नहीं सकता| रसिका भाभी एक दम से उठ खड़ी हुई और मैं भी सकपका के खड़ा हो गया...

मैं: भैया शांत हो जाओ! आप क्यों भड़क रहे हो भाभी पे? क्या कर दिया इन्होने?

अजय भैया: कुछ किया ही तो नहीं इस ##*** ने! साली हमेशा सोती रहती है... काम करने को कहो तो बीमार पड़ जाती है|

मैं: आप ऐसे गालियां क्यों दे रहे हो ... आराम से बात करते हैं|

अजय भैया: तुम हट जाओ मानु भैया मैं अभी इस ##** की अक्ल ठिकाने लगाता हूँ|

इतना कह के वो छड़ी उठाने लपके| अब घर में कोई नहीं था.. पिताजी, बड़के दादा, माँ, चन्दर भैया और बड़की अम्मा सब के सब खेत जा चुके थे| अब कौन रोकेगा इन्हें! जैसे-तैसे मैंने भैया के हाथ से छड़ी छीन ली और दूर फेंक दी| किसी तरह उन्हें समझा-बुझा के वापस खेत में भेजा, और इधर रसिका भाभी रोये जा रही थी| मैंने उनके आँसूं पोछे और उन्हिएँ चुप कराया| भौजी मुझसे लिपट गई और सुबकने लगी और अंत में शांत हुई| मुझे उनका मुझे गले लगाना कुछ अजीब सा लगा पर फिर मैने सोचा की भाभी थोड़ा भावुक हो गईं है इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा| जब भाभी शांत हुई तब मैंने उनसे ये सोच के बात उठाई की शायद मैं उनके विवाहित जीवन में वापस खुशयीयाँ ला सकूँ|

मैं: (उनको खुद से अलग करते हुए) भाभी अब बताओ की आखिर बात क्या है? क्यों आपका और भैया का हमेशा झगड़ा होता है? क्यों भैया को आप और आपको भैया एक भी आँकक नही भाते?

रसिका भाभी: मानु जी.... अब आपसे क्या छुपाना, आपके भैया मुझे खुश नहीं कर पाते! हमेशा मुझे प्यासा छोड़ देते हैं|

मैं भौजी का जवाब सुन के अवाक रह गया, मैं उनकी बात तो समझ गया था पर फिर भी ऐसा दिखाया जैसे मैं कुछ नहीं समझा| क्योंकि मुझे अपनी टाक बचानी थी और अगर रसिका भाभी को जरा सा भी शक हो जाता या पता चल जाता की मैं सेक्स के बारे में सब जानता हूँ तो वो ये बकवास सब के सामने कर देती|

मैं: भाभी मैं कुछ समझा नहीं? वो आपको खुश नहीं कर पाते... आप प्यासे रह जाते हो... मतलब?

रसिका भाभी: मानु जी आप बिलकुल भोले हो और इसलिए आप मुझे इतने पसंद हो!

मैं: जी.. मैं कुछ समझा नहीं| (मेरा भोले बनने का नाटक जारी था|)

रसिका भाभी: क्या तुम्हें सेक्स के बारे में कुछ नहीं पता?

मैं: (झेंपते हुए) जी नहीं!

रसिका भाभी: चलो मैं तुम्हें बताती हूँ की सेक्स किसे कहते हैं? जब लड़का अपना वो (मेरे लंड की ओर इशारा करते हुए) लड़की की इस जगह (अपनी योनि की ओर इशारा करते हुए) घुसता है तो उसे सेक्स करना कहते हैं!

ये सुन के मेरे कान लाल होने लगे ओर मैंने अपनी नजरें झुका ली|

मैं: आप बहुत गन्दी बातें करते हो|

रसिका भाभी: गन्दी कसी? ये तो तुम भी करोगे...

मैं उठ के जाने लगा तो उन्होंने ने मेरे हाथ पकड़ के मुझे फिर बैठा दिया| फिर मेरा दायां हाथ अपने दोनों हाथों के बीच में रख के बोलीं;

रसिका भाभी: मानु जी... बस एक बार मेरी प्यास बुझा दो....प्लीज !!! बस एक बार....

मैं: क्या (उठ के खड़ा हो गया) आपका दिमाग ठीक है!!! आप मेरी भाभी हो.... आप पागल हो गए हो!

रसिका भाभी: मानु जी ... आपको देख के मैं बहक जाती हूँ| उस दिन जब मैंने आपको नहाते हुए देखा तो मैं बता नहीं सकती मुझ पे क्या बीती| प्लीज ... एक बार ....

मैं बोला कुछ नहीं बस उठ के जाने लगा तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया और मुझे धकेल के दिवार से लगा दिया और मुझसे एक डैम सट के कड़ी हो गईं| मुझे उनकी सांसें मेरे मुंह पे महसूस हो रही थी|

रसिका भाभी: मान जाओ ना.... क्यों तड़पा रहे हो मुझे? जान लोगे क्या मेरी? लेलो ... (इतना कहके उन्होंने अपना पल्ला गिरा दिया और मुझे उनके स्तनों के बीच की खाईं साफ़ दिखने लगी|)

मैं: मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी| आप होश में नहीं हो!

रसिका भाभी ने अपना वजन मुझ पे डाल दिया ताकि मैं हिल ना पाऊँ| अब मेरी हालत ख़राब होने लगी थी... मुझे टेंशन ये थी की अगर किसी ने हमें इस हाल में देख लिया तो मेरी वॉट लग्न तय था!


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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:14

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अब आगे...

मैं: भाभी मुझे गुस्सा मत दिलाओ... और हटो मुझ पर से| मैं आपके चक्कर में नहीं पड़ने वाला!

मैंने उन्हें धकेला और उनके चंगुल से निकल भागा .... जैसी ही मैं बड़े घर से निकल के बहार आय मुझे कोई आता हुआ दिखाई दिया| वो कोई और नहीं बल्कि रसिका भाभी का बेटा वरुण था जिसे छोड़ने कोई आदमी आया था| वो उसे मेरे पास छोड़के फटा-फट चला गया| साफ़ था की रसिका भाभी के घर और हमारे घरों के बीच सम्बन्ध भारत-पाकिस्तान जैसे थे| बस एक बात का फर्क था, रसिका भाभी के घर वाले जानते थे और मानते थे की खोट उनकी ही बेटी में है| पर इधर मेरा मिशन उल्टा पड़ चूका था| मेरा उनके विबाहित जीवन में सुख लाने का प्लान मेरी ही गांड में घुस गया था!!! मैं जानता हूँ की आप में से कई रीडर्स मुझे चु समझेंगे क्योंकि ऐसा मौका कोई हाथ से जाने नहीं देता! पर ये मेरा अपनी भौजी, जिन्हें मैं अपनी पत्नी मानता था उनके प्रति मेरा समर्पण था जो मुझे गिरने नहीं दे रहा था! अब वरुण से मैं इतना घुला-मिला नहीं था इसलिए वो मेरे साथ बिलकुल चुप-चाप खड़ा था| इतने में अंदर से रसिका भाभी निकलीं और वरुण को देख के खुश हो गई| मैं वहाँ से अपनी जान बचा के भागना चाहता था पर रसिका भाभी ने फिर मुझे पकड़ लिया;

रसिका भाभी: मानु जी... मुझे ना सही पर काम से काम अपने भतीजे को ही थोड़ा प्यार दे दो!

मैं: वरुण बेटा... चलो क्रिकेट खेलते हैं?

रसिका भाभी: हाय!!! जब आप बेटा बोलते हो तो मेरे दिल पे छुरियाँ चल जाती हैं! और उसके साथ क्रिकेट खलने को तैयार हो पर मेरे साथ नहीं, ऐसा भेद-भाव क्यों?

मैं: आपको जरा भी शर्म हया नहीं? अपने बेटे के सामने ऐसी बातें कर रहे हो!

रसिका भाभी बोलीं कुछ नहीं बस चोरों वाली हँसी हँस दी| मैं वरुण को अपने साथ ले के खेतों की ओर चल दिया क्योंकि अब वही सुरक्षित जगह बची थी मेरे लिए| मैं जानता था की मैं खुद पे सैयाम रख सकता हूँ पर अगर उन्होंने जबरदस्ती कुछ किया और किसी ने हमें देख लिया तो? रास्ते में मैं वरुण से बात करता रहा.. इससे एक तो मेरा ध्यान भाभी पे कम था और मैं वरुण को जानना भी चाहता था| जब हम खेत पहुंचे तो वरुण को देख के किसी के मुंख पे कोई ख़ुशी नहीं थी... अजय भैया का पारा तो चढ़ने लगा था| मैं किसी से कुछ नहीं बोला और वरुण को लेके घर वापस आ गया| मुझे बेचारे पे तरस आया और चूँकि अब नेहा नहीं थी तो मैंने सोचा की चलो कोई तो है मेरा दिल बहलाने के लिए! मैंने वरुण को लेके गाँव की छोटी सी दूकान की ओर चल दिया ओर वहाँ जाके उसे चॉकलेट दिलाई| वो बहुत खुश हो गया ओर मैंने प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा| हम वापस घर आये तो खाने का समय हो चूका था| पर नाजाने क्यों आज मेरा खाने का मन बिलकुल नहीं था| जी बड़ा उचाट था! खाना रसियक भाभी ने पकाया था ओर सब बैठ के भोजन कर रहे थे ... मैंने अपना खाना भाभी से लिया और वरुण को अपने साथ लेके कुऐं की मुंडेर पे बैठ गया| वहाँ मैंने उसे अपने हाथ से खाना खिलाया और खाली थाली ले के धोने के लिए डाल दी| घरवालों के लिए मैंने खाना खा लिया था और खाना खाने के बाद सब खेत चले गए और मैं पेड़ के नीचे चारपाई डाले लेट गया| अब तक वरुण मेरे से थोड़ा खुल गया था और वो भी मेरे पास ही बैठ गया और अपने खिलौनों से खेलने लगा| मैं आँख बंद की और सोने लगा| पर नींद कहाँ... भौजी की बड़ी याद आ रही थी| अभी उन्हें गए कुछ घंटे ही हुए थे और मेरा ये हाल था! मन कर रहा था की उनके मायके धडधाता हुआ पहुँच जाऊँ और उन्हें गले लगा लूँ और सब के सामने उन्हें गोद में उठा के ले आऊँ| मेरा दायाँ हाथ सर के नीचे था और बायाँ हाथ मेरे सीने पे था और मैं आँख मूंदें सोने की कोशिश कर रहा था| इतने में मुझे रसिका भाभी के आने की आहात सुनाई दी| मैं झट से आँखें बंद कर ली और ऐसा दिखाया जैसे मैं सो रहा हूँ| भाभी मेरे पास आइन और वरुण को अपनी गोद में लेके चली गईं| मैं रहत की साँस ली पर ये रहत ज्यादा देर के लिए नहीं थी| भाभी फिर लौट के आईं, मैंने फिर से आँखें बंद कर ली| भाभी झुकी और मेरे लंड को सहलाने लगी| जैसे ही उनका हाथ मेरे लंड से स्पर्श हुआ मैं चौंक के उठ खड़ा हुआ;

मैं: आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की?

रसिका भाभी: हाय... तुम गुस्से में बहुत प्यारे लगते हो!

मैं: भाभी अब बहुत हो गया! मैं अब और बर्दाश्त नहीं करूँगा! अब अगर दुबारा आपने मेरे नजदीक आने की कोशिश की तो मैं भूल जाऊंगा की मेरे पिताजी ने मुझे संस्कार दिए हैं की अपने से बड़ों पे हाथ नहीं उठाते! (मैंने ऊँची आवाज में उन्हें साफ़ जता दिया की मैं ये सब आसानी से सहने वालों में से नहीं हूँ|)

रसिका भाभी: मुझे मार लो.. काट दो… चाहे मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दो पर बस एक बार....एक बार मेरी प्यास बूझा दो!

मैं: कभी नहीं!!!

बस इतना कह के मैं वहाँ से चला आया और खेतों में सब के साथ काम करने लगा| करीब घंटे भर के अंदर सभी लोग खेत से वापस चल दिए, घर आये तो देखा वरुण रो रहा था! वो भागता हुआ आया और मुझसे लिपट गया| मैंने रसिका भाभी की ओर देखा तो वो गुस्से में तमतमा रहीं थी| लग रहा था जैसे मेरा सारा गुस्सा उस बेचारे पे निकाल दिया हो! मैंने वरुण को चुप कराया ओर उसे गोद में ले के बड़े घर गया ओर उसके कपडे जिन पर मिटटी लगी थी वो उतारने लगा| फिर मैं रसिका भाभी के कमरे में घुस ओर वरुण के कपडे निकाले औरजैसे ही मुड़ा पीछे भाभी खड़ी थीं|

मैं: (गरजते हुए) क्यों डाँटा उस बिचारे बच्चे को? मेरा गुस्सा उसी पे निकालना था?

रसिका भाभी: हाय! मेरे बेटे के लिए प्यार है... पर मेरे लिए नहीं? ऐसी बेरुखी मेरे साथ क्यों?

मैं: आप मेरे प्यार के लायक नहीं हो!

रसिका भाभी: तो किस लायक हूँ मैं?

मैं: नफरत के!!!

रसिका भाभी: तो नफरत ही कर लो मुझसे, मैं उसी को तुम्हारा प्यार समझ लूँगी|

मैं: अब बहुत हो गया... जाने दो मुझे|

रसिका भाभी ने दरवाजा अपने दोनों हाथों से रोक रखा था और मुझे जाने नहीं दे रहीं थी|

रसिका भाभी: एक शर्त पे जाने दूंगी...

मैं: कैसी शर्त?

रसिका भाभी: मुझे तुम्हारा वो (मेरे लैंड की ओर इशारा करते हुए) एक बार देखना है|

मैं: (गरजते हुए) क्या? मुझे मजबूर मत करो हाथ उठाने के लिए ...

रसिका भाभी: तो मैं नहीं हटने वाली|

मैं कुछ नहीं बोला और अपने आप को अंदर ही अंदर रोकता रहा की मैं उन पर हाथ न उठाउँ| इतने में किसी के आने की आहट हुई और रसिका भाभी एक दम से पीछे घूमीं ... उनका बयां हाथ दरवाजे की चौखट से हटा और मैंने सोचा की मैं इसी का फायदा उठा के निकला जाता हूँ| जैसे ही मैं उनके नजदीक पहुंचा उन्होंने अपना हाथ फिर चौखट पे रख दिया और बायीं और झुक गईं| मेरे और उनके होठों के बीच बहुत काम फासला था| ऊपर से मुझे इतने नजदीक से भाभी के स्तनों के बीच की घाटी दिखने लगी थी| उनके वो सफ़ेद-सफ़ेद स्तन देख के दिमाग चक्र गया पर फिर अपने आप को संभाला और मैं पीछे हुआ ... तभी भाभी ने अपने दायें हाथ से फिर मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ लिया और मैं छिटक के पीछे हुआ|

मैं: बहुत हो गया अब...

रसिका भाभी: (मेरी बात काटते हुए) हाय! अभी बहुत हुआ कहाँ... अभी तो बहुत कुछ बाकी है!!!

अब मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैंने एक जोरदार तमाचा उनके बाएं गाल पे जड़ दिया| भाभी का बैलेंस बिगड़ा और वो चारपाई का सहारा ले के नीचे बैठ गईं| आज पहली बार मैंने किसी औरत पे हाथ उठाया था... पर शायद वो उसी के लायक थी;

मैं: (झिड़कते हुए) खबरदार जो मेरे आस-पास भटके!

मैं हैरान था की उनके माथे पे एक शिकन तक नहीं पड़ी थीं बल्कि वो तो हँस रही थी| मैं वहाँ से गुस्से में तमतमाता हुआ बहार आ गया| वरुण को मैंने बहार दरवाजे से पुकारा और उसे रसोई के पास छप्पर के नीचे बिठा के उसके कपडे बदले| इतने में अजय भैया आये और वरुण को देख के उनका गुस्सा और भड़क गया| वो पाँव पटकते हुए रसिका भाभी से लड़ने के इरादा लिए बड़े घर की ओर चल दिए| जहाँ शायद वो अब भी उसी तरह नीचे बैठी थीं| मेरा दिमाग कह रहा था की तुझे कोई जर्रूरत नहीं उनके बीच में पड़ने की औरभाभी को उनके किये की सजा तो मिलनी ही चाहिए! पर मन बेचैन हो रहा था और रह-रह के मन कर रहा था की मैं भैया को भाभी की पिटाई करने से रोकूँ| अंदर ही अंदर मेरा भाभी पे हाथ उठाना मुझे सही नहीं लग रहा था| मैं अंदर ही अंदर घुटने लगा था... अपने आप को कोस रहा था| कुछ ही देर में मुझे भैया-भाभी के जोर-जोर से लड़ने की आवाज आने लगी| मैं खुद को नहीं रोक पाया और जल्दी से बड़े घर की ओर भागा| अंदर का नजारा दर्दनाक था... अजय भैया के हाथ में बांस का डंडा था जिससे वो कम से कम एक बार तो भाभी की पीठ सेंक ही चुके होंगे क्योंकि भाभी फर्श पे पड़ी करहा रही थी ओर जल बिन मछली की तरह फड़-फड़ा रही थी| जब तक मैं भैया को रोकता उन्होंने एक और डंडा भाभी को दे मारा! मैंने लपक के भैया के हाथ से डंडा छुड़ाया और भैया को खींच के बहार ले गया| इतने में पिताजी भी दौड़े, अब चूँकि भाभी फर्श पे पड़ीं थी और ऐसा लग रहा था जैसे वो होश में नहीं हैं और ऊपर से उनके सर पे घूँघट नहीं था और उनका नंगा पेट साफ़ झलक रहा था इसलिए मैंने खुद को परदे की तरह उनके सामने कर दिया ताकि किसी को अंदर का हाल न दिखे| इतना अवश्य दिख रहा था की कोई फर्श पे पड़ा है ... पिताजी ने जब इतना दृश्य देखा तो वो अजय भैया को गुस्से में पकड़ के बहार ले गए| मुझे लगा की शायद माँ या बड़की अम्मा कोई तो आएंगे पर कोई नहीं आया|

जिस इंसान पे थोड़ी देर पहले मुझे गुस्सा आ रहा था अब उस पे दया आने लगी थी| मैंने आगे बढ़ के उन्हें सहारा दे कर चारपाई पर लेटाया और वो किसी लाश की तरह दिख रहीं थी| दिमाग कह रहा था की दो डंडे खाने से कोई नहीं मरता पर फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए मैंने उनकी नाक के आगे ऊँगली रख के सुनिश्चित किया की वो साँस ले रहीं है| मैंने उन्हें हिला के होश में लाने की कोशिश की पर वो नहीं उठी| फिर मैं स्नान घर से पानी ले कर आय और उनके मुँह पे छिड़का तब जाके वो हिलीं और होश में आते ही मुझसे लिपट गईं और मुझे अपने ऊपर खींच लिया| मेरा बैलेंस बिगड़ा और मैं सीधा उनके ऊपर जा गिरा| मेरा मुँह सीधा उनके स्तनों के ऊपर था और भाभी का दबाव मेरी गर्दन पे इतना ज्यादा था की एक पल के लिए लगा मैं साँस ही नहीं ले पाउँगा| मैंने अपने आप को उनसे छुड़ाया और छिटक के दूर दिवार से लग के खड़ा हुआ और अपनी सांसें ठीक की| अब उनका करहना और रोना-धोना शुरू हो गया| मेरा दिल फिर पिघल गया और मैं उनके लिए पेनकिलर ले आया और उनकी ओर दवाई का पत्ता बढ़ा दिया| वो बोलीं; "मेरी पीठ बहुत दुःख रही है... दवाई लगा दो ना?" जिस तरह से वो बोल रहीं थीं उससे लग रहा था की जैसे वो मुझे seduce कर रही हो| मैंने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाये और कहा; "अभ आता हूँ|" मैं बहार गया ओर अपने साथ वरुण को ले आया| अब वरुण को देख के भाभी के तोते उड़ गए! और मुझे बहुत हँसी आई ...

रसिका भाभी: मुझे इस तरह तड़पता देख के तुम्हें बहुत हँसी आ रही है|

मैं: हाँ... (बड़े गंभीर स्वर में)

रसिका भाभी: तुम ऊपर से चाहे कितना ही दिखाओ की तुम मुझसे बहुत नफरत करते हो पर अंदर से तुम मुझसे प्यार करते हो|

मैं: ये आपका वहम् है| मैं आपसे कटाई प्यार नहीं करता और न ही कभी करूँगा| आपको एक बात समझ नहीं आती... अजय भैया मेरे "भैया" हैं! और आप उनकी पत्नी आपके मन में ये गन्दा ख्याल आया ही कैसे?

रसिका भाभी: पहली बात तो ये की तुम उनके चचेरे भाई हो .. सगे नहीं और अगर होते भी तो मुझे क्या फर्क पड़ना था| और दूसरी बात ये की जब कामवासना की आग किसी के तन-बदन में लगी हो तो वो किसी भी रिश्ते की मर्यादा नहीं देखता|

मैं: छी..छी... आप बहुत गंदे हो! मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी|

मैं वहाँ से जाने लगा... तभी मुझे याद आया की ये घायल शेरनी है और ये मेरा गुस्सा फिर से अपने बच्चे पे ना निकाले इसलिए मैं जाते-जाते उन्हें हिदायत दे गया;

मैं: वरुण बेटा आप मम्मी को दवाई लगा के ये गोली खिला देना और फिर मेरे पास आ जाना| और हाँ आप (रसिका भाभी) अगर आपने वरुण पे हाथ उठाया तो .... सोच लेना!!!

मैंने उन्हें बिना सर-पैर की धमकी दे डाली थी पर मैं अब भी डर रहा था की कहीं ये शेरनी अपने ही बच्चे को पंजा मार के घायल ना कर दे| पर शुक्र है भगवान का की ऐसा कुछ नहीं हुआ|

अंधेरा हो रहा था और इधर मुझे अपने ही शरीर से रसिका भाभी की बू आ रही थी! बार-बार उनका मेरे लंड को पकड़ना याद आने लगा था| ऐसा लग रहा था जैसे अभी भी मेरा लंड उनकी गिरफ्त में है| इस वहम् से बहार निकलने का एक ही तरीका था की मैं स्नान कर लूँ| पर इतनी रात को ...हैंडपंप के ठन्डे पानी से.... वो भी नंगा हो के? अब मैं बड़े घर में जाके नहीं नहा सकता था क्योंकी वहाँ रसिका भाभी जीभ निकाले मेरा लंड देखने को तैयार लेटी थीं| और अगर वो ये नजारा देख लेटी तो मुझ पे झपट पड़ती और मेरी मर्जी के खिलाफ वो सब करने की कोशिश करती| वो सफल तो नहीं होती पर पर उनका मेरे शरीर को छूना.... वो मुझे फिर से उसी मानसिक स्थिति में डाल देता जिससे भौजी ने मुझे बाहर निकला था| मैं पहले चन्दर भैया के पास गया;

मैं: भैया मुझे नहाना है तो क्या मैं आपके घर में नहा लूँ?

चन्दर भैया: मानु भैया, घर आपका है कहीं भी नहाओ पर इतनी रात को नहाना सही नहीं| ठण्ड लग जायेगी... वैसे भी ठंडी हवा तो चल रही है, क्या जर्रूरत है नहाने की?

मैं: भैया मन थोड़ा उदास है, नहाऊंगा तो थोड़ा तारो-ताजा महसूस करूँगा|

चन्दर भैया: अपनी भौजी को याद कर के उदास हो रहे हो?

मैं: नहीं... पर नेहा की बहुत याद आ रही है|

चन्दर भैया: मुझे तो लगा की आप अपनी भौजी को याद कर रहे होगे... पर ठीक है जैसी आप की मर्जी|

अब उनकी ये डबल मीनिंग बात का मतलब मैं समझ चूका था पर मैंने इस बात को कुरेदा नहीं| मैं बाल्टी में पानी लिए भौजी के घर में घुसा और स्नानघर मैं बाल्टी रख के अपने कपडे उतारने लगा| आँगन में राखी चारपाई को बार-बार देख के लगता था जैसे भौजी वहीँ बैठी हैं और अभी उठ के मेरे गले लग जाएँगी| जब मैंने अपनी टी-शर्ट उतारी तो अपने निप्प्लेस को देखा जिन पर भौजी ने एक दिन पहले कटा था और चूस-चाट के उसे लाल कर दिया था| मैं आँखें बंद किये वही मंजर याद करने लगा और मेरे रोंगटे खड़े हो गए! हमेशा नहाने में मुझे दस मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता था पर आज मुझे आधा घंटा लगा, क्योंकी आज नहाते हुए मैं उन सभी हंसी लम्हों को याद करता रहा| साथ ही साथ मैंने खुद को इतना रगड़ के साफ़ किया जैसे मैं एक सदी से नहीं नहाया हूँ... क्योंकी मैं चाहता था की मेरे शरीर से रसिका भाभी की बू जल्द से जल्द निकल जाए| ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाने के बाद अब बारी थी कुछ खाने की क्योंकी सुबह से मैं कुछ नहीं खाया था ... पर हाय रे मेरी किस्मत जब मैं रसोई पहुँचा तो वहाँ रसिका भाभी बैठी रोटी सेंक रही थी| अब ना जाने क्यों मेरे अंदर गुस्से की आग फिर भड़की और मैं मुँह बना के वापस चारपाई पे लेट गया| पता नहीं क्यों पर मेरी इच्छा नहीं हो रही थी की उनके हाथ का बना हुआ खाना खाऊँ!


The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:15

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अब आगे...

वरुण मेरे पास बैठ गया और हाथ से है जहाज बनाके उड़ाने लगा| उसे खुश देख के मन को थोड़ी तसल्ली हुई.. जब खाना बन गया तब मैं खाना लेने रसोई तो गया और अपना खाना ले के वापस अपनी चारपाई पे आया पर खुद ना खाके मैंने सारा खाना वरुण को खिला दिया| अब मैं वापस भूखे पेट सोने लगा और वरुण भी मुझसे चिपक के सो गया| ये पहलीबार था जब मैं बिना कहानी सुनाये सो रहा था, पर एक अजब सी ख़ुशी थी मन में... वो ये की आज दिन भर में जो भी हुआ ... वो अब मेरे शरीर के किसी भी भाग को विचिलित नहीं करेगा| मन साफ़ है और खुश है, बस कमी है तो बस भौजी की! पता नहीं कब पर मुझे नींद आ ही गई... और मैं एक सपना देखने लगा| सपने में मेरे और भौजी के आलावा और कोई नहीं था| हम हाथ में हाथ डाले फूलों से लैह-लहाते बाग़ में घूम रहे थे| नंगे पाँव... घांस में पड़ी ओस की बूँदें पाँव को गीला कर रहीं थी| भौजी बहुत खुश थीं और मैं भी... फिर अचानक से भौजी के पाँव में एक काँटा चुभ गया और वो लँगड़ाने लगीं| ,मैं नीचे बैठ के उनके पाँव से कांटा निकालने लगा और फिर भौजी वहीँ बैठ गईं| मैंने उनकी गोद में सर रख लिया और उन्होंने उसी स्थिति में झुक के मेरे होठों पे अपने थिरकते हुए होंठ रख दिए और हम एक दूसरे के होठों का रसपान करने लगे| भौजी मुझे Kiss कर रहीं थीं और तभी अचानक उन्होंने अपना हाथ सरकाते हुए मेरे गले से लेकर लंड तक हाथ घुमाया और मेरा लंड पकड़ लिया| जैसे ही उन्होंने मेरा लंड पकड़ा मेरा सपना टूटा और मैं उठ के बैठ गया| मेरे सामने रसिका भाभी थीं जिनका हाथ मेरे लंड पे था और मेरे सपने में जो कुछ हुआ वो रसिका भाभी मेरे साथ कर रहीं थी सिवाय उस चुम्बन के जो सपने में मेरे और भौजी के बीच हुआ था! अब मैं अगर चिल्लाता तो शोर मचता और बवाल खड़ा होता| मैंने दबी हुई आवाज में आँखें दिखाते हुए रसिका भाभी को डराया;

मैं: ये क्या बेहूदगी है? मैंने मन किया था न मेरे आस-पास मत भटकना?

रसिका भाभी: अब तो तुमने मुझे पीट भी लिया अब तो पूरी कर दो मेरी ख्वाइश?

मैं: आप जाओ यहाँ से... कोई देख लेगा तो… आपकी इजात का तो कुछ नहीं पर मेरी मट्टी-पलीत हो जाएगी|

रसिका भाभी: ना..मैं नहीं जाउंगी जब तक तुम मुझे अपना ये (मेरा लंड) नहीं दिखते!

मैं: आपका दिमाग ख़राब हो गया है! आप मत जाओ मैं यहाँ से जा रहा हूँ!

जैसे ही मैं उठ के खड़ा हुआ तो देखा वरुण मेरी बगल में नहीं था, यानी पहले भाभी उसे उठा के ले गईं और दूसरी चारपाई पे सुला दिया और फिर खुद आके मेरे साथ बदतमीजी करने लगी| भाभी ने मेरा हाथ जकड लिया और मुझे इतनी जोर से खींचा की मैं वापस चारपाई पे आ गिरा| सच में बहुत ताकत थी उनमें... पर दिखने में तो छुइ-मुई सी थी!

रसिका भाभी: तुम कहनी नहीं जाओगे जब तक मैं तुम्हारा वो नहीं देख लेती|

मैं: छोड़ दो... वरना मैं चिल्लाउंगा!!

रसिका भाभी: चिल्लाओ... बदनामी तुम्हारी ही होगी| मैं कह दूंगी की तुम मेरे साथ जबरदस्ती कर रहे थे|

मैं: आप तो सच में बहुत कमीनी निकली! मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो?

रसिका भाभी: जिस आग में मैं जल रही हूँ उसे बुझाने के लिए उझे जो भी करना पड़े मैं करुँगी|

मैं: ठीक है... पर अब मेरा हाथ छोडो और ,मुझसे थोड़ा दूर हटो!

मैंने सोच लिया था की चाहे जो हो जाए मैं वो कभी नहीं करूँगा जो ये चाहती हैं| मुझे अब उनसे घिन्न होने लगी थी| मैं झट से उठा और भाग के पिताजी की चारपाई के पास आ गया| पिताजी पीठ के बल लेटे थे और मैं ठीक उनके सामने खड़ा हो गया| अगर जरा सी भी आवाज होती और पिताजी की आँख खुलती तो उन्हें सबसे पहले मैं दिखता| भाभी का मुँह सड़ गया और मेरे दिल को चैन आया| पर भाभी इतनी ढीठ थीं की अभी भी मेरी चारपाई से गईं नहीं और उसी चारपाई पे बड़े आराम से बैठ गईं| ऐसा लग रहा था मानो मुझे चिढ़ा रहीं हो की बच्चू कभी न कभी तो आओगे ही अपनी चारपाई पे सोने| मैं उनसे भी ढीठ था.. मैं पिताजी की बगल में लेटने लगा| जैसे ही मैं चारपाई पे बैठा तो पिताजी की आँख खुल गई;

पिताजी: क्या हुआ?

मैं: जी.. नींद नहीं आ रही थी... तो आपके पास आगया|

पिताजी थोड़ा एडजस्ट हुए और मैं उनकी ही बगल में लेट गया| जगह काम थी पर कम से कम अपनी इज्जत तो लूटने से बचा ली मैंने!!! अब भाभी का पारा चढ़ गया होगा!!! अगली सुबह तो और भी मुसीबतों वाली थी!!! सुबह मैं सब के साथ ही उठा और दुबारा रगड़-रगड़ के नहाया क्योंकी मुझे अपने बदन से रसिका भाभी की बू जो छुडानी थी| किस्मत अब भी चैन नहीं ले रही थी और मुझे तंग किये जा रही थी| चाय भी रसिका भाभी ने बनाई थी जो पीना मेरे लिए मानो जहर पीना था| चाय तो मैं ले के खेतों की ओर गया ओर फेंक दी| आजका प्लान बिलकुल साफ़ था... घरवालों की आड़ में रहो तो इज्जत बची रहेगी| पिताजी और बड़के दादा खेत जाने के लिए तैयार थे मैं उन्हीं के पास बैठ गया| तभी वहाँ सर पे पल्ला किये माँ और बड़की अम्मा आ गए|

माँ: क्यों भई लाड साहब, रात को बड़ा प्यार आ रहा था अपने पिताजी पर जो उनके साथ सोया था|

मैं: जी ... नींद नहीं आ रही थी इसलिए ....

माँ: हाँ..हाँ.. जानती हूँ|

मैं: अब आप लोगों की मदद खेतों में करूँगा तो नींद जबरदस्त आएगी|

बड़के दादा: हाँ मुन्ना... अजय और चन्दर तो आज लखनऊ जा रहे हैं|

मैं: किस लिए?

बड़के दादा: वो मुन्ना ... एक पुराना केस है उसके लिए|

मैं: केस?

बड़के दादा: हाँ बेटा तुम्हारे दादा की एक जमीन थी जिस पे कुछ लोगों ने कब्ज़ा कर लिया था|

खेर बातें ख़त्म हुईं और हम खेतों में चले गए| मैं काम कर रहा था पर ध्यान अब भी भौजी पे लगा हुआ था| हाथ में हंसिया लिए फसल काट रहा था और ना जानने कब हंसिए से मेरा हाथ काट गया मुझे पता ही नहीं चला| मेरी हथेली की जो सबसे बड़े रेखा थी वो कट गई और खून निकलने लगा| मेरा उस पे ध्यान ही नहीं गया.. जब माँ घर से पानी लेके आईं तब उन्होंने खून देखा और तब जाके कहीं मेरा ध्यान हाथ पे गया| मैंने रुमाल निकला और ऐसे ही बांध लिया और वापस काम पे लग गया| खेत में बस पिताजी, बड़की अम्मा, मैं और माँ ही थे| चन्दर भैया और अजय भैया लखनऊ के लिए निकल चुके थे| तभी अचानक से वरुण भागता हुआ आया;

वरुण: चाचा ...चाचा ... माँ ने आपको बुलाया है|

मैं: क्यों?

वरुण: टांड से एक गठरी उतारनी है|

मैं जानता था की उन्हिएँ कोई गठरी नहीं उतरवानी बस अपनी कमर की गठरी खोल के दिखानी है! मैं वरुण से साफ़ मन कर दिया और कह दिया की बाद में उतार दूँगा| वरुण जवाब सुनके चला गया... और पांच मिनट में ही भागता हुआ फिर आया;

वरुण: चाचा, माँ कह रही है की गठरी में कुछ कपडे हैं जो उन्हीने "सी" ने हैं|

मैं: कहा ना बाद में उतार दूँगा अभी काम करने दो!

पिताजी: जाके उतार क्यों नहीं देता गठरी| क्यों बार-बार बच्चे को धुप में भगा रहा है?

मैं: जी ... जाता हूँ|

अब मैं घर पहुँचा तो भाभी कुऐं के पास मेरा बेसब्री से इन्तेजार कर रही थी| मुझे लगा की ये कल रात का बदला जर्रूर लेगी मुझसे|

पर हुआ कुछ अलग ही;

रसिका भाभी: कल रात जो हुआ उसके लिए मुझे माफ़ कर दो! मैं हाथ जोड़के तुमसे माफ़ी मांगती हूँ!

मैं हैरान हो गया की अचानक से ये इतने प्यार से कैसे बात कर रही है| इतनी जल्दी इसका हृदय परिवर्तन कैसे हो गया| कुछ तो गड़बड़ है!

रसिका भाभी: प्लीज मुझे माफ़ कर दो!

मैं बोला कुछ नहीं बस हाँ में गर्दन हिला दी और उन्हें लगा की मैंने उन्हें माफ़ कर दिया| मैं अब भी उनकी पहुँच से दूर था क्योंकी दिल को लग रहा था की ये लपक के कहीं फिर से तुझे जकड न ले|

रसिका भाभी: अच्छा तो अब हम दोस्त हैं ना?

मैं फिर कुछ नहीं बोला बस हाँ में सर हिला दिया|

रसिका भाभी: तो मेरी मदद करोगे?

मैं: कैसी मदद?

रसिका भाभी: मेरे कमरे में सीढ़ी लगा के टांड से एक गठरी उतार दो|

अब मैंने “सविता भाभी कॉमिक्स का एपिसोड 2” देखा था| इसलिए मैं सचेत था की जब मैं सीढ़ी पे चढ़ा हूँ तब ये मेरा लंड हमेशा पकड़ लेगी और उस हालत में अगर मेरा बैलेंस बिगड़ा तो मैं सीधा जमीन पे गिरूंगा और हड्डी टूटेगी ही| और अगर मैं बेहोश हो गया तो ये मेरा फायदा अवश्य उठाएगी| मैं सीढ़ी ले के उनके कमरे में पहुँचा और टांड से सीढ़ी लगा दी| इतने में भाभी आई और मुझे लगा की अब ये कहेगी की तुम सीढ़ी पर चङो मैं सीढ़ी पकड़ती हूँ और जैसे हे मैं ऊपर चढूंगा ये फिर मुझसे छेड़खानी करेंगी| पर भाभी मेरे पास आईं और मुझे टांड पे रखी गठरी दिखाई और उसे उतारने के लिए कहा और बाहर आँगन में चली गईं| मैं हैरान था की इतनी जल्दी ये लोमड़ी सुधर कैसे गई? खेर मैं सीढ़ी पर चढ़ा और गठरी को छूने की कोशिश करने लगा| गठरी मेरी पहुँच से थोड़ा दूर थी| मैंने बहुत कोशिश की परन्तु मेरा हाथ नहीं पहुँचा फिर मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली से उसे खींचा परन्तु असफल रहा| मैं कोसिशकर रहा था तभी अचानक वो हुआ जिसका मुझे डर था| भाभी ने अचानक से मेरा लंड सामने से पकड़ा और एक झटके में मेरा पाजामा खेंच के नीचे कर दिया| पाजामा नीचे गिरते ही मेरा लंड उनके सामने था| इधर मेरा हाथ गठरी तक पहुँच गया था| जैसे ही भाभी ने मेरा पाजामा खींचा मैंने गठरी खेंची और वो धड़ाम से नीचे गिरी और मैं सीढ़ी से कूद पड़ा और अपना पजामा ठीक किया| मैंने एक लात सीढ़ी में मारी और वो जाके दूसरी दिवार से जा लगी| अब मैं एक दम से भाभी पे चढ़ गया और खींच के दो लाफ़े उनके गाल पे जड़ दिए|



पर हैरानी की बात ये थी की भाभी को कोई फर्क ही नहीं पड़ा था हँस रही थी! वो बहुत तेजी से खिलखिला के हँसी... मैं हैरानी से कुछ पल उन्हें घूरता रहा जैसे मैं जानना चाहता था की आखिर इन्हें हुआ क्या है| मैं मुड़ के जाने लगा तो वो बोलीं; "मज़ा आ गया मानु जी...!!!" एक पल के लिए मेरा दिमाग जैसे सन्न रह गया| भला ये कैसी औरत है जो दो लाफ़े खा के भी खुश है और कह रही है की मज़ा आ गया| मैं वहां से वापस खेत भाग आया, पर अब मुझे एक जाइब सा डर लगने लगा था| पर मेरी मुसीबतें तो अभी शुरू ही हुईं थी| मैं यूँ तो खेत में बैठा काम कर रहा था परन्तु मन मेरा बैचैनी से पागल हुआ जा रहा था| दिल भौजी को याद कर रहा था... दिमाग रसिका भाभी से सहमा हुआ था और मन तो जैसे बावला हो रहा था| तभी अचानक पिताजी का फ़ोन बज उठा| फ़ोन चन्दर भैया ने किया था, उन्हें कोर्ट कचहरी के काम के कारन कुछ दिन और रुकना था लुक्खनऊ में| खेर भोजन का समय हुआ तो सब घर वापस आ गए| घर आके बड़की अम्मा ने भाभी को बताया की अजय भैया कुछ दिन और नहीं आएंगे तो भाभी की बाँछें खिल गेन| वही कटीली मुस्कान उनके होंठों पे लौट आई| ये सब वो मेरी ओर देख के कर रहीं थीं| हमेशा की तरह मैंने अपना खाना लिया और वरुण को अपने साथ बिठा के सब खिला दिया| खाने के उपरान्त सब वापस जाने को हुए तभी एक और बिजली गिरी| दुबारा फ़ोन बजा, परन्तु इस बार बड़के दादा का| ये फ़ोन मां जी के घर से आया था| बात ख़ुशी की थी, वो दादा बन गए थे|

उन्होंने सब को अपने घर पे आमंत्रित किया था| परन्तु खेतों में कटाई बाकी थी इसलिए बड़के दादा ने कह दिया की वो नहीं आ पाएंगे| अब घर पे काम से काम दो लोगों को रहना था, और बड़की अम्मा और बड़के दादा दोनों तैयार थे| अब मेरा मन तो वैसे ही भौजी के बिना अशांत था और मैं वहां जाना भी नहीं चाहता था| इसलिए मैंने कहा की मैं यहीं रह के बड़के दादा के पास रह के खेत की कटाई में मदद करूँगा| बड़के दादा ने मन किया पर पिताजी के जोर देने पर वो मान गए| दरअसल बड़के दादा चाहते थे की मैं थोड़ा घूमूं -फिरूँ पर उन्हें क्या पता मेरी मनोदशा क्या थी| मैं अंदर ही अंदर खुश था की कम से कम भाभी घर में नहीं होंगी तो कुछ तो चैन मिलेगा|

लेकिन एक बार फिर उन्होंने अपना तुरुक का इक्का फेंका;

रसिका भाभी: काका (मेरे पिताजी) मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है| और फिर इतने दिनों बाद वरुण आया है तो आप बड़की अम्मा को साथ ले जाइये मैंने यहाँ खाना वगेरह संभाल लुंगी|

बड़की अम्मा: नहीं बहु .... तुम आराम करो| मैं देख लूंगी सब|

रसिका भाभी: अम्मा आप वैसे भी कहीं बहार नहीं जाते... और पिछली बार आप मामा के घर साल भर पहले गए थे.

पिताजी: हाँ भाभी... आप चलो ये संभाल लेगी और फिर हुमक-दो दिन में आ ही जायेंगे|

तब जाके बड़की अम्मा मानी पर इधर मुझे अंदर-ही-अंदर गुस्सा भी आ रहा था और डर भी लग रहा था| सभी जल्दी तैयार होक निकल गए और अब घर पे केवल हम चार लोग रह गए थे; मैं. बड़के दादा, वरुण और रसिका भाभी| मैं बड़के दादा के साथ काम में जुट गया| कुछ देर बाद भाभी भी आ गईं और मेरे पास ही बैठ के कटाई करने लगी| वरुण भी अपने नन्हे-नन्हे हाथों से मदद करने लगा| पर बड़के दादा के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे| वो बस काम में लगे हुए थे, और इधर भाभी धीरे-धीरे मेरे नजदीक आ रहीं थीं| जब वो मेरे कुछ ज्यादा नजदीक आ गईं तो मैं उठ के दूसरी तरफ जाने लगा, तभी उन्होंने जानबूझ के मुझ से पूछा; "मानु जी... कहाँ जा रहे हो?" मैं कुछ नहीं बोला| तभी बड़के दादा ने पूछा; "अरे मुन्ना वहाँ कहाँ जा रहे हो?" अब वो चूँकि मेरे बड़े थे तो उनकी बात का जवाब देना जर्रुरी था; "जी मैं बाथरूम जा रहा हूँ|" अब बाथरूम किसे आया था? मैं कुछ दूरी पे दूसरे खेत की ओर मुंह करके ऐसे खड़ा हो गया जैसे मूट आ रहा हो| पर मूता नहीं... कुछ देर बाद वापस आया ओर बड़के दादा के पास ही बैठ के कटाई चालु कर दी| जब अँधेरा होने लगा तो हम वापस घर आ गए|घर लौट के सबसे पहले तो मेरा नहाने का मन था| क्योंकि रसिका भाभी ने मुझे दोपहर में जो छुआ था| पर दिक्कत ये थी की चन्दर भैया का घर लॉक था औरउसकी चाभी रसिका भाभी के पास थी| अब मैं उनके सामने नहीं जान चाहता था इसलिए मैं बड़े घर ही चला गया स्नान करने| बड़के दादा ने मुझे बाल्टी में पानी ले जाते हुए देखा तो पूछा;

बड़के दादा: मुन्ना इस पानी का क्या करोगे?

मैं: जी नहाने जा रहा हूँ|

बड़के दादा: अरे मुन्ना बीमार पद जाओगे| मौसम ठंडा है और ऊपर से पानी बहुत ठंडा है|

मैं: नहीं दादा थकावट उतर जाएगी|

बड़के दादा: बेटा इसीलिए मैं कह रहा था की तुम चले जाओ, अब यहाँ रह के तुम खेतों में काम करोगे तो थक तो जाओगे ही|

मैं: नहीं दादा... आदत पड़ जाएगी| (मैं मुस्कुरा के नहाने चल दिया|)

पानी वाकई में बहुत ठंडा था, और ऊपर से जैसे ही मैंने सारे कपडे उतारे और पहला लोटा पानी का डाला तो मेरी कंपकंपी छूट गई| किसी तरह मैं रगड़-रगड़ के नहाया ताकि रसिका भाभी की महक छुड़ा सकूँ| नह के काँपता हुआ मैं बहार आया और छापर के नीचे एक चादर ले के लेट गया| रात को जब खाना बना तो मैंने अपना वही पुराण तरीका अपनाया और बर्तन रख के हाथ धोके आया|