2013- maanesar ki ek ghatna thriller story

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
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sexy
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Re: 2013- maanesar ki ek ghatna thriller story

Unread post by sexy » 19 Aug 2015 07:59

मैंने कपड़ा हटाया, तो उसमे एक पोटली सी पड़ी थी, पोटली भी अच्छी-खासी बड़ी थी! मैं नीचे बैठा, हाथ से उस पोटली को छुआ, तो कुछ कठोर सी वस्तु लगी उसके अंदर! अब मैंने उस पोटली को उठाया, और देखा, पोटली में वजन था, टोकरा भी कट्ठे के पेड़ के रेशे और डंडियों से बना था, काफी बड़ा टोकरा था वो, मैंने अब वो पोटली खोली, शर्मा जी भी बैठ गए थे वहीँ, पोटली एक सुतली जैसे धागे से बंधी थी, मैं उस उड़सी हुई सुतली को खोलने लगा, और फिर खोल लिया, अब उस पोटली का मुंह खोलने लगा, जब पोटली खुली तो मैंने अब उसका मुंह चौड़ा किया, अंदर झाँका, तो अंदर मिट्टी सी थी, कुछ पत्थर भी थे, मैंने वो मिट्टी और पत्थर उस टोकरे में खाली कर दिए, और जब खाली किये, तो उसमे एक अजीब सी वस्तु निकली, एक पात्र सा, ये पात्र कांसे का बना था, कांसे के उस पात्र पर, एक ढक्कन सा चढ़ा था, ये ढक्क्न भी कांसे का ही बना था! रांगे से उसको जोड़ा गया था! मैंने उस पात्र को साफ़ किया, और जब साफ़ हुआ वो, तो उस पर मुझे एक रेखा दिखाई थी, एक बड़ी सी रेखा, उस रेखा में स्वास्तिक के चिन्ह बने हुए थे, और वे सभी चिन्ह एक दूसरे से जुड़े हुए थे! एक बेहद ही कुशल पच्चीकारी का उत्कृष्ट नमूना था ये! उस रेखा के आसपास, वलय खातीं और भी अन्य रेखाएं बनी थीं! कुछ सीधी रेखाएं भी थीं, जिनमे पुष्प जैसी आकृतियाँ बनी थीं! बहुत ही सुंदर पात्र था वो! बस अब खोलकर देखना था उसको, रांगा अधिक मज़बूत तो नहीं होता, लेकिन इसमें यदि कोई बहुमूल्य वस्तु थी तो अवश्य ही रांगा भी मज़बूती से डाला गया होगा! मैंने एक चाबी से उसको खोलने की कोशिश की, बहुत जान लगाई, लेकिन नहीं खुला वो ढक्क्न! फिर शर्मा जी ने उस ढक्कन को हटाने की कोशिश की, उनसे भी नहीं हटा!
"मैं अभी आया" वे बोले,
"कहाँ चले?" मैंने पूछा,
"कोई पेंचकस लाता हूँ गाड़ी में से" वे बोले,
"ठीक है" मैंने कहा,
वे गए और मैं उसी में जूझता रहा, कमाल का रांग लगाया था उन्होंने, जिसने भी लगाया था! और दिल में ये धड़कन और तीव्र आकांक्षा, कि इसमें है क्या!
थोड़ी देर में ही शर्मा जी आ गए, ले आये एक पेंचकस बड़ा सा! अब उन्होंने कोशिश की, और इसी कोशिश में, उस ढक्क्न और पात्र के बीच, एक छेद सा हो गया! बस फिर क्या था! मैंने घुसेड़ा उसमे पेंचकस और लगा खोलने! कभी मैं, और कभी शर्मा जी! और इस तरह से, वो ढक्कन हट गया! अब उसके अंदर देखा, तो अंदर भी एक पोटली निकली! काले रंग की! अब उसको लगे खोलने! उसका धागा इतना लम्बा था कि जैसे हम उस पोटली के कपड़े को ही उधेड़ रहे हों! और आखिर में वो पोटली खोल ही ली! और उसमे से जो निकला, उसको देखकर तो आँखें ही हिल गयीं! ये एक कटा हुआ सा हाथ था, सूखा हुआ, किसी किशोर का रहा होगा, कलाई से काट दिया गया था वो हाथ, हाथ में सिलाई हुई, हुई थी, जैसे कई उँगलियों और अंगूठे को सीला गया हो! मामला खोपड़ी के ऊपर से चला गया! अब कोई हमें ये हाथ क्यों देगा? उसके पीछे क्या औचित्य है? कौन ऐसा चाहता है? और फिर, ये हाथ किसका है? और ऐसी नफ़ासत से काहे रखा गया है? नए नए सवाल दिमाग में उपज गए! अनचाही खेती सी हो गयी!
"अब इसका क्या अर्थ?" मैंने पूछा,
"पहले बीजक, फिर वो मदना, फिर अरसी, और अंट-शंट, और अब ये हाथ! क्या पहेली है ये!" वे बोले,
"डालो इसको पोटली में" मैंने कहा,
उन्होंने डाल दिया,
"अब रख दो पात्र में" मैंने कहा,
"मुझे दो" मैंने कहा,
अब मैंने वो पोटली और पात्र, वहीँ रख दिए टोकरे में!
"इसको लेना नहीं?" वे बोले,
"यदि हमारे लिए ही भेजा गया है, तो ये कल भी यहीं होगा, नहीं हुआ, तो ये कोई खेल है" मैंने कहा,
"समझ गया" वे बोले,
"आओ, अब वापिस चलते हैं" मैंने कहा,
"चलिए" वे बोले,
और अब हम वापिस चले,
पीछे मुड़कर देखा, तो टोकरा वहीँ था!
हम आ गए बाहर उस 'भूतिया-ज़मीन' से! आये वापिस, और जा बैठे गाड़ी में! अब दीप साहब से बात हुई, और उनको बता दिया कि कल यहां एक क्रिया करनी होगी, और फिर हम यहां आएंगे! वे मान गए, अब हमने उन्हें वापिस चले को कहा, सीधे हमारे स्थान के लिए! उन्होंने खाने की ज़िद की, तो हमने समझा दिया कि खाना वहीँ खा लेंगे! फिर भी रास्ते से, उन्होंने मदिरा की दो बोतलें और खूब सारा मसालेदार सामान बंधवा दिया! और हमें छोड़ दिया, अब उन्हें कल शाम को आना था वापिस! हम अंदर आये, और मैं अपने कक्ष में गया, शर्मा जी लघु-शंका त्याग के लिए अलग चले गए थे!
मैं कमरे में आया, और धम्म से बिस्तर पर गिर पड़ा! तब तक शर्मा जी भी आ गए! उन्होंने पानी के लिए कह दिया था! सहायक आया और पानी दे गया!
"हालत पस्त हो गयी" वे बोले,
"साथ में दिमाग भी" मैंने कहा,
"ऐसा नहीं देखा मैंने कुछ भी" वे बोले,
"सच में" मैंने कहा,
"वो टोकरा वहीँ हुआ तो?" वे बोले,
"हुआ तो क्रिया में रखेंगे" मैंने कहा,
''अच्छा" वे बोले,
"कैसा वीभत्स नज़ारा था वो" वे बोले,
"हाँ, बहुत ही अधिक" मैंने कहा,
तब मैं हाथ-मुंह धोने गया, और वापिस आया, शर्मा जी सामान खोल रहे थे, मैं सहायक को आवाज़ दी, तो वे बोले कि वो पानी लेके आ रहा है!
पानी आ गया!
और हम हुए शुरू!
खाया-पिया!
कुछ और बातें इस बारे में ही!
रात को कोई बारह बजे, मैं क्रिया-स्थल में पहुंचा, और विद्याएँ साध लीं, मंत्र साधे, कुछ सामग्री भी रख ली बैग में, इसकी आवश्यकता थी कल! उसके बाद मैं स्नान करने के पश्चात सो गया, चार बज चुके थे, नींद आ गयी वो भी बहुत बढ़िया!
सुबह हुई!
फिर दोपहर!
मैंने फिर से क्रिया-स्थल का रुख किया! और अब एक पूजन किया! इसमें गुरु-आज्ञा लेनी होती है, सो आज्ञा ली! और उसके बाद, अपने ईष्ट को महा-भोग दे दिया! अब उनकी छत्रछाया में था मैं!
शाम को, सात बजे, दीप साहब आ गए!
उनसे बातें हुईं और हम अब चले!
उन्होंने काफी सारा सामान खरीदा हुआ था, वो आज काम आता हमारे लिए! मैंने अपना बड़ा बैग ले ही लिया था, और अब निकल पड़े!
जब वहाँ पहुंचे, तो दस बज चुके थे! आज एक पेट्रोमैक्स भी था साथ में, ये बढ़िया किया था दीप साहब ने! टोर्च भी दो ले आये थे!
"आओ शर्मा जी" मैंने अपना बैग उठाते हुए कहा,
"चलो" वो बोले,
उन्होंने दूसरा सामान उठा लिया था!
"यहाँ रख दो सामान" वे बोले,
मैंने रख दिया और अब वो पेट्रोमैक्स जला लिया! रौशनी हो उठी वहां!
"आना ज़रा" मैंने कहा,
वो चले मेरे साथ!
हम वहाँ चले जहां कल शाम हमने वो टोकरा छोड़ा था!!
"ये यहीं है" वे बोले,
"हाँ!" मैंने कहा,
"उठा लूँ?" वे बोले,
"उठा लो" मैंने कहा,
और जैसे ही उठाया, उसमे एक सांप आ घुसा था! सांप देखते ही हाथ खींच लिया उन्होंने!
"ये कहाँ से आ गया!" वे बोले,
"कोई बात नहीं, एक लकड़ी ले आओ" मैंने कहा,
वे एक लकड़ी ले आये, बड़ी सी, मुझे दी, मैंने सांप को बाहर निकाल लिया, और छोड़ दिया एक तरफ, रुस्सेल्स-वाईपर था वो! अधिक बड़ा नहीं था, लेकिन था ज़हरीला!
"अब उठा लो" मैंने कहा,
उन्होंने उठा लिया वो पात्र!
"आओ मेरे साथ" मैंने कहा,
अब हम एक जगह आ गए, यहाँ एक चादर बिछाई, और बैठ गए!
"बैग में से थैला निकाल लो" मैंने कहा,
उन्होंने निकाल लिया, दिया मुझे,
मई उसमे से, तंत्राभूषण निकाले, और मंत्र पढ़ते हुए उनको धारण करवा दिए! और खुद भी पहन लिए! एक भुजबंध भी पहना!
"पानी और गिलास निकाल लो" मैंने कहा,
उन्होंने निकाल लिए!
"अब बनाओ गिलास" मैंने कहा,
उन्होंने बनाये दो गिलास! अब मैंने स्थान-भोग दिया, फिर ईष्ट भोग और खींच लिया वो गिलास! उन्होंने भी ऐसा किया और खींच गए गिलास अपना!
"वो सामान निकाल लो" मैंने कहा,
"ये भी?" उन्होंने छोटे बैग के लिए कहा,
"हाँ, ये भी" मैंने कहा,
और फिर दो दो गिलास और खेंच लिए!!

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Re: 2013- maanesar ki ek ghatna thriller story

Unread post by sexy » 19 Aug 2015 07:59

मैं उस महा-भोग में से कुछ मांस ले आया था अपने संग, जिसकी आवश्यकता पड़ा करती है ऐसी क्रियायों में, मदिरा भी थी, और मांस भी, वो महा-भोग का रक्त भी, और शेष सामग्री भी! मुझे यहां पर, प्रत्यक्ष-साधना करनी थी, मैं चाहता था कि जो जो छिपा हुआ है, वो अपने आवरण से बाहर आ निकले! ताकि मैं जान सकूँ कि यहाँ चल क्या रहा है! अभी तक तो हमने धूल में ही लाठियां भांजी थीं, निशाना नहीं लगा था! यहां प्रेतात्माएँ बहुत थीं, उनसे सामना भी हुआ था, लेकिन उनमे से दो मुझे बहुत ही खास लगे थे, एक मदना और एक वो पहलवान जम्भाल! दोनों ही शक्तिशाली थे! लेकिन मदना ने मुझे कुछ बताया नहीं था, और जो नहीं बताया था वही मुझे जानना था, और ये मुझे बस मदना ही बता सकता था! इसीलिए मैंने उस मदना को बाहर खींचने की सोची थी! कि वो बाहर आये और मुझे वो सबकुछ बताये, वो पात्र, वो कटा हुआ हाथ, जो सीला गया था बड़ी नफ़ासत से, मैंने अपने साथ ही रखा था! अब सबसे पहले मुझे एक स्थान चुनना था, एक ऐसा स्थान, जो चारों ओर से खुला हो, और सामने का क्षेत्र खाली हो! जहां आसन बिछा सकूँ और अलख उठा सकूँ! ऐसा स्थान मेरी दाई तरफ था, पेड़ नहीं थे वहां, कुछ ख़ास झाड़ियाँ भी नहीं थीं! वही स्थान बेहतर था और मैंने शर्मा जी को बता दिया था इस स्थान के बारे में! मैंने उस स्थान को कीलित किया, विष आदि से, बचने के लिए, जैसे सां, बिच्छू, मर्रा, कानखजूरे आदि से बचने के लिए विष-नाशिनी विद्या से उस स्थान को वृत्त-बंध किया! उस स्थान में प्राण फूंकने के लिए, प्राण-चालन विद्या का प्रयोग किया! आर फिर मंत्र पढ़ते हुए मैंने वहाँ अपना आसन बिछा दिया! आसन के सामने ईंधन रखा अलख का, एक छोटा सा गड्ढा खोदा था हाथों से, यही मेरी अलख थी उस रात! अब मैंने भस्म-स्नान किया, साथ लाये रक्त से, देह पर चिन्ह बनाये, त्रिपुण्ड धारण किया, ऐसा ही शर्मा जी के साथ भी किया, उनका माथा, कंधे, नाभि, पाँव, छाती भस्म से लेप दी, और रक्त से ही उनके भी चिन्ह बना दिए! और उसके बाद, अब अलख उठायी!! एक महानाद किया! और जैसे ही ईंधन झोंका, चारों दिशाओं से चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें गूँज उठीं! ये आवाज़ें हमारे चारों ओर से गूंजी थीं! जैसे हम मध्य में थे उनके! मैंने फिर से एक मंत्र पढ़ा, और हाथ से रक्त के छींटे अलख को सौंपे! मांस के टुकड़े अलख को सौंपे! अलख अब भड़कने लगी थी! न जाने कितने वर्षों बाद, आज कोई साधक आया था यहां! मुझे धन का लालच नहीं था, कोई लालच नहीं, निकलता तो भी मैं ये दीप साहब को ही सौंप देता, ये ज़मीन उनकी अमानत थी, मैं तो बस उस को सबक देने आया था, जिसकी वजह से बाबा मोहन ने प्राण त्यागे थे!
मित्रगण!
अब मेरी क्रिया सघन हुई! मैं मदना का नाम ले ले कर उसको पुकारता था! और क्रिया को आगे बढ़ाता चला जाता था! मैं ईंधन झोंकता अलख में, मांस के टुकड़े झोंकता और क्रिया को आगे ले जाता! मुझे कोई चालीस मिनट लग गए! उसके बाद में खड़ा हुआ, सामने चला कोई चौदह कदम! ये खेंच-चलन है, जो भी प्रत्यक्ष होगा, इन्ही चौदह कदमों के अंदर ही प्रत्यक्ष होगा! वापिस आया और अलख में ईंधन झोंका, बैठते हुए! अब मांस का एक टुकड़ा लिया, रक्त के पात्र में डुबोया, और एक मंत्र पढ़ते हुए, फेंक दिया सामने! जैसे ही टुकड़ा गिरा, वहाँ धुंध सी छा गयी! और उस समय, मेरे सामने खड़ा था, कोई दस कदम दूर, वो मदना!!! प्रत्यक्ष-क्रिया हाज़िर कर लायी थी उसको! खींच लायी थी अंधेरों से! फाड़ दिया था पर्दा वक़्त का! और अब वो, मेरे सामने खड़ा था!
"मदना?" मैंने कहा,
वो चौंका!
अपनी लाठी ज़मीन पर गिरा दी!
"तू? तू गया नहीं?" उसने पूछा,
"नहीं मदना!" मैंने कहा,
"क्यों?" उसने पूछा,
"मैंने कहा था न मदना? मुझे कुछ जानना है?" मैंने कहा,
"क्या जानना है?" वो बोला,
"जवाब दोगे?" मैंने कहा,
"पूछ" वो बोला,
"ये बाबा त्रिभाल कौन हैं?" मैंने पूछा,
अब जैसे डंक मारा उसे! जैसे पछाड़ ही कहा जाएगा!
"बता मदना?" मैंने ईंधन झोंकते हुए पूछा,
"नहीं! मैं नहीं बता सकता" वो बोला,
"क्यों?" मैंने पूछा,
"इसका उत्तर नहीं मेरे पास" वो बोला,
"तो किसके पास है?" मैंने ज़रा ज़ोर से पूछा इस बार!
"मुझे नहीं पता! नहीं पता! नहीं पता!" वो रोने लगा! चीख चीख के रोने लगा!
"लेकिन तू जानता है, है न?" मैंने पूछा,
वो रोता रहा! बस रोता रहा!
"मदना?" मैंने कहा,
नहीं बोला कुछ!
"मदना?? मेरी बात सुन" मैंने कहा,
"क्या?" बिलखते हुए उसने कहा,
"लेकिन तू जानता तो है न?" मैंने पूछा,
"हाँ, जानता हूँ" वो बोला,
"तो बताता क्यों नहीं?" मैंने पूछा,
"नहीं बता सकता! नहीं बता सकता!" वो बोला,
"ऐसी क्या बात है मदना?" मैंने पूछा,
अब वो खड़ा हुआ, लाठी उठायी, और चला सामने की ओर! मेरी तरफ! रुका कोई चार कदम पर!
"जानना चाहता है?" वो बोला,
"हाँ" मैंने कहा,
"तो बाबा द्वैज को जगाओ! जगाओ?" वो चीख के बोला,
बाबा द्वैज?
अब ये तीसरे बाबा?
इसका क्या मतलब हुआ?
और फिर जगाओ?
बाबा द्वैज को जगाओ?
यहां बाबा लहटा, बाबा त्रिभाल का पता चला था, और अब ये बाबा द्वैज?
मैं और शर्मा जी चौंके!
एक दूसरे का मुंह ताकें!
"मदना? कौन हैं ये बाबा द्वैज?" मैंने पूछा,
मुझे तो बुखार सा आ गया था ये नया नाम सुनकर!
मदना फिर से चुप हो गया!
"मदना? तू क्यों नहीं बताता?" मैंने पूछा,
वो सामने आया, बैठा, बिलकुल मेरे सामने, और अब गले में पड़ा एक कपड़ा हटाया! जैसे ही हटाया, हम दोनों ही घबरा गए! उसके गले में एक फंदा पड़ा हुआ था, गर्दन बहुत लम्बी और पतली हो चुकी थी उसकी, कोई चार इंच की ही रह गयी होगी! शायद फांसी से उसकी मौत हुई होगी! मैं चौंक पड़ा था! मुझे सच में ही दया आ गयी उस पर!
"अब मुझे जाने दो, बाबा द्वैज को जगाओ, सावधान रहना!" वो पीछे चले हुए बोला!
और मैंने क्रिया समाप्त कर दी!
जाने दिया उसको!
वो चला गया!! मेरा मन अब स्थिर नहीं था, उसकी हालत देख कर, मन खट्टा सा हो गया था! क्या हुआ था उसके साथ? ऐसे ऐसे कई सवाल!
बाबा द्वैज!
अब ये बाबा कौन हैं, ये भी नहीं पता!
उनको जगाना था, कैसे?
"कहाँ हैं ये बाबा?" मैंने अपने आपसे पूछा,
"उसने बोला, जगाओ" वे बोले,
"हाँ, जगाओ!" मैंने कहा,
"मदना झूठ नहीं कह सकता" वे बोले,
"हाँ, नहीं कह सकता" मैंने कहा,
"तो जगाओ आप बाबा द्वैज को" वे बोले,
जगाओ!
इतना सरल नहीं है जगाना!
औरये तो महापाप होगा! किसी 'सोते' को जगाना!
"ये इतना सरल नहीं शर्मा जी" मैंने कहा,
"जानता हूँ" वे बोले!
और तभी मदना सामने प्रकट हुआ!! अपने आप! आया सामने!
"वो हाथ, वो, केषक का, है, बाबा द्वैज का पुत्र! वो बोला, और लोप हो गया!
उसने तो मेरी नसें ही जाम कर दी थीं ये बता कर! मेरा तो मेरा, शर्मा जी का खून भी धमनियों में जमने लगा था! वो हाथ, कटा हाथ, किसी केषक का है! केषक बाबा द्वैज का पुत्र है!
"वो हाथ?" मैंने कहा,
"ये, ये रहा" वे बोले,
"लाओ, मुझे दो" मैंने कहा,
उन्होंने झट से दे दिया मुझे!
मैंने लिया, पात्र खोला, और पोटली निकाल ली! और पोटली को अपने आसन पर रखा!! पात्र सहित!
"शर्मा जी, आगे क्या होगा, पता नहीं, आप उठना चाहते हैं, तो उठ जाएँ, मेरा कुछ पता नहीं" मैंने कहा,
उन्होंने मुझे गुस्से से देखा! बहुत गुस्से से!
और मदिरा का वो गिलास, गुस्से में उठा पी गए!
"अब जो होगा, देखा जाएगा!" वे बोले!
मेरी हिम्मत बंधी! उनकी हिम्मत को मैंने मन ही मन सलाम किया!
"ठीक है! आज रात बाबा द्वैज जागकर ही रहेंगे!" मैंने कहा,
और ईंधन झोंक दिया अलख में!!!
क्रमशः

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Re: 2013- maanesar ki ek ghatna thriller story

Unread post by sexy » 19 Aug 2015 08:00

अब मैंने अलख में ईंधन झोंका! और एक और नयी क्रिया करने के लिए तैयार हुआ, इसमें भी मुझे हाज़िर करना था बाबा द्वैज को, बाबा द्वैज क्या थे, क्या नहीं, कैसा व्यवहार करेंगे, क्या क्रोधित होंगे, या मदद करेंगे, कुछ पता नहीं था मुझे! मुझे तो बस मदना ने बताया था कि मैं यदि जानना चाहता हूँ तो बाबा द्वैज को जगाऊँ! अब बाबा द्वैज जागें, तो ही पता चले! जब मैंने क्रिया आरम्भ की थे तो आसपास मुझे लगने लगा था कि जैसे अन्य कोई और भी वहाँ उपस्थित हो गए हैं, जैसे वो जान गए हैं कि ये क्रिया कैसे हो रही है , किसलिए हो रही है! मेरी क्रिया आगे बढ़ी, और जैसे जैसे क्रिया आगे बढ़ी, मुझे घबराहट होनी शुरू हुई, अब बस कुछ ही पलों में, क्रिया समाप्त होनी थी, इसीलिए मैं भी चाक-चौबंद सा बैठ गया था! आखिर में क्रिया समाप्त हुई, और मैंने मांस का एक अभिमंत्रित टुकड़ा सामने फेंका! जैसे ही टुकड़ा नीचे गिरा, भक्क से आग जल उठी उसमे! कोई बहुत बड़ी शक्ति वहाँ उपस्थित थी! हमारी नज़रों से ओझल! अब यहीं पर भय आ घेर लेता है! जब आपके देख-मंत्र काम नहीं किया करते, तब ऐसा ही होता है! और तभी भूमि की मिट्टी उड़ी, गुबार से उठ गए! औ जगह जगह आग निकलने लगी भूमि से! मैं खड़ा हुआ, अपना त्रिशूल उठाया, और चौबंद हो गया! शर्मा जी भी टकटकी लगाये सारा नज़ारा देख रहे थे! तभी चीत्कार सी उठीं! और वहाँ कुछ अन्य प्रेतात्माएँ प्रकट हुईं! सभी इधर उधर भागती हुईं! वे सभी अलग अलग जगह से आ रही थीं, और एक ख़ास जगह आ इकठ्ठा हुईं थीं! वे कुल पच्चीस या तीस रही होंगी! मैं समझ गया था कि मैंने किसी बहुत ही शक्तिशाली बाबा को जगा दिया है! अब आगे क्या होगा, सोचकर, हाथ में पकड़ा त्रिशूल भी कांपने लगा था! कहीं कोई सिद्ध हुए तो? तो क्या होगा? मैं कारण क्या बताऊंगा? सर में सवाल घूमने लगे! उनकी लताएँ मेरी सोच की दीवारों पर चिपट कर आगे बढ़ने लगीं! और तभी जैसे एक महानाद सा हुआ! किसी ने जयकार सी की! और उन पच्चीस-तीस प्रेतात्माओं ने अपने बीच से किसी को रास्ता दिया! और जो मैंने देखा, शर्मा जी ने देखा, तो मारे भय के मुक्कु बंध गया! सामने से एक बाबा चले आ रहे थे, उम्र में कोई होंगे साठ वर्ष तक के, या पचास के भी हो सकते थे, उनका शरीर मालाओं और तंत्राभूषणों से ढका था! माथे पर पीला त्रिपुण्ड था, हाथ में एक बड़ा सा वृहद-त्रिशूल था, जिसका कुल फाल का परिमाप, मेरी छाती से भी बड़ा ही होगा! दूसरे हाथ में एक यमदण्ड था, यमदण्ड अब कोई नहीं रखता, कोई है भी तो कहीं दूरदराज में, ये उसके दर्ज़े की निशानी है, ये धातु से बना होता है, अस्त्र की तरह, लेकिन इसमें चमड़े के कई टुकड़े हुआ करते हैं! जो लटकते रहे हैं, आप इसको कोड़ा समझिए! शर्मा जी भी खड़े हो गए! उन बाबा की दाढ़ी-मूंछें काली-सफ़ेद मिश्रित थीं, दाढ़ी काफी लम्बी थी, जटाएँ बहुत भारी और सर पर, जैसे टोकरा रखा हो, ऐसे रखी थीं, या बंधी थीं! वे मुझसे कोई बीस फ़ीट दूर खड़े थे, हमें ही ताकते हुए! वे आगे चले, और वे प्रेतात्माएँ भी उनके सग चलीं! ये प्रेतात्माएँ, औरत और मर्द दोनों ही थे, लेकिन जिनसे हम मिले थे, वे नहीं थे इसमें! उन सभी ने काले वस्त्र धारण किया हुए थे, बाबा द्वैज ने भी काल ही वस्त्र धारण किया हुआ था! वे आगे बढ़े तो हम कांपे अब! बाबा का कद कोई सात फेट तो होगा ही, चौड़े कंधे थे, भुजाएं मोटी और मांसल थीं, जांघें किसी पेड़ के तने समान थीं, वे आगे बढ़ रहे थे, उन सभी के साथ और मैं किसी आशंका से पीड़ित होने लगा था!
वे रुके, कोई दस कदम पर, मेरी तरफ यमदण्ड किया, मुझे ओ कोड़े का सा आभास हुआ अपनी छाती पर, ऐसा कि जैसे चमड़ी खींच ली हो एक ही बार में! वे आगे बढ़े, कोई चार फ़ीट और, अब मई उनका चेहरा देखा, वे क्रोध में नहीं थे! मेरी आशंका ने दम तोड़ा अब! भय ने भी अपना स्थान छोड़ने के लिए तैयारी कर ली थी, मैं झट से हाथ जोड़ लिए उनके! शर्मा जी ने भी!
"कौन हो तुम?" एक गरजदार आवाज़ में पूछा उन्होंने!
मैंने अपना सम्पूर्ण परिचय दे दिया उन्हें! मन में पाप नहीं था, इसीलिए सब बता दिया था मैंने!
"आप ही बाबा द्वैज हैं?" मैंने हकलाती आवाज़ में पूछा,
"हाँ, क्यों जगाया मुझे?" उन्होंने पूछा,
"मुझे....मदना ने बताया था" मैंने कहा,
उन्होंने जैसे ही नाम सुना मदना का, आँखें चौड़ी हो गयीं उनकी!
"किसलिए? क्या प्रयोजन है?" उन्होंने पूछा,
"यहां एक बाबा आये थे मोहन, उनकी मृत्यु हो गयी, ऐसी ही किसी प्रेतात्मा ने मार डाला उन्हें, मैं यही जानने आया हूँ" मैंने कह दिया,
"मदना" वे बोले,
"मदना ने ही मारा होगा" वे बोले,
"लेकिन बाबा क्यों?" मैंने पूछा,
"जान जाओगे" वे बोले,
वे चुप हुए, और अपना त्रिशूल भूमि में गाड़ दिया, और उसकी टेक ले, वो खड़े रहे, मुझे देखते हुए, फिर अपना त्रिशूल छोड़ा, और सामने आये, मेरी कंपकंपी छूटी! वे आये, और ठीक मेरे सामने खड़े हो गए, मैं उनके कंधों तक आ रहा था, मेरी भुजाएं तो सरकंडे समान लग रही थीं उनके आगे! उनकी विशाल सी छाती में मेरे जैसे दो समा सकते थे! उनका चेहरा बहुत चौड़ा था, माथा बहुत प्रबल! उन्होंने हाथ उठाया, मेरे सर पर रखा, आहिस्ता से, और मेरी आँखें बंद हो गयीं! उसके बाद..................उसके बाद मैं नीचे गिर पड़ा! कुछ ही पलों में आँख खुली मेरी, और मैंने ऐसा व्यवहार किया जैसे कि मैं अनजान और अज्ञात सा व्यक्ति हूँ! क्या कर रहा हूँ मैं वहां? शर्मा जी हैरान थे! मैं उनको भी नहीं पहचान रहा था! चारों तरफ देखता था, और फिर से मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाया, और मैं फिर से गिर पड़ा! जब आँख खुली, तो वहां शर्मा जी के अलावा और कोई नहीं था! अचानक से सब याद आ गया! मुझे उस मूर्छा-अवस्था में कुछ दिखाई दिया था! कुछ विशेष से स्थान, कुछ विशेष से व्यक्ति, जिन्हे मैं अब पहचान सकता था! सच में, मैं पहचान सकता था उन्हें! बाबा द्वैज ने मुझमे कुछ उत्तरों के कण भर दिए थे! जैसे मेरे हाथ नक्शा लग गया था किसी स्थान का! मुझे एक आवाज़ अभी तक याद थी, बाबा द्वैज की ही आवाज़ थी वो! 'अज्रंध्रा-प्रवेश करो!' अज्रंध्रा-प्रवेश, ध्यान की एक विशेष अवस्था है, ये तांत्रिक-ध्यानावस्था है, इसमें प्रवेश हेतु, एक क्रिया की आवश्यकता पड़ा करती है, और ये क्रिया, मात्र अमावस की रात को ही सम्भव है! अमावस आने में अभी दो दिन थे! मैं अब विचलित होने लगा, शर्मा जी बार बार मुझसे, यही पूछते रहे कि मैं ठीक हूँ या नहीं?
"बाबा द्वैज कहाँ गए?" मैंने पूछा,
"चले गए थे वो तभी के तभी" वे बोले,
अब समझ आ गया कि हुआ क्या था!
मैंने अब शर्मा जी को सब बता दिया, कि मुझे दो दिन बाद यहीं इसी स्थान पर अज्रंध्रा-प्रवेश करना है! और उसके बाद एक एक रहस्य खुलते चले जाएंगे! यहां क्या हुआ था, सब पता चल जाएगा! बाबा लहटा, बाबा त्रिभाल, वो मदना और बाबा द्वैज, सब के विषय में मैं जान सकूंगा!
अब हम वहाँ से चले वापिस, अब अमावस को ही आना था यहां, उस प्रवेश हेतु मुझे अपने आपको तैयार भी करना था, अतः, हम उस रात दीप साहब के घर पर ठहरे, और फिर सुबह अपने स्थान पर चले गए! इन दो दिनों में मैंने अपने आपको तैयार कर लिया! शर्मा जी से कह दिया, कि जब भी मैं कुछ बोलूं उस प्रवेश के बाद, तो उसको एक कागज़ पर लिख लें, क्योंकि मैं उनको नहीं सुन सकता था, उनको क्या, किसी को भी नहीं! मैं मूर्छित-अवस्था में पहुँच जाऊँगा! उन्हें मेरी देह को सुरक्षित रखना होगा, कोई कीड़ा-काँटा मुझे काटे नहीं! वे ये कार्य भली-भांति जानते थे! मुझे न पर पूर्ण विश्वाश था!
और फिर दो दिन बीत गए!
मैं अपने स्थान से चल पड़ा शर्मा जी के साथ, दीप साहब लेने आये थे, उनके मुलाक़ात हुई, हाल-चाल जाने गए! और हम चल दिए उनके साथ उस शाम को, उस स्थान के लिए!
हम जा पहुंचे वहां!
आज मुझे वो स्थान, जाना-पहचाना सा लग रहा था! जैसे मैं न जाने कब से जानता होऊं इस बारे में! कुछ लोग जो खो गए हैं, इस भौतिक उजाले से दूर, अन्धेरी दुनिया में हैं, उनसे मिलने का समय आ चुका है! मैं और शर्मा जी, एक चादर लेकर, और मैं अपन सारा सामान लेकर, जा पहुँहे, उसी जगह जहां दो दिन पहले हमने क्रिया की थी! साफ़-सफाई की, जल छिड़का, पूजन किया! और जो भी आवश्यक कार्य थे, सब पूर्ण किये!
"लो शर्मा जी" मैंने कहा,
मैंने उन्हें तंत्राभूषण दिए थे!
उन्होंने ले लिए, मैंने अपने भी निकाल लिए, और मंत्र पढ़ते हुए, उनको भी पहनाये, और स्वयं भी पहन लिए!
"शर्मा जी?" मैंने कहा,
"हाँ?" वे बोले,
"दुआ करें कि आज ये कार्य हो जाए" मैंने कहा,
"हाँ हाँ, क्यों नहीं" वे बोले,
और दोनों हाथ जोड़कर, उन्होंने कुछ माँगा उस ब्रह्मेश्वर से!
"मैं जब क्रिया आरम्भ अकरूंगा, आप इंधन झोंकना" मैंने कहा,
"अवश्य" वे बोले,
"एक बात और" मैंने कहा,
"क्या?" वे बोले,
"जब मैं अज्रंध्रा-प्रवेश करूँगा, तो तब आप कहीं नहीं जा सकते, लघु-शंका के लिए भी नहीं" मैंने कहा,
"जानता हूँ" वे बोले!
अब सारा सामान सजाया, और नौ दीये लगा दिए!
"ये एक एक दीया चारों दिशाओं में लगाइये, मैं कोणों में लगाता हूँ" मैंने कहा,
"जी" वो बोले,
और एक एक दिया उन्होंने चारों दिशाओं में लगा दिया,
मैंने चारों कोणों में लगा दिए,
और एक जो बचा, वो हमारे सामने ही लगा दिया था!
अब किया महानाद!
अलख उठायी!
गुरु-नमन, गुरु-आज्ञा, श्री महाऔघड़ का वंदन आदि सब किया! और अघोर को नमस्कार किया!
फिर देह को सजाया!
श्रृंगार किया!
त्रिपुण्ड धारण किये!
और क्रिया आरम्भ कर दी!
शर्मा जी, ईंधन झोंकते जाते!
मित्रगण!
कोई एक घंटे के बाद, क्रिया पूर्ण हुई, और जैसे ही मैं उठा, सामने कोई दिखा! वो मदना था, मैं चल पड़ा उसके पास! वो मुझे देख, सामने आया! रुका, और मैं पहुंच गया वहाँ पर!
"मदना?" मैंने कहा,
"हाँ" वो बोला,
आवाज़ में दर्द था, चेहरे पर भय!
"क्या बात है मदना?" मैंने पूछा,
"कुछ नहीं" वो बोला,
"मदना, मैं अज्रंध्रा-प्रवेश करने वाला हूँ" मैंने कहा,
"हाँ, जानता हूँ" वो बोला,
"मुझे बाबा द्वैज ने कहा" मैंने बताया,
"जानता हूँ" वो बोला,
अब मैं चुप हुआ, वापिस जाने को था कि, मेरा कंधा पकड़ लिया उसने,
"क्या बात है मदना?" मैंने पूछा,
"ये" वो बोला,
अपना हाथ आगे करके,
"ये क्या है?" मैंने पूछा,
"लो" वो बोला,
मैंने हाथ आगे किया,
उसने अपनी मुट्ठी मेर हाथ में खोल दी,
ये तो स्वर्ण की चैन सी थी, गोल-गोल दाने थे उसमे, भारी भी बहुत थी!
"इसका क्या करना है?" मैंने पूछा,
"जान जाओगे" वो बोला,
"मुझे बताओ?" वो बोला,
"जान जाओगे" वो बोला,
और पीछे हटा,
और फिर लोप हुआ!
मैं भी वापिस, अपने क्रिया-स्थान पर आ गया!